फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Europe ›   building offices of tomorrow

मूड के मुताबिक दफ्तर बदलेगा रंग?

Wed, 16 Jan 2013 11:54 AM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Wed, 16 Jan 2013 11:54 AM IST
विज्ञापन
building offices of tomorrow

इस बात पर बहुत कुछ कहा और सुना जाता है कि आने वाले कल में कामकाज की जगह और दफ्तर की शक्ल-सूरत किस तरह की हो सकती है।

विज्ञापन


तकनीक के विकास ने काम करने के तौर तरीकों को पहले से अधिक लचीला बनाया है। कहा भी गया है, "काम वहां नहीं हैं, जहां आप जाते हैं बल्कि जो आप करते हैं, वही काम है।"

लेकिन जरा सोचिए कि क्या होगा जब आपकी कैंटीन में मिलने वाला खाना आपके ऑफिस की इमारत की दीवारों पर उगाया गया हो। परपंरागत दफ्तरों के विचार से यह एक अलग ख्याल है।
विज्ञापन


आप भले ही शक करें, पर खाना परोसने वाले स्टाफ ऐसा कर चुके होंगे। इस बात के पूरे आसार हैं कि जल्द ही ऐसे लजीज पकवान आपके मेन्यू का हिस्सा होंगे।

अक्लमंद इमारतें
खान-पान का यह विचार हाल ही में 'ब्रिटिश काउंसिल फॉर ऑफिसेज' की एक कॉन्फ्रेंस में पेश किया गया जहां आने वाले कल के दफ्तरों की अक्लमंद इमारतों पर लोगों ने अपने विचार रखे। यूनीवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर डेरेक क्लिमेंट्स क्रूमे कहते हैं कि यह महज तकनीक के बारे में नहीं है, ध्रुवीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के घर भी अक्लमंद इमारतों की श्रेणी में आ सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले वर्षों में आपके दफ्तर की शक्ल बदल सकती है। डिजाइनर ऐसी डिजिटल दीवारों की बात कर रहे हैं जिनमें सेंसर लगे होंगे और जिनसे गुफ्तगू की जा सकेगी। इन दीवारों को दफ्तर में काम करने वाले लोगों के बारे में पता होगा और ये स्टाफ की जरूरत और मिजाज के मुताबिक खुद को ढाल सकेंगे।

तकनीक का कमाल
दीवारों को जीवंत बनाने वाली इस तकनीक को 'नैनो-कोटिंग' का नाम दिया गया है। यह उदास माहौल वाले आपके दफ्तर को जीवंत बना देगी। आप जैसे ही इमारत में प्रवेश करते हैं, आपके काम करने की जगह खुद को आपके आगमन के लिए तैयार करने लगती है।

सिस्को के जॉन मोनागन कहते हैं कि यह कोई विज्ञान फैंटसी नहीं है। सिस्को पहले से ही ऐसी तकनीक के विकास पर काम कर रही है। वह कहते हैं कि जब कोई दफ्तर के परिसर में आएगा, हमारी तकनीक उसे पहचान सकती है और आने वाले को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने की पेशकश कर सकती है। इसे इस्तेमाल करने वाले के लिए यह एक अलग तरह का अनुभव होगा।

खुद को साफ और ठीक करने जैसी नई तकनीकों के विकास के मामले में भवन निर्माण उद्योग विमानन जैसे दूसरे क्षेत्रों के अनुभवों से सीख रहा है। उदाहरण के लिए अपने आप साफ हो जाने वाली कंक्रीट में टायटेनियम डायक्साइड का इस्तेमाल किया जाता है, जो प्रदूषण को उसके रासायनिक घटकों में तोड़ देते हैं। इसके बाद बारिश में दीवारों के धुलने से सफाई हो जाती है।

पेरिस के पास रोइजी-चार्ल्स दे गाउले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एयर फ्रांस का मुख्यालय इस तकनीक से बनी इमारतों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

दोपहर का भोजन
हम सबके सामने एक सवाल रह जाता है कि क्या नई तकनीक हमारे खान-पान के तौर तरीकों में भी बदलाव कर सकती है। ‘मेक आर्किटेक्ट्स’ के शॉन अफ्लेक कहते हैं कि इमारत की दीवारों पर पौधे उगाये जा सकते हैं जो कॉर्बन डायक्साइड सोख लेंगे और ऑक्सीजन छोड़ेंगे। इससे हमें ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने में भी मदद मिलेगी।

शॉन कहते हैं कि पौधे उगाने से शहर जंगलों की तरह राहत दे सकते हैं। जहां हमें सुकून मिलेगा क्यूंकि उनकी नरमी हमारे इर्द-गिर्द रहेगी। शैवाल की हरित शक्ति के दोहन का भी विकल्प खुला हुआ है। यह कॉर्बन डायक्साइड को सोखने और बायोमास के उत्पादन के मामले में कहीं बेहत विकल्प है।

शैवाल उन कचरों का शोषण कर सकता है जोकि किसी इमारत में गैसीय अवस्था में पाए जाते हैं। सफाई करने के बाद इनका इस्तेमाल बायोडीज़ल बनाने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका के एरिजोना प्रांत के रेड हॉक बिजली संयंत्र में पहले से ही इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है।

लेकिन अगर आप अपने दफ्तर को बिजली बनाने के कारखाने में नहीं बदलना चाहते हैं तो आपके पास दूसरे विकल्प भी हैं। अफ्लेक मुंबई की ऐसी ही एक परियोजना का जिक्र करते हुए कहते हैं, जहां एक इमारत में दीवारों पर उगाए गए शैवालों से सौन्दर्य प्रसाधन बनाया जा रहा है। और खान-पान की बातों पर दोबारा लौटते हैं तो इस शैवाल को स्पिरुलिना जैम के पोषक आहार में बदला जा सकता है और जिसे लंच में पास्ते के साथ लिया जा सके।

बाधाएं भी हैं
बेशक यह इतना आसान नहीं है। इसमें कई बाधाएं भी हैं। स्कांशा के निदेशक एंड्रियू हंटर कहते हैं कि कई बेहतरीन विचारों को अमल में लाने के लिए किसी को बड़ा जोखिम लेना पड़ता है। उन्हें बड़ी रकम लगानी पड़ती है और बाकी लोग उसके टुकड़े चुनते हैं। लेकिन कई बड़े खिलाड़ी इसमें लगे हुए हैं और इसका मतलब यह हुआ कि ये अक्लमंद इमारतें पूरी होने को हैं।


आर्थिक मुद्दे पहली बाधा हैं क्योंकि स्टाफ के बाद कंपनियों को सबसे ज्यादा खर्च दफ्तरों पर करना होता है। वो स्वचालित इमारतें जहां तकनीक सुचारू रूप से काम करती है, उनको जारी रखना सस्ता विकल्प है। ये बिजली और पानी की कम खपत करते हैं और इन इमारतों में कचरे का उत्पादन भी कम होता है। और इससे भी बड़ी बात यह है कि कामकाज का बेहतर माहौल सीधे उत्पादकता से जुड़ा होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news, Crime all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed