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'मैं बस मरना चाहती थी'

Fri, 28 Jun 2013 09:45 PM IST
Updated Fri, 28 Jun 2013 09:45 PM IST
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I just wanted to die

रोजलीन कैलेंडर अतीत में अपने नशे का आदी होने के बारे में खुलकर और शांतिपूर्वक बात करती हैं।

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लंदन में रहने वाली कैलेंडर कहती हैं, "मैं आत्महत्या की राह पर थी। मैं बस मर जाना चाहती थी। मैं पूरी तरह काबू से बाहर हो चुकी थी और कोकीन का इस्तेमाल करती थी।"

अंतत: वो एक क्लास-ए मादक द्रव्य का आयात करने के लिए गिरफ़्तार की गईं और उन्हें साढ़े चार साल की सज़ा हुई।

जेल में रोज़लिन स्टार्टअप नाम की एक सहायतार्थ संस्था से रुबरु हुईं। वो कहती हैं कि इस संस्था ने उन्हें अपना कारोबार शुरु करने में मदद करके उनकी ज़िंदगी बदल दी।
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रोज़लिन ने दो साल की सज़ा काटी और वे साल 2009 से नशामुक्त हैं। और पिछले दो साल से वो कारोबार कर रही हैं।

वे दक्षिण लंदन के बाज़ारों में सौन्दर्य प्रसाधन बेचती हैं और अब उनकी योजना अपना कारोबार बढ़ाने की है जिसके तहत वो ब्रैंडिड प्रसाधनों की जगह अपने घर में बने प्रसाधन बेचेंगी।
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रोज़लिन कहती हैं, "अभी शुरुआत हुई है और मैं बहुत ज़्यादा कमा भी नहीं रही हूं लेकिन मैं मेहनत कर रही हूं।"

बदलती ज़िंदगियां
स्टार्टअप संस्था साल 2006 में स्थापित हुई थी। इसका उद्देश्य हाल ही में जेल से छूटी महिला क़ैदियों को अपना ख़ुद का कारोबार करने वाली उपयोगी और स्वतंत्र महिलाओं में बदलना है।

संस्था की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी जूलियट होप कहती हैं, "अगर ऐसी संस्थाएं न हो तो वापस जाने पर इन महिला क़ैदियों से समाज पल्ला झाड़ लेता है। उनके बच्चे तो सरकारी निगरानी में होते हैं लेकिन उन्हें नौकरियां नहीं मिलती और ज़ाहिर है कारोबार करने के लिए उन्हें कोई बैंक कर्ज़ नहीं देगा।"

स्टार्टअप योजना के लिए चुने जाने के लिए महिलाएं जेल में रहते ही आवेदन दे देती हैं या फिर प्रोबेशन अधिकारी या प्रिंसज़ ट्रस्ट जैसी संस्थाएं इनका अनुमोदन करते हैं।

इन महिलाओं के आवेदन पर इनके आपराधिक अतीत का असर नहीं पड़ता। बल्कि उन्हें उनकी कारोबारी समझ, उनके सुझावों और अपनी कंपनी शुरु करने की उनकी योजनाओं के आधार पर चुना जाता है।

चुनी गई चार महिलाओं पर संस्था आठ हज़ार पाउंड प्रति महिला खर्च करती है। ये सभी एक साल तक हर हफ्ते वर्कशॉप में हिस्सा लेती हैं, जबकि दो महिलाओं को एक विस्तृत बिज़नेस योजना लिखने के लिए मदद दी जाती है। हर महिला को अपने कारोबार के लिए 2500 पाउंड की मदद मिलती है।

ये योजना अब तक काफ़ी सफल रही है। स्टार्टअप की संस्थापक जूलियट होप कहती हैं, "अब तक इस योजना में शामिल 700 महिलाओं में से सिर्फ़ एक ही एक साल के अंदर दोबारा जेल गई है।"

जेल से बाहर रखने की चुनौती
अटलांटिक महासागर के पार अमेरिका के टैक्सास राज्य में भी ऐसी ही एक योजना पुरुष कैदियों की मदद कर रही है।

जेल उद्यम कार्यक्रम (पीईपी) साल 2004 में शुरु हुआ था और तब से 1200 से ज़्यादा पुरुष कैदी इसका हिस्सा बने हैं।

ह्यूस्टन से संचालित इस कार्यक्रम के मुख्य विकास अधिकारी जेरेमी ग्रेग कहते हैं, "हम लोगों से इन कैदियों को माफ़ करने के लिए नहीं कह रहे। लेकिन अमेरिका में जेल में क़ैद 95 फीसदी लोग कभी न कभी रिहा होंगे और इनमें से आधे वापस जेल में पहुंच जाते हैं।"

ग्रेग आगे कहते हैं, "चुनौती इन लोगों को जेल से बाहर रखने की है। हम इसके लिए ज़रिया मुहैया कराते हैं, इन पुरुषों को अपनी कंपनियां शुरु करने में मदद करते हैं या फिर नौकरी करने के लिए ज़्यादा उपयुक्त बनाते हैं।"

पीईपी कार्यक्रम उन सभी पुरुष कैदियों के लिए है जो हाई स्कूल पास हैं। कार्यक्रम में सिर्फ़ यौन अपराधों के दोषी आवेदन नहीं कर सकते।

जेरेमी कहते हैं कि आवेदन की प्रक्रिया काफ़ी कठिन होती है जिसके तहत 200 से 300 स्थानों के लिए हर साल 6000 तक आवेदक होते हैं जिनकी लिखित और मौखिक परीक्षा होती है।

सफल आवेदकों को ह्यूस्टन जेल में स्थानांतरित किया जाता है जहां ये कार्यक्रम चलाया जा रहा है। वे एक साल तक व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन करते हैं। एक साल बाद उन्हें वाको स्थित बेयलोर विश्वविद्यालय से उद्यम या एंट्ररप्रिनरशिप में सर्टिफिकेट मिलता है।

वे बताते हैं, "पीईपी समर्थित लगभग 120 व्यवसाय अच्छे चल रहे हैं। इनमें से कम से कम दो की प्रति वर्ष दस लाख डॉलर की बिक्री है। ख़ास बात ये है कि जो कैदी ये कोर्स करते हैं उनमें से सिर्फ़ पांच फीसदी ही फिर से जेल जाते हैं।"


उधर ब्रिटेन में स्टार्टअप की संस्थापक जूलियट होप कहती हैं कि वो कार्यक्रम को बढ़ाकर उसमें पुरुष कैदियों को भी शामिल करना चाहेंगी।

वहीं रोज़लीन कैलेंडर कहती हैं कि स्टार्टअप की मदद के बिना उनकी ज़िंदगी बदल नहीं सकती थी।

वो कहती हैं, "उनकी मदद के बिना या तो मैं फिर से नशा करने लगती या अपराध करती। लेकिन इस कार्यक्रम ने मुझे ये ऐहसास कराया है कि आखिर मैं इतनी बुरी भी नहीं हूं।"

बीबीसी के बिजनेस रिपोर्टर विलियम स्माले की खास रिपोर्ट

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