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10 साल तक कैद रहा मानसिक रोगी

Sat, 01 Jun 2013 01:49 PM IST
Updated Sat, 01 Jun 2013 01:49 PM IST
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mentally ill Indian hidden decade in solitary

पिछले साल अक्टूबर में दक्षिण भारत में एक घर के सामने हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी। तब उस घर को गिराया जा रहा था।

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ऐसा करके एक ऐसे आदमी को आजाद कराया जा रहा था जो कि पिछले 10 सालों से भी ज्यादा समय से भी उस घर में कैद था।

उसका नाम है केशव। जिस कमरे में उसे कैद रखा गया था उसमें न तो खिड़कियां ही थीं और न ही दरवाजे।

सांस लेने के लिए छोटी सी जगह बनाई गई थी। इसी से उन्हें खाना भी दिया जाता था।

कई सालों तक केशव के परिवार वालों ने उनकी मानसिक बीमारी के लिए मदद इकट्ठा करने की कोशिश की लेकिन जब उनकी बीमारी बढ़ती गई तो वे निराश होते गए।

इस समस्या से निपटने में जब घरवाले असमर्थ हो गए तो वे केशव को घर के पीछे वाले कमरे में छिपाने लगे।

जब भी कोई घर आता तो उनके परिवार वाले ऐसा ही करते। ऐसा करते करते एक दिन घरवालों ने उसे एक कमरे में हमेशा के लिए बंद ही कर दिया।

कैद से आजादी
केशव तब छूटे जब पड़ोस के एक शहर में रहने वाले अधिकारी को उनके बारे में खबर लगी। इस अधिकारी ने बैंगलोर के अखबार में केशव के बारे में पढ़ा था।

केशव के गांव पहुंचने के बाद क्षेत्रीय कमिश्नर के. शिवराम वहां के हालात देखकर चौंक गए। शिवराम कहते हैं, "मैंने अपने कर्मचारियों से कहा कि दीवार को गिरा दो। वहां पर करीब दो हजार लोग इस घटना को देखने के लिए इकट्ठा हो गए थे। कमरे से बहुत गंदी हवा आ रही थी। हम लोग तो कमरे के अंदर झांक भी नहीं सकते थे।"
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केशव की उम्र करीब 30 साल की होगी। जब वो बाहर आए तो उनके सिर पर मैले कुचैले बालों का जत्था था। शिवराम कहते हैं कि ऐसा लगता था कि केशव दसियों साल से नहाया धोया नहीं था। उन्होंने केशव के बाल कटवाए और उनके नहाने की व्यवस्था की और उनका मेडिकल चेकअप करवाया।
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और भी हैं केशव
केशव ऐसे अकेले नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पांच लोगों में से केवल एक आदमी को ही मानसिक बीमारी की हालत में सही चिकित्सा मिल पाती है।

लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और संगथ सेंटर, गोवा के डॉ विक्रम पटेल कहते हैं, "निम्न और मध्यम आय वर्ग वाले देशों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता और बढ़ाने की जरूरत है। विकसित देशों के उलट विकासशील देशों में, मानसिक रोग से ग्रस्त बहुत से मरीजों को कैद कर दिया जाता है।"

आयरलैंड के मनोचिकित्सक और मानसिक चिकित्सा के क्लिनिकल निदेशक पाट ब्राकेन का मानना है कि मानसिक बीमारियों का इलाज स्थानीय होना चाहिए।

वो कहते हैं, "जो दवाई या तरीका न्यूयॉर्क या लंदन के लोगों के लिए फायदेमंद होगा जरूरी नहीं कि वो ग्रामीण अफ्रीका और भारत में भी काम करे।"

नार्वे ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को लिए एक कदम आगे बढ़कर काम करने का फैसला किया है। नार्वे की गिनती अमीर देशों में होती है। यहां 2011 में ब्रेविक नाम से शख्श ने 77 लोगों की हत्या कर दी थी।

युद्ध का असर
इस घटना से प्रभावित लोगों की सहायता से लिए नार्वे की सरकार साप्ताहिक कैंप आयोजित करती है जिसमें इस घटना से प्रभावित लोगों के रिश्तेदार, बच्चे शामिल होते हैं।

सरकार की ओर से उन्हें गहन पेशेवर चिकित्सा और सहायता उपलब्ध कराई जाती है। हालांकि युद्ध क्षेत्र में फंसे बच्चों को ऐसी ही सहायता उपलब्ध नहीं कराई जाती है।

जहां तक मानसिक बीमारियों की बात है युद्ध कई तरह से लोगों को प्रभावित करता है। युद्ध में लोगों के परिवार उजड़ जाते हैं, दोस्त और परिवार के लोग बिछड़ जाते हैं और लोगों को नई जगहों पर जाकर बसना पड़ता है।

जैसे सीरिया को ही लें। यहां जारी संघर्ष से बचने के बहुत से लोगों ने जॉर्डन में शरण ली है लेकिन शरणार्थी बच्चों को बहुत कम संसाधन के साथ चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

नार्वे के चिल्ड्रेन एंड वार फाउंडेशन के निदेशक एटले दिरेग्रोव ने स्वयंसेवियों के एक समूह को इस बात का प्रशिक्षण दिया है कि कैसे बच्चों में युद्ध के प्रभाव को कम किया जाए।


हिकीकोमोरी
उन्होंने कई तकनीक सिखाई हैं जिसमें से एक ये है कि बच्चों को उन घटनाओं का चित्र बनाने के लिए कहा जाए जिनसे वो परेशान हुए हैं।

इसके बाद उस चित्र को टच स्क्रीन पर धीरे-धीरे तब तक मिटाया गया जब तक कि ये समाप्त न हो जाए। हालांकि इसका ये मतलब नहीं कि यही तरीका हर जगह काम करेगा।

यहां तक कि अलग अलग देशों में दुख के लक्षण भी अलग अलग होते हैं। जापान में बहुत से युवक ऐसे हैं जो खुद को दुनिया से अलग थलग करके खुद एक कमरे में समेट लेते हैं। इसे वहां हिकीकोमोरी कहा जाता है।

जापान में करीब दसियों लाख लोग ऐसे हैं जो इसी तरह जीते हैं। पश्चिमी देशों में इसे साइकोसिस कहा जाता है। अलग अलग देशों के हिसाब से मानसिक रोग की परिभाषा भी बदल जाती है।

क्लॉडिया हैमंड (प्रेजेंटर, बीबीसी हेल्थ चेक)

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