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घने बादलों के बीच परमाणु वर्षा का अनुभव

Sat, 01 Dec 2012 02:27 PM IST
Updated Sat, 01 Dec 2012 02:27 PM IST
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experience of atoms rain between clouds

जैसे ही ब्रितानी वायुसेना के फ़्लाइट नेवीगेटर जो पासकिनि के जहाज़ का दरवाज़ा खुला, वो दौड़कर जहाज़ से दूर भाग गए। ये बात है 28 अप्रैल 1958 की और पहली बार ऐसा हुआ था जब पासकिनि को इस तरह से हवाई जहाज़ छोड़कर भागना पड़ा था।

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लेकिन वो हवाई यात्रा भी उनकी दूसरी यात्राओं की तरह नहीं थी। उस ख़ास हवाई यात्रा के दौरान जो पासकिनि और उनके साथियों ने ब्रिटेन के सबसे बड़े परमाणु परीक्षण को बहुत क़रीब से देखा था।
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उन्होंने जानबूझकर अपने विमान को उन बादलों के बीच में घुसा दिया था जो परमाणु परीक्षण के बाद आसमान में रेडियोधर्मी बादल की तरह घिर गए थे।

जब उनका जहाज़ वापस बेस स्टेशन पर पहुंचा तो सबसे पहले उन्हें उस जगह ले जाया गया जो रेडियोधर्मी पदार्थ के संपर्क में आने वालों के इलाज के लिए बनाया गया था।
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शीत युद्ध के दौरान हालांकि एक विश्व शक्ति के रूप में ब्रिटेन की पहचान धीरे-धीरे घटने लगी थी, लेकिन उसी दौरान 1947 में ब्रिटेन ने परमाणु हथियार बनाने का फ़ैसला किया।

परमाणु परीक्षण

अमरीका और रूस पहले ही परमाणु परीक्षण कर चुके थे और इस कड़ी में शामिल होने वाला ब्रिटेन तीसरा देश था।

क़रीब 60 साल पहले अक्तूबर 1952 में ब्रिटेन ने पहली बार परमाणु परीक्षण किया।

उसके बाद भी ब्रिटेन ने कई परीक्षण किए लेकिन प्रशांत महासागर में मई 1957 से सितंबर 1958 के बीच किए गए नौ परीक्षणों ने ब्रिटेन को एक परमाणु शक्ति के रूप में पहचान दी थी।

इन परीक्षणों का कोडनेम ग्रैपल एक्स, वाई और जेड रखा गया था।

जो पासकिनि ने जिस परीक्षण को देखा था, उसका कोडनेम ग्रैपल वाई था और इसमें तीन मेगाटन शक्ति वाले हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया था जो कि अब तक का ब्रिटेन का सबसे शक्तिशाली परमाणु परीक्षण है।

जो पासकिनि इंग्लैंड में चालक दल के साथ अपने दफ़्तर में बैठे, तभी उन्हें फ़ोन पर ऑस्ट्रेलिया जाने की सूचना दी गई।

उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि उन्हें ऑस्ट्रेलिया क्यों बुलाया गया था।

ऑस्ट्रेलिया पहुंचने के बाद जो को बताया गया कि ब्रिटेन परमाणु परीक्षण करने वाला है।

इस पर जो की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं थी। उनका कहना था, ''मुझे ये बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। परमाणु परीक्षण में शामिल सभी लोगों को दरअसल बलि का बकरा बनाया जा रहा था। ''

परीक्षण के दिन पासकिनि सुबह दो बजे उठ गए थे और सूर्य के निकलने से पहले ही अपने साथियों के साथ हवाई जहाज़ में बैठ चुके थे।

पासकिनि के दल को परमाणु परीक्षण के बाद उसके नमूने जमा करने के निर्देश दिए गए थे।

धरती से लगभग 46 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए पासकिनि और उसके साथी काफ़ी उत्तेजित थे।

उन दिनों को याद करते हुए पासकिनि कहते हैं, ''हमलोग बम ले जा रहे विमान को नंबरों की गिनती करते हुए सुन रहे थे।  जैसे ही उन्होंने कहा कि बम गिरा दिया गया है, हमें अपने विमान को उससे दूर भगाना था। ''

