{"_id":"783ff2f0-2fab-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"hitler-journey-from-a-comman-man-to-dictator","type":"story","status":"publish","title_hn":"मामूली आदमी से तानाशाह तक हिटलर का सफर","category":{"title":"Europe","title_hn":"यूरोप","slug":"europe"}}
मामूली आदमी से तानाशाह तक हिटलर का सफर
Updated Fri, 16 Nov 2012 10:37 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जब भी पूर्व जर्मन तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर का ज़िक्र होता है एक सवाल जो सबके मन में उठता है वे ये कि आख़िर हिटलर जैसे व्यक्तित्व के मालिक यूरोप के एक प्रबुद्ध देश के शासक और लाख़ों लोगों के चहेते कैसे बन गए।
इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए ना केवल उस समय के हालात ख़ासकर पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार और 1930 के दशक की आर्थिक मंदी को समझना ज़रूरी है बल्कि हिटलर के नेतृत्व के स्वरूप को भी समझना होगा।
हिटलर के नेतृत्व के उस पहलू पर ग़ौर करना शायद मौजूदा समय में भी बहुत प्रासंगिक है।
हिटलर उस तरह के आम नेता नहीं थे जो कर कम करने या बेहतर स्वास्थ सुविधा मुहैया कराने का वादा करते थे। वे तो एक धार्मिक नेता की तरह लोगों को मुक्ति दिलाने का वादा करते थे।
विज्ञापन
पहले विश्व युद्ध से पहले उन्हें कोई नहीं जानता था। वे एक मामूली आदमी थे जो कि ना किसी से क़रीबी रिश्ते बना पाते थे, ना ही लोगों से बौद्धिक बातें कर सकते थे और जो नफ़रत और पूर्वाग्रह से भरे हुए थे।
कमज़ोरी बनी ताक़त
लेकिन पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद हिटलर ने जब म्यूनिख में भाषण दिया तो उनकी कमज़ोरियों को ही उनकी ताक़त समझा जाने लगा।
हिटलर के अंदर जो नफ़रत की भावना थी, वो हज़ारों जर्मन वासियों की भावना से मेल खाती थी जो कि वर्साय संधि की शर्तों से अपमानित और शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।
उसी तरह हिटलर का एक अच्छा वक्ता ना होना उनके व्यक्तित्व की ताक़त बन गई और उनकी बड़ी-बड़ी बातों के कारण उन्हें एक महान व्यक्ति कहा जाने लगा जो कि भीड़ से अलग अपनी सोच रखता है।
लेकिन इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये थी कि हिटलर जर्मन की जनता से संवाद कर सकता था और इसे ही कई लोग हिटलर का करिश्मा कहने लगे।
1920 के दशक में हिटलर को सुनने वाले एमिल क्लिन के अनुसार हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे।
लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें हिटलर ज़रा भी नहीं भाते थे।
1920 के दशक में जब जर्मनी की अर्थव्यवस्था अच्छी थी तो हिटलर को केवल कुछ कट्टरपंथी ही पसंद करते थे।
यहां तक की 1928 के चुनाव में हिटलर की नाज़ी पार्टी को केवल 2।6 फीसदी वोट मिले थे।
लेकिन अगले पांच से भी कम वर्षों में हिटलर जर्मनी के चांसलर और सबसे जानी मानी राजनीतिक पार्टी के नेता बन गए थे।
आर्थिक संकट
और इस बीच में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ था वो बदलाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था में हुआ था।
1929 के आर्थिक मंदी के कारण जर्मनी के बैंक तबाह हो गए थे और बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ गई थी।
नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर कहती है, ''लोग भूखे थे। बहुत बुरे दिन चल रहे थे। हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें। मुझे भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है।''
हिटलर लाखों जर्मन वासियों से कहते थे कि वे आर्य हैं और इसलिए वे ख़ास हैं और दूसरी सभी नस्लों से बेहतर है।
हिटलर ने प्रजातंत्र से अपनी नफ़रत और राजनीतिक फायदे के लिए हिंसा के इस्तेमाल में यक़ीन को कभी नहीं छिपाया। लेकिन उन्होंने केवल कम्युनिस्टों और यहूदियों को ही जर्मनी का दुश्मन क़रार दिया और उन्ही के विरूद्द बोलते थे।
चूंकि अधिकतर जर्मनवासी इन दो कैटगरी में नहीं थे इसलिए उनको किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं होता था।
चेतावनी
हिटलर का ये इतिहास आज भी हमारे लिए बहुत अर्थ रखता है। इसलिए नहीं कि इतिहास हमेश कोई ना कोई सबक़ देता है बल्किन इसलिए क्योंकि इतिहास से हमें चेतावनी भी मिलती है।
आर्थिक संकट में लाखों लोगों ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना नेता मान लिया जो केवल इसलिए करिश्माई बन गया क्योंकि वो लोगों के डर, उनकी आशा और अपनी परेशानियों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराने की आदत का लाभ उठाना जानता था।
लेकिन लाखों लोगों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।
ये एक दुखद विडंबना है कि जर्मनी की मौजूदा चांसलर एंगेला मर्केल का एथेंस में नाराज़ ग्रीसवासियों ने स्वास्तिक बैनरों के साथ ये कहते हुए विरोध किया कि जर्मनी उनके देश में हस्तक्षेप कर रहा है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे ग्रीस में 'गोल्डेन डॉन' नाम के एक राजनीतिक दल का अचानक उत्थान चिंता का विषय क्योकि ये दल अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म करने और अपनी असहिष्णुता के लिए ही जाना जाता है।
"1920 के दशक में हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें हिटलर ज़रा भी नहीं भाते थे।"
