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बिना सुई टीका लगाने का तरीका

Mon, 17 Jun 2013 03:05 PM IST
Updated Mon, 17 Jun 2013 03:05 PM IST
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future vaccines could be delivered via patch

ब्रिटेन के एडिनब्रा में एक ऐसे स्किनपैच को पेश किया गया जिसके जरिए सस्ते और अधिक प्रभावी टीके तैयार किए जा सकते हैं।

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इस टीके के आविष्कारक ने बताया कि सुई की जगह पैच के इस्तेमाल से दुनिया भर में बीमारियों की रोकथाम के तौरे तरीके बदले सकते हैं।

प्रोफेसर मार्क केंडल ने कहा कि इस नए तरीके से मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए उपयोगी टीके तैयार हो सकते हैं।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस खबर का स्वागत किया है, लेकिन ये चेतावनी भी दी है कि यह कुछ मरीजों के लिए उचित नहीं हो सकता है।

अनोखा संयोग
यह महज संयोग है कि केंडेल ने उसी एडिनब्रा में अपने आविष्कार को पेश किया, जहां 160 साल पहले एलेक्जेंडर वुड ने पहली बार किसी मरीज को सुई लगाई थी।

उन्होंने कहा, “आजकल मरीज के लिए सुई लगवाना कोई नई अनोखी बात नहीं है। यह 160 साल पुरानी तकनीक है।”

साफ पानी और साफ-सफाई के साथ ही यह एक ऐसी चीज है, जिसने दुनिया भर में लंबा जीवनकाल सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। लेकिन वो कहते हैं कि इस तकनीक में लंबे समय से बेहतरी की जरूरत महसूस की जा रही थी।

नैनोपैच सुई के जरिए दिए जाने वाले टीकों की कई खामियां दूर करता है, मसलन सुई के लेकर अनजाना सा डर या दूषित सुई के इस्तेमाल से संक्रमण की आशंका।

सही निशाना
प्रो. केंडल बताते हैं कि इसके अलावा कुछ अन्य वजहें भी इसे अहम आविष्कार बना देती हैं। पैच में हजारों की संख्या में छोटे प्रक्षेपक टीके को रिलीज करते हैं, जिसे सूखे रूप में त्वचा पर लगाया जाता है।
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वह बताते हैं कि “नैनोपैच में प्रक्षेपक त्वचा की प्रतिरोधक प्रणाली पर काम करते हैं। हम त्वचा की सतह से इन कोशिकाओं को निशाना बनाते हैं, जो बाल की चौड़ाई के बराबर होती हैं।”
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उन्होंने बताया, “ऐसा लगता है कि हम प्रतिरोधक बिन्दु को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो मांसपोशियों की बजाए त्वचा में हो सकता है।” जबकि परंपरागत सुई मांसपेशियों को निशाना बनाती हैं।

ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय स्थित उनकी प्रयोगशाला में परीक्षणों के दौरान नैनोपैच का इस्तेमाल फ्लू टीके के लिए किया गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि नैनोपैच द्वारा दिए गए टीके पर प्रतिरोधक तंत्र की प्रतिक्रिया परंपरागत सुई के मुकाबले बिल्कुल अलग थी।

कम खुराक
प्रो. केंडल बताते हैं कि, “इसका अर्थ है कि हम टीकाकरण का एक बिल्कुल अलग तरीका तैयार कर सकते हैं।”

इस तकनीक में आवश्यक खुराक की मात्रा भी काफी कम है, परंपरागत खुराक के मुकाबले महज सौंवां हिस्सा। उन्होंने बताया कि, “एक टीका जिसकी कीमत 10 डॉलर है, उसे घटाकर महज 10 सेंट तक लाया जा सकता है।”

परंपरागत टीके के साथ एक दिक्कत यह है कि तरल रूप में होने के चलते उसे रेफ्रिजरेटर में रखना पड़ता है। केंडल ने बताया कि, “रेफ्रिजरेटर फेल हो जाने के कारण अफ्रीका में आधे टीके काम नहीं करते हैं।”


उन्होंने बताया कि नैनोपैच से बने टीके को 23 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर एक साल तक रखा जा सकता है। इस खबर का ब्रिटिश सोसाइटी फॉर इम्यूनोलॉजी ने स्वागत किया है।

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