5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में भारत दुनिया में पहले नंबर पर
देश के आधे से ज्यादा जिले बड़े पैमाने पर नवजात बच्चों की मृत्यु दर को घटाने में विफल रहे हैं। एक अध्ययन का दावा है कि भारत वर्ष 2030 के लिए तय सतत विकास लक्ष्य के तहत तय किए गए बाल मृत्यु दर के आंकड़े को छूने से बहुत दूर दिखाई दे रहा है। नतीजा ये है कि पांच साल से कम उम्र वाले और नवजात बच्चों में से हर साल करीब 11 लाख की मौत के साथ भारत अब भी इस मामले में दुनिया में पहले नंबर पर चल रहा है।
आस्ट्रिया की एक गैर-लाभकारी संस्था इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालसिस के लिए जयंत बोरा और नंदिता सैकिया ने इस अध्ययन को पूरा किया है, जिसमें पहली बार भारत में जिला स्तर और राज्य स्तर पर नवजात और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर को आंकने का प्रयास किया गया है।
इन दोनों शोधार्थियों ने अपने अध्ययन के लिए 15 से 49 साल की महिलाओं की राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के तहत एकत्र की गई पूरी बर्थ हिस्ट्री का डाटा उपयोग किया। उन्होंने इसके लिए सर्वे के वर्ष 2015-16 और 2005-06 में कराए गए आखिरी दो चरण के डाटा से अपने लिए आंकड़े लिए।
तय लक्ष्य से 2.4 गुना ज्यादा है नवजातों की मृत्यु दर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2030 के सतत विकास लक्ष्य-3 (एसडीजी-3) में सभी देशों के लिए बाल मृत्यु दर का लक्ष्य तय किया है। इसमें हर साल 1000 जन्म पर नवजातों की 12 और 5 साल से कम उम्र के बच्चों की 25 से ज्यादा मृत्यु नहीं होनी चाहिए।
लेकिन बोरा-सैकिया के अध्ययन में पाया गया कि भारत ने पांच साल से कम बच्चों की मृत्यु दर के आंकड़े में वर्ष 1990 में 109 मौत प्रति 1000 जन्म को 23 साल बाद 2013 में घटाकर 50 मौत तक लाने में सफलता हासिल की, लेकिन तय लक्ष्य से ये अब भी दोगुना है। इसी तरह देश में हर 1000 जन्म पर 29 नवजातों की मौत का आंकड़ा वैश्विक मानक से करीब 2.4 गुना ज्यादा है।
उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे भयानक
अध्ययन में सामने आया कि उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे भयानक है, जहां 75 में से एक भी जिला पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में वैश्विक लक्ष्य नहीं छू पाया है। यूपी के अलावा छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश में नवजात मृत्यु दर भी मानकों से कहीं ज्यादा है।
अध्ययन में पाया गया कि एसडीजी-3 के तहत नवजात मृत्युदर का लक्ष्य छूने में देश के महज 9 फीसदी जिले ही सफल रहे हैं, जबकि 5 साल से कम उम्र के बच्चों को बचाने के लक्ष्य पर महज 14 फीसदी जिले ही खरा उतरे हैं।