एमिल क्लिन
"लोग भूखे थे। बहुत बुरे दिन चल रहे थे। हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें। मुझे भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है।"
नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर
विज्ञापन
इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए ना केवल उस समय के हालात ख़ासकर पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार और 1930 के दशक की आर्थिक मंदी को समझना ज़रूरी है बल्कि हिटलर के नेतृत्व के स्वरूप को भी समझना होगा।
विज्ञापन
हिटलर के नेतृत्व के उस पहलू पर ग़ौर करना शायद मौजूदा समय में भी बहुत प्रासंगिक है।
हिटलर उस तरह के आम नेता नहीं थे जो कर कम करने या बेहतर स्वास्थ सुविधा मुहैया कराने का वादा करते थे। वे तो एक धार्मिक नेता की तरह लोगों को मुक्ति दिलाने का वादा करते थे।
विज्ञापन
पहले विश्व युद्ध से पहले उन्हें कोई नहीं जानता था। वे एक मामूली आदमी थे जो कि ना किसी से क़रीबी रिश्ते बना पाते थे, ना ही लोगों से बौद्धिक बातें कर सकते थे और जो नफ़रत और पूर्वाग्रह से भरे हुए थे।
कमज़ोरी बनी ताक़त
लेकिन पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद हिटलर ने जब म्यूनिख में भाषण दिया तो उनकी कमज़ोरियों को ही उनकी ताक़त समझा जाने लगा।
हिटलर के अंदर जो नफ़रत की भावना थी, वो हज़ारों जर्मन वासियों की भावना से मेल खाती थी जो कि वर्साय संधि की शर्तों से अपमानित और शर्मिंदा महसूस कर रहे थे।
उसी तरह हिटलर का एक अच्छा वक्ता ना होना उनके व्यक्तित्व की ताक़त बन गई और उनकी बड़ी-बड़ी बातों के कारण उन्हें एक महान व्यक्ति कहा जाने लगा जो कि भीड़ से अलग अपनी सोच रखता है।
लेकिन इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये थी कि हिटलर जर्मन की जनता से संवाद कर सकता था और इसे ही कई लोग हिटलर का करिश्मा कहने लगे।
1920 के दशक में हिटलर को सुनने वाले एमिल क्लिन के अनुसार हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे।
लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें हिटलर ज़रा भी नहीं भाते थे।
1920 के दशक में जब जर्मनी की अर्थव्यवस्था अच्छी थी तो हिटलर को केवल कुछ कट्टरपंथी ही पसंद करते थे।
यहां तक की 1928 के चुनाव में हिटलर की नाज़ी पार्टी को केवल 2।6 फीसदी वोट मिले थे।
लेकिन अगले पांच से भी कम वर्षों में हिटलर जर्मनी के चांसलर और सबसे जानी मानी राजनीतिक पार्टी के नेता बन गए थे।
आर्थिक संकट
और इस बीच में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ था वो बदलाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था में हुआ था।
1929 के आर्थिक मंदी के कारण जर्मनी के बैंक तबाह हो गए थे और बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ गई थी।
नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर कहती है, ''लोग भूखे थे। बहुत बुरे दिन चल रहे थे। हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें। मुझे भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है।''
हिटलर लाखों जर्मन वासियों से कहते थे कि वे आर्य हैं और इसलिए वे ख़ास हैं और दूसरी सभी नस्लों से बेहतर है।
हिटलर ने प्रजातंत्र से अपनी नफ़रत और राजनीतिक फायदे के लिए हिंसा के इस्तेमाल में यक़ीन को कभी नहीं छिपाया। लेकिन उन्होंने केवल कम्युनिस्टों और यहूदियों को ही जर्मनी का दुश्मन क़रार दिया और उन्ही के विरूद्द बोलते थे।
चूंकि अधिकतर जर्मनवासी इन दो कैटगरी में नहीं थे इसलिए उनको किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं होता था।
चेतावनी
हिटलर का ये इतिहास आज भी हमारे लिए बहुत अर्थ रखता है। इसलिए नहीं कि इतिहास हमेश कोई ना कोई सबक़ देता है बल्किन इसलिए क्योंकि इतिहास से हमें चेतावनी भी मिलती है।
आर्थिक संकट में लाखों लोगों ने एक ऐसे व्यक्ति को अपना नेता मान लिया जो केवल इसलिए करिश्माई बन गया क्योंकि वो लोगों के डर, उनकी आशा और अपनी परेशानियों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराने की आदत का लाभ उठाना जानता था।
लेकिन लाखों लोगों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।
ये एक दुखद विडंबना है कि जर्मनी की मौजूदा चांसलर एंगेला मर्केल का एथेंस में नाराज़ ग्रीसवासियों ने स्वास्तिक बैनरों के साथ ये कहते हुए विरोध किया कि जर्मनी उनके देश में हस्तक्षेप कर रहा है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे ग्रीस में 'गोल्डेन डॉन' नाम के एक राजनीतिक दल का अचानक उत्थान चिंता का विषय क्योकि ये दल अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म करने और अपनी असहिष्णुता के लिए ही जाना जाता है।
"1920 के दशक में हिटलर इतने करिश्माई हो गए थे कि वो जो भी कहते थे, लोग उस पर विश्वास करते थे। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्हें हिटलर ज़रा भी नहीं भाते थे।"
एमिल क्लिन
"लोग भूखे थे। बहुत बुरे दिन चल रहे थे। हिटलर के बयानों से लोगों को लगता था कि वो सारी समस्याओं से मुक्ति दिला देंगें। मुझे भी लगने लगा था कि यह (हिटलर) एक ऐसा आदमी है जो अपने लिए कुछ नहीं सोचता है, सिर्फ़ जर्मन लोगों की भलाई के बारे में सोचता है।"
नाज़ी पार्टी की एक समर्थक जुटा रयूडिजर