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आखिर कहां चूक गई नोकिया?
Updated Tue, 03 Sep 2013 03:06 PM IST
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नोकिया इंडिया के उपाध्यक्ष डी। शिवकुमार ने 2007 में इंडिया नॉलेज एट व्हार्टन से कहा था कि, "अगर आप 1995 के परिदृश्य को देखें तो पाएंगे कि कोई भी सफल हो सकता था, अगर वो वही काम करता जो नोकिया ने किया था।"
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दरअसल उस समय एलजी और सैमसंग जैसी सभी प्रतिस्पर्धी कंपनियां टीवी फ्रिज जैसे दूसरे उत्पाद भी तैयार कर रही थीं, जबकि नोकिया ने सिर्फ मोबाइल फोन कारोबार पर फोकस किया।
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परंपरागत रूप से नोकिया टॉयलेट पेपर से लेकर बिजली तक तैयार करती थी, लेकिन 1993 में कंपनी के सीईओ जोरमा ओलीला ने बाकी सबकुछ बेचकर सिर्फ मोबाइल फोन कारोबार पर ध्यान देने का फैसला किया।
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नोकिया को खरीदने की तैयारी में माइक्रोसॉफ्ट
कारोबारी विशेषज्ञों के मुताबिक इस रणनीति में एक जोखिम था। सब कुछ ठीक रहा तो कंपनी अच्छा करेगी, लेकिन अगर मोबाइल फोन की मांग कम होने लगी तो कंपनी क्या करेगी।
इस लिहाज से सैमसंग का नजरिया अधिक लोचदार था। सैमसंग दूसरे उत्पादों को बना सकती थी, लेकिन नोकिया के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था।
वितरण की जिम्मेदारी
वर्ष 2007 में भारतीय मोबाइल बाजार में नोकिया की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत थी, जबकि जीएसएम हैंडसेट के 70 प्रतिशत से अधिक कारोबार पर उसका कब्जा था।
नोकिया के हैंडसेट की बिक्री एचसीएल करती थी, जिसका देश भर में तगड़ा वितरण नेटवर्क था।
यह वो दौर था जब बाजार में नोकिया की बादशाहत को चुनौती देने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था।
ऐसे में नोकिया ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए अपने हैंडसेट के वितरण का काम खुद करने का फैसला किया।
कंपनी के इस फैसले ने सैमसंग जैसे उसके प्रतिस्पर्धियों को बढ़त कायम करने का एक मौका दे दिया, जिनके पास पहले से ही अपना वितरण नेटवर्क मौजूद था।
ब्रांडिंग का संकट
एक समय नोकिया के एन-सीरिज फोन की बाज़ार में बादशाहत थी।
भारत में नोकिया 940 रुपये से लेकर 41639 रुपये तक के फोन बेचती है। मार्केटिंग के सिद्धान्त कहते हैं कि एक ही ब्रांड सभी के लिए नहीं हो सकता है।
शहरों में नोकिया के ई-सीरीज़ फोन (कारोबारियों के लिए) और एन सीरीज़ फोन (मल्टीमीडिया फीचर्स वाले फोन) काफी लोकप्रिय थे। यहाँ उसे कोई भी चुनौती देता हुआ नज़र नहीं आ रहा था।
ऐसे में नोकिया ने आशा सीरीज़ के हैंडसेट के साथ अपना फोकस ग्रामीण भारत पर किया। कारोबार के लिहाज से यह नोकिया की दूसरी रणनीतिक चूक थी।
ग्रामीण भारत पर फोकस के चलते नोकिया ने हाईएंड फोन निर्माता की अपनी छवि को खो दिया, जबकि सस्ते फोन के मैदान में वह माइक्रोमैक्स, स्पाइस और चीन से आयातित कई अनजान ब्रांडों का मुकाबला नहीं कर सकी।
एंड्रॉएड सिस्टम से दूरी
नोकिया ने एक और रणनीतिक भूल गूगल के एड्रॉएड ऑपरेटिंग सिस्टम से दूरी बनाकर की। नोकिया पूरी तरह से माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज़ फ़ोन प्लेटफार्म पर निर्भर हो गया। इसका नोकिया को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
दरअसल हार्डवेयर के लिहाज से नोकिया आज भी सबसे बेहतर माना जाता है, लेकिन नोकिया के सॉफ्टवेयर में अक्सर गड़बड़ी की शिकायत देखने को मिलती है। सैमसंग का गैलक्सी एड्रॉएड प्लेटफार्म पर ही आधारित है।