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'30 साल बाद कहीं नहीं रहेगा ऊर्जा संकट'

Fri, 09 Aug 2013 03:33 PM IST
Updated Fri, 09 Aug 2013 03:33 PM IST
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iter fusion at critical phase in france

दक्षिणी फ्रांस में आण्विक संलयन के जरिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा तैयार करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक प्रयोग आईटीईआर अपनी शुरुआत के अहम चरण में पहुंच चुका है।

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दरअसल आण्विक संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो परमाणु तेज़ गति से आपस में टकरा कर, एक दूसरे से जुड़कर बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

दक्षिण फ़्रांस के केडेरेक में शुरू होने वाली इस परियोजना में के प्रयोगधर्मी रिएक्टर में करीब दस लाख अवयव जोड़े जाएंगे। इसमें पहला अवयव लगाया जा चुका है।
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यह परियोजना बेहद खर्चीली है, इसके चलते इसके शुरू होने में लगातार देरी हो रही है। अभी इसकी शुरुआत ही हुई है और यह निर्धारित समय से दो साल देरी से हो पाया है।
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योजना में विलंब

इस परियोजना के डिप्टी डायरेक्टर डेविड कैंपबेल ने बीबीसी न्यूज़ को बताया, “हम किसी चीज़ को छुपा नहीं रहे हैं, इसमें हो रही देरी अविश्वसनीय रूप से निराश करने वाला है।”

हालांकि कैंपबेल दावा कर रहे हैं कि ये परियोजना अब रफ़्तार पकड़ चुकी है। उन्होंने बताया, “हम अब हरसंभव कोशिश कर रहे हैं ताकि काम जल्द से जल्द शुरू हो सके। ये परियोजना अपने आप में काफी प्रभावी है और हम जल्द से जल्द परमाणु संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को देख पाएंगे।”

iter fusion













पहले तो इस परियोजना के डिजाइन में मुश्किलें आ रहीं थीं। इसके अलावा यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रोजेक्ट है और कई देश इसमें शामिल हैं तो सबके बीच संयोजन होने में भी वक्त लगा। लेकिन अब सबकुछ पटरी पर आ चुका है।

असीमित ऊर्जा का स्त्रोत

1950 में नाभिकीय संलयन ने वह सपना दिया जिसके जरिए असीमित ऊर्जा उत्पन्न करने की संभवना ने जन्म लिया। सूर्य की रोशनी की वजह भी नाभिकीय संलयन से मिलने वाली ऊर्जा ही है।

इतना ही नहीं नाभिकीय संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा किफायती तो है ही, साथ में इसमें बेहद कम रेडियोएक्टिव कचरा उत्पन्न होता है और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी नहीं होता।

लेकिन इसको लेकर चुनौतियां भी कम नहीं होतीं। इस प्रक्रिया से प्राप्त होने वाली असीम ऊर्जा को संभालना भी चुनौतीपूर्ण काम है।

यह इतना चुनौतीपूर्ण काम है जब भी नाभिकीय संलयन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा की बात होती है, तो हमेशा यही कहा जाता है कि इसे हासिल करने में अभी भी 30 साल का वक्त लगेगा।

लेकिन अब आईटीईआर इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो रहा है। इसका डिजाइन ऑक्सफोर्डशायर के कूलहम के यूरोपीय पायलट प्रोजेक्ट जेट के तर्ज पर तैयार किया गया है।

इसमें बेहद गर्म गैसों को नियंत्रित करने वाला प्लाज़्मा शामिल है। क्योंकि नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में तापमान 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इसी तापमान पर ड्यूटेरियम और ट्राइटियम के परमाणु आपस में संलियत करके ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

10 गुना ज़्यादा ऊर्जा

यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े मैग्नेटिक फ़ील्ड में होगी, जो एक रिंग के आकार का होगा। बहुत ज्यादा उष्मा को एकत्रित करने का एकमात्र यही जरिया हो सकता है।

ऑक्सफोर्डशायर के जेट प्लांट में नाभिकीय संलयन छोटे पैमाने पर होता है, जिसके चलते वहां ऊर्जा उत्पन्न करने में कहीं ज़्यादा ऊर्जा खर्च करनी होती है।

