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ग्राफीन के पेटेंट को लेकर है मारामारी
बीबीसी हिंदी
Updated Wed, 23 Jan 2013 01:14 PM IST
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इस समय दुनिया में एक नए और आश्चर्यजनक पदार्थ से पैसे बनाने की होड़ मची है। ब्रिटेन में पहचाना गया ग्राफीन अब तक का सबसे पतला पदार्थ है और इसमें जबरदस्त मजबूती और ललीचापन है। माना जाता है कि ये इलेक्ट्रोनिक्स से लेकर सौर पैनल और चिकित्सा उपकरणों तक, हर क्षेत्र में क्रांति कर सकता है।
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लेकिन इसके इस्तेमाल के अधिकार या पेटेंट की संख्या को देखे तो पता चलता है कि ब्रिटेन इस मामले में अपने प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ रहा है। उत्तरी इंग्लैंड में मैनचेस्टर विश्विविद्यालय में एक शोधकर्ता कुछ टेपों को हटा कर वो छोटा सा पदार्थ दिखाते हैं जिसमें क्रांतिकारी संभावनाएं हैं और ये पदार्थ है ग्राफीन।
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अणुओं की एक परत से बना ग्राफीन हीरे से भी ज्यादा कड़ा है, तांबे से भी ज्यादा सुचालक है और रबड़ से भी ज्यादा लचीला है। इसलिए इससे ऐसी स्क्रीन बनाई जा सकती है जिसे आप मोड़ कर रख पाएंगे और ऐसी बैटरी भी जो अभी के मुकाबले कहीं ज्यादा चलेगी।
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दो रूसी वैज्ञानिकों ने मैनचेस्टर में इस पर अग्रणी काम किया और इसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार के साथ साथ नाइटहुड से भी सम्मानित किया गया है। इन्हीं में से एक हैं आंद्रे गाइम।
आंद्रे गाइम कहते हैं, ये अणुओं की खोज किए जाने के शुरुआती दिनों की तरह है, जब आप अपनी पूरी ऊर्जा और समय किसी विषय पर लगाते हैं और उसकी संभावनाओं को परखते रहते हैं, परखते रहते हैं और हर तार्किक अपेक्षा से परे जाकर भी कुछ और खोज निकालना चाहते हैं।
ग्राफीन के शोध को प्राथमिकता
असल में ये आश्यचर्यजनक रूप से बहुत ही समृद्ध है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें ऐसा पदार्थ मिला है जिसके बारे में हम पहले नहीं जानते थे। ब्रितानी सरकार ने ग्राफीन को अपनी शोध प्राथमिकता बनाया है और उसने इसके लिए 10 करोड़ डॉलर की राशि की भी पेशकश की है।
प्रोफेसर गाइम मानते हैं कि कुछ कंपनियों का रवैया इस बारे में खासा सुस्त है। ब्रिटेन की दिग्गज तेल कंपनी बीपी मैनचेस्टर में ग्राफीन शोध संस्थान बना रही है क्योंकि इस नए और अनोखे पदार्थ के जरिए अरबों के वारे न्यारे किए जा सकते हैं। दुनिया और हिस्सों में भी ऐसे केंद्र स्थापित हो रहे हैं।
उदाहरण के लिए सिंगापुर में नेशनल यूनिवर्सिटी ने एक विशाल ग्राफीन प्रयोगशाला बनाई है और इसे चलाते हैं प्रोफेसर एंतोनियो कास्त्रो नीतो। नीतो कहते हैं कि ये वाकई बहुत प्रतिस्पर्धा वाला क्षेत्र है। न सिर्फ विज्ञान के नजरिए से बल्कि कारोबार के नजरिए से भी।
एशिया और खास तौर से सिंगापुर ने इस क्षेत्र में जल्दी काम शुरू कर दिया है। हमें देखना है कि आगे क्या होता है। बहुत सारी चीजें हो रही हैं। तो ये पता चलने में कुछ वक्त लगेगा कि इस दौड़ को कौन जीतेगा। दक्षिण कोरिया की नामी इलेक्ट्रिनिक्स कंपनी सैमसंग ने ग्राफीन को प्रोत्हासन देने के लिए एक वीडियो तैयार किया है जिसमें कागज के जैसी एक काल्पनिक स्क्रीन दिखाई गई है।
ग्राफीन का व्यावसायिक इस्तेमाल करने के लिए पहला जरूरी कदम है इसका पेटेंट हासिल करना और सैमसंग अब तक इस तरह के 400 पेटेंट हासिल कर चुकी है। लेकिन ग्राफीन के सबसे ज्यादा पेटेंट चीन के पास हैं, दो हजार से भी ज्यादा। ये आंकड़े कैंब्रिज आईपी नाम की संस्था की ओर से मुहैया कराए गए हैं।
ग्राफीन की पूरी तरह पहचान लगभग नौ साल पहले हुई, और बड़ी तेजी से ये परिदृश्य पर छा गया। बेशक इसमें निवेश करना किसी जुए के जैसा ही है क्योंकि ग्राफीन के पहले व्यावसायिक इस्तेमाल में अभी कई सालों का इंतजार करना पड़ सकता है। लेकिन मैनचेस्टर में अब जिस प्रायोगिक विज्ञान की शुरुआत हुई है, वो इस वैश्विक दौड़ का केंद्र है।