'परिवार के साथ खाना खाइए, स्वस्थ रहिए'

बीबीसी हिंदी Updated Fri, 21 Dec 2012 11:57 PM IST
family meals healthier for kids
ब्रिटेन में शोधकर्ताओं का मानना है कि परिवार के साथ भोजन करने से बच्चों की खाने-पीने की आदतें बेहतर होती हैं, फिर चाहे परिवार सप्ताह में एक या दो बार ही मिल कर खाना खाएं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चों की खुराक में प्रतिदिन फल और सब्ज़ियों के पांच हिस्से होने चाहिए या उन्हें हर रोज़ लगभग 400 ग्राम फल-सब्जी खाना चाहिए।

द जर्नल ऑफ़ एपिडिमियोलॉजी एंड कम्यूनिटी हैल्थ स्टडी ने पाया कि जो बच्चे हमेशा अपने परिवार के साथ खाना खाते हैं, वे जरूरत के मुताबिक फल-सब्ज़ी खाते हैं। जो परिवार कभी-कभी ही साथ खाना खाते हैं, वहां भी बच्चों की खुराक में फल-सब्यियों की मात्रा तय मात्रा के करीब होती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि मां-बाप और भाई-बहनों को देखने से बच्चे खान-पान की अच्छी आदतें सीखते हैं।

माता-पिता का उदाहरण
इस शोध में दक्षिण लंदन के 52 प्राथमिक स्कूलों के लगभग 2400 के खाने-पीने की आदतों का अध्ययन किया गया। मां-बाप और कार्यकर्ताओं ने स्कूल और घरों की खाने की डायरियों से ये जानकारी इकट्ठी की कि बच्चे दिन भर में क्या खाते हैं और पीते हैं।

साथ ही मां-बाप का फल-सब्ज़ियों के प्रति रवैये के बारे में भी सवाल पूछे गए। जैसे, “औसतन, एक सप्ताह में आपका परिवार एक साथ कितनी बार भोजन करता है?” और “क्या आप अपने बच्चे को खाने के लिए फल-सब्ज़ी काट कर देते हैं?”

अध्ययन में पाया गया कि 656 परिवार ‘हमेशा’ इकट्ठा बैठ कर खाना खाते थे, 768 परिवार ‘कभी-कभी’ ऐसा करते थे जबकि 92 परिवार कभी भी एक साथ बैठ कर भोजन नहीं करते थे।

इससे ये पता चला कि कभी भी एक साथ भोजन नहीं करने वाले परिवारों के बच्चों की तुलना में हमेशा साथ भोजन करने वाले बच्चे 125 ग्राम ज़्यादा और कभी-कभी साथ भोजन करने वाले बच्चे 95 ग्राम ज़्यादा फल-सब्ज़ी खाते हैं। मां-बाप को फल-सब्ज़ी खाते देख और बच्चों के लिए इन्हें काट कर देने से बच्चों में इन खाद्य पदार्थों की मात्रा बढ़ी।

बेहतर भविष्य
ये शोध, मेघा क्रिस्टियन की पीएचडी का हिस्सा था। मेघा के मुताबिक, आधुनिक जीवनशैली इस तरह की है कि अक्सर पूरा परिवार एक साथ बैठ कर भोजन नहीं कर पाता। लेकिन ये शोध दिखाता है कि सिर्फ़ रविवार को भी अगर परिवार एक साथ भोजन करे तो इससे हमारे परिवारों का खान-पान सुधर सकता है।

लीड्स विश्वविद्यालय के फ़ूड साइंस एंड न्यूट्रिशन स्कूल की प्रोफ़ेसर जैनेट केड, जो इस अध्ययन की निरीक्षक थीं, उनका कहना था, “मां-बाप और भाई-बहन क्या खाते हैं, इस बात का असर बच्चों की अपनी खान-पान की आदतों और पसंद पर पड़ता है।”

वहीं ब्रिटिश डायटिक एसोसिएशन की अज़मीना गोविंदजी कहती हैं, “बचपन में जो खाने-पीने की आदतें बन जाती हैं, वो आसानी से नहीं बदलतीं। टीवी के सामने बैठकर जैसे हम बिना सोचे-समझे कुछ भी खाते हैं जिससे मोटापा बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाती है। परिवार के साथ एक मेज़ पर बैठ कर खाने में कुछ भी उलटा-सीधा खाना भी कम हो जाता है। ये अध्ययन दिखाता है कि बच्चे हमारी कथनी से ज़्यादा हमारी करनी से सीखते हैं।”

गोविंदजी एक आहार विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है, “अगर बच्चे बचपन में सही तरीके से खाते हैं, तो आगे चल कर भी वो स्वास्थ्य के लिहाज़ बेहतर विकल्प चुनेंगे। और क्योंकि हमारे भोजन से दिल की बीमारी और टायप 2 डायबीटीज़ जैसी बीमारियों का सीधा संबंध है, इसलिए इनसे बचने के लिए पूरे परिवार का एक साथ मिलकर खाना एक छोटी कीमत है।”

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