लेकिन आईटीईआर में बड़े पैमाने पर नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया होगी। मौजूदा आकलन के मुताबिक इसमें खर्च होने वाली ऊर्जा के मुक़ाबले 10 गुना ज़्यादा ऊर्जा प्राप्त होगी।

इस प्रयोग में दुनिया भर के कई देश शामिल हैं। यूरोपियन यूनियन के अलावा, चीन, भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका इस महत्वपूर्ण परियोजना में भागीदार हैं।

ये भागीदारी आर्थिक हिस्सेदारी के तौर पर नहीं है। हर देश अपने हिसाब से इस प्रयोग से जुड़े हैं। मसलन यूरोपियन यूनियन ने इस प्रयोग के लिए इमारत और आधारभूत ढांचे के निर्माण को फंड किया है। इसकी कुल लागत कितनी होगी, ये अभी उपलब्ध नहीं हो पाया है। लेकिन माना जा रहा है कि इसमें करीब 13 अरब डॉलर का खर्चा होगा।

कई देश शामिल

इस प्रयोग के दौरान जब खाली चैंबर में मौजूद गैस प्लाज्मा तभी बनेगा, जब रिएक्टर के अंदर का तापमान 15 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच पाए। ये सूर्य के केंद्र के तापमान का दस गुना है।

पहले ये कहा जा रहा था कि प्रत्येक साझेदार अपने अवयवों की देखरेख के लिए अपने घरेलू एजंसी पर निर्भर हो। इसके चलते आयात शुल्क और कर शुल्क को लेकर भी मुश्किलें देखने को मिलीं।

इसके अलावा इस प्रयोग के सभी अवयवों में गुणवत्ता का स्तर बेहद उम्दा रखना था, इसलिए आईटीईआर और फ़्रांसीसी आण्विक अधिकारियों ने उन अवयवों की गुणवत्ता की जांच परख की।

हालांकि मुख्य इमारत में अभी भी कुछ हिस्सों को अधूरा छोड़ा गया ताकि अवयवों के लगाने में ज़्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़े। इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं, क्योंकि इस प्रयोग में शामिल होने वाले एक एक हिस्से का वजन 600-600 टन है।

30 साल में सच होगा सपना

इस इमारत के बनाए जाने की शुरुआत 2007 में हुई थी। करीब 90 हेक्टेयर में यह पूरा परिसर बनकर तैयार होगा। शुरुआती योजना के तहत इस योजना का पहला प्लाज्मा 2005 तक तैयार होना था, लेकिन इसमें लगातार होने वाली देरी को देखते हुए इसकी डेडलाइन नवंबर, 2020 रखी गई।

हालांकि इसके तबतक पूरा होने में भी संदेह जताया जा रहा है। इस परियोजना के मुख्य संयोजक केन ब्लेकलर हैं। उन्होंने बीबीसी न्यूज़ को बताया, “अब काम तेजी से हो रहा है। कई तकनीकी चुनौतियों को पूरा कर लिया गया है। लेकिन यह काफी चुनौतीपूर्ण है। इसके अवयव दुनिया भर से मंगाए जा रहे हैं। इसके बाद हम एक एक कदम बढ़ा रहे हैं। यह बेहद अहम पड़ाव है।”


मसलन, 28 बड़े चुंबकों से प्लाज्मा तैयार करने की चुनौती के दौरान बेहद सटीकता का ख्याल रखा जा रहा है। एक चुंबक से दूसरे चुंबक को बेहद बारिकी से जोड़ा जा रहा है। इसमें एक भी चूक पूरे योजना पर पानी फेर सकती है।

पिछले सितंबर में बेल्जियम में मैं ने कई विशेषज्ञों से ये सवाल पूछा था कि नाभिकीय संलयन से कब तक ऊर्जा हासिल हो पाएगी। तब कुछ विशेषज्ञों ने कहा था कि ये 40 साल में संभव होगा जबकि कुछ ने कहा था कि इसमें 50 से 60 साल लगेंगे। लेकिन जिस तरह से नाभिकीय संलयन पर आईटीईआर में काम हो रहा उसे देखते हुए उम्मीद है कि 30 साल में यह संभव होगा।

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