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बैंकों ने 3.5 लाख लोगों को घर से निकाला
बीबीसी हिंदी
Updated Tue, 04 Dec 2012 01:17 AM IST
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यूरोप के जो देश आर्थिक संकट में फंसे हैं, स्पेन भी उनमें से एक है। इसी संकट की वजह से लाखों को लोगों को बैंकों ने घरों से इसलिए निकाल दिया है, क्योंकि वे अपना लोन नहीं चुका पाए हैं। स्पेन में मंदी इसलिए आई क्योंकि पहले तो वहां प्रॉपर्टी के दाम बेहतहाशा बढ़े लेकिन फिर अचानक ये बुलबुला फूट गया।
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एक अनुमान के अनुसार स्पेन में 2008 के बाद से लगभग साढ़े तीन लाख लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया है। ऐसे में स्पेन में बैकों के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। घर से बेदखल किए गए लोगों में 48 वर्षीय फिदेल पालादेनेसे भी शामिल हैं जिन्होंने स्पेन की राजधानी मैड्रिड के केंद्रीय इलाके में एक बैंक के सामने हफ्तों तक विरोध प्रदर्शन किया।
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बेबस लोग
ये वही बैंक था जिसने उन्हें होम लोन दिया था, लेकिन जब वो लोन नहीं चुका पाए तो बैंक ने उनका घर जब्त कर लिया। पालादेनेसे बताते हैं, "2008 में मेरी नौकरी चली गई और तब से मुझे काम नहीं मिला। इससे पहले मैंने घर खरीदने की सोची क्योंकि मेरे बच्चे बड़े हो रहे थे। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था- पर बैंक ने हमें फंसा लिया। मुझे दो लाख तीन हजार यूरो का लोन दे दिया गया।" पालादेनेसे ही नहीं, बैंकिया बैंक की इस शाखा के सामने कई परिवार हफ्तों तक डेरा जमाए रहे।
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बैंकिया देश के आर्थिक संकट का प्रतीक बन गया है। अब इसमें सरकार की भी हिस्सेदारी है। ये भी उन बैंकों में शामिल है जिन्हें यूरोजोन और स्पेन की सरकार की ओर से पैसा दिया गया है। पिछले महीने एक महिला की आत्महत्या के बाद स्पेन में बैंकों को खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ा है। जैसे ही स्थानीय अधिकारी इस महिला को उसके घर से बेदखल करने के लिए पहुंचे तो उसने चौथी मंजिल पर अपने फ्लैट से झलांग लगी दी थी।
बैंकिया का कहना है कि उन्होंने 2008 के बाद से लगभग ऐसे 80 हजार लोगों को रियायतें दी हैं जो अपने लोन नहीं चुका पा रहे हैं। बैंकों का कहना है कि किसी को उसके घर से बेदखल करना उनके लिए अंतिम विकल्प ही होता है।
बैंकों पर दवाब
स्पेन में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार एल पेस के राजनीतिक संवाददाता कार्लोस क्वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि जब से सरकार ने बैंकों को पैसा देना शुरू किया, तब से सब कुछ बदल गया। हमने बैंकों को अपना पैसा दिया। हम चाहते हैं कि बैंक कम से कम हमारा कुछ साथ तो दें और कुछ बदलाव करें, बड़े बदलाव करें।" लेकिन बैंकों पर जनता और राजनेताओं की तरफ से भारी दबाव है। इसलिए उन्होंने घोषणा की है कि बेहद जरूरतमंद लोगों को अगले दो साल तक उनके घरों से बेदखल नहीं किया जाएगा।
कार्लोस क्वे आगे बताते हैं, "बैंक इतने दबाव में हैं कि पिछले तीन साल में उन्होंने पहली बार कहा है कि ठीक है, हम समस्या को समझते हैं। हम कोशिश करेंगे कि लोगों को उनके घरों से बेदखल न किया जाए। शायद सरकार भी कानून में बदलाव करने जा रही है, क्योंकि इस बात का जोखिम बना हुआ है कि कहीं लोग बैंकों को खिलाफ न हो जाए, जैसा अर्जेंटीना में हुआ था।"
सरकार इस बड़े मुद्दे पर विपक्ष के साथ मिल कर काम कर रही है। लेकिन विभिन्न दलों के बीच इस मुद्दे पर सहमति कम ही नजर आती है। आए दिन स्पेन में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और यूनियन भी बराबर हड़ताल करती रहती हैं।
लेकिन इस विरोध मुहिम के चलते ये उम्मीद भी बेमानी होगी कि सरकार अपनी व्यापक आर्थिक नीति या कड़े बचत कदमों की योजना में बड़े बदलाव करेगी। ऐसे में गरीब होती जा रही स्पेन की जनता के सामने सड़कों पर उतरने के सिवाय कोई विकल्प नहीं नजर आता।