{"_id":"5ac9a6e64f1c1ba9618b630b","slug":"here-scientists-doing-farming-in-100-degree-temperature-by-computer-grow-many-vegetables","type":"story","status":"publish","title_hn":"माइनस 100 डिग्री तापमान में कम्प्यूटर से की खेती, उगाई ढेर सारी सब्जियां ","category":{"title":"Europe","title_hn":"यूरोप","slug":"europe"}}
माइनस 100 डिग्री तापमान में कम्प्यूटर से की खेती, उगाई ढेर सारी सब्जियां
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 08 Apr 2018 11:13 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंटार्कटिका दुनिया की सबसे ठंडी जगह है इसलिए यहां खेती करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। यह एक ऐसी जगह है जहां न तो मिट्टी होती है और न ही सूरज की रोशनी। साथ ही यहां पूरे साल बर्फबारी भी होती रहती है। ऐसे में यहां सब्जियां उगाना नामुनकिन सा लगता है। लेकिन जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इस नामुनकिन काम को भी मुमकिन कर लिया है। उन्होंने अंटार्कटिका में माइनस 100 डिग्री तापमान में भी पहली बार हरी सब्जियां उगाई हैं।
विज्ञापन
वैज्ञानिकों ने एक खास लैब बनाकर 3.6 किलो हरी पत्तेदार सब्जियां उगाईं। जिसमें 18 खीरे और 70 मूलियां भी शामिल हैं। खेती के लिए वैज्ञानिकों ने जर्मन एयरोस्पेस रिसर्च स्टेशन (जीएआरएस) नॉयमार थ्री के पास 400 मीटर लंबा एक ग्रीन हाउस चैंबर बनाया। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का पोषक घोल बनाया था। जिसे कम्प्यूटर द्वारा नियंत्रित किया जाता था। कुछ मिनटों के अंतराल पर इसका छिड़काव किया जाता था। इसके साथ ही चैंबर में लाल, नीली और हरी एलईडी लाइट और 42 लैंप्स भी लगाए गए।
विज्ञापन
फरवरी में बोए गए थे बीज
जीएआरएस से जुड़े पॉल साबेल ने बताया कि सब्जी उगाने के लिए बीजों को फरवरी में बोया गया था। तब से ही सब्जियों के इन पौधों के बढ़ने का इंतजार किया जा रहा था। उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि हम हर हफ्ते 4-5 किलो टमाटर, मूली, मिर्च और अन्य पत्तेदार सब्जियां उगाने में सफल होंगे।
विज्ञापन
आपको बता दें कि नॉयमायर स्टेशन 10 महीने तक दुनिया से कटा रहता है। यहां वैज्ञानिकों को खाने से संबंधित बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और जो भी खाने का सामान वह अपने साथ लाते हैं उन्हें उसी से काम चलाना पड़ता है। लेकिन इस प्रोजेक्ट से वैज्ञानिकों को एक नई उम्मीद मिली है। उनका कहना है कि इस प्रोजेक्ट से एकत्रित की गई जानकारियों का इस्तेमाल वह चंद्रमा और मंगल ग्रह के विभिन्न अभियानों में करेंगे।