वे लोग जहां बम गिराया गया था, उससे केवल 35 मील की दूरी पर थे।

पासकिनि कहते हैं, ''आठ हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर बम फटा था।  हमने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं लेकिन उन बंद आंख़ों से भी हम रौशनी देख सकते थे।  जैसे ही ये हुआ हम लोग वापस भागे। मेरी सीट खिड़की के क़रीब थी जिसके कारण मैंने सारे घटनाक्रम को बहुत क़रीब से देखा। ''

रेडियोधर्मी पदार्थ

अपने अनुभवों को साझा करते हुए पासकिनि कहते हैं, ''मुझे लगता है कि मैंने पहली बार भगवान के चेहरे को देखा। ये सचमुच में अविश्वसनीय और असाधारण था। इसने हमारे दिमाग़ को हिलाकर रख दिया था। ऐसी चीज़े शायद किसी भी ब्रितानी ने पहले कभी नहीं देखी थीं। ''

थोड़ी ही देर में नाभिकीय घने बादल घिरने लगे और जैसे ही पासकिनि ने ऊपर देखा उन्हें रेडियोधर्मी बारिश दिखने लगी।

पासकिनि कहते हैं, ''ऐसा सिर्फ़ एक ही बार हुआ है जब मैंने 46 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर बारिश होते हुए महसूस किया था। ''

उसके बाद रेडियोधर्मिता को मापने के लिए विमान में लगे उपकरणों को चालू कर दिया गया जिसके कारण पासकिनि और उनके साथियों को भी रेडियोधर्मी पदार्थ के संपर्क में आने का ख़तरा बढ़ गया था।

पासकिनि को हवाई जहाज़ उड़ाते हुए एक और परीक्षण देखने का मौक़ा मिला और जब उन्हें विमान उड़ाने से मना कर दिया गया, तब भी उसके बाद ज़मीन से ही सही पासकिनि ने तीन बार परमाणु परीक्षण देखा था।

अब 79 साल के पासकिनि अमरीका में रहते हैं और इस बीच वो सात बार कैंसर से मुक़ाबला कर चुके हैं।

मुआवज़े की लड़ाई

पासकिनि का मानना है कि उनकी और उनके बच्चों की बीमारी का मुख्य कारण परमाणु परीक्षण के दौरान रेडियोधर्मी पदार्थों से उनका संपर्क में आना था।

लेकिन रक्षा मंत्रालय का कहना है कि परमाणु परीक्षण में शामिल रहे अधिकारियों को कैंसर होने की घटना समाज के दूसरे हिस्से के लोगों को कैंसर होने की घटना से अलग नहीं है।


हाल ही में ऐसे कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा कर मुआवज़े की मांग की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी।

अब लगभग 750 ऐसे लोगों ने यूरोप की मानवाधिकार अदालत में गुहार लगाने का फ़ैसला किया है।

लेकिन पासकिनि उन लोगों में से एक नहीं हैं। सरकारी गोपनीयता क़ानून के तहत पासकिनि अपने अनुभवों को किसी और के साथ साझा नहीं कर सकते।

लेकिन आज से तीन साल पहले जब उसने अपने दूसरे साथियों की इस लड़ाई के बारे में सुना तो उन्होंने उनसे संपर्क किया और उनकी मदद करने का आश्वासन दिलाया।

ब्रिटेन सरकार ने भले ही परमाणु परीक्षण में हिस्सा लेने वाले अपने पुराने सिपाहियों को मुआवज़ा नहीं दिया लेकिन अमरीका ने इस तरह के अपने अधिकारियों को ख़ूब मुआवज़ा दिया है।

पासकिनि को इस बात का दुख है कि ब्रिटेन की सरकार ने पासकिनि और उनके साथियों की क़ुर्बानी को नहीं स्वीकार किया।

फिर भी पासकिनि कहते है, ''हमलोग ऐसा कर रहे थे और हम सभी इसके लिए मरने को तैयार थे।''

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