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खतरे की घंटी: 80 के दशक में सालभर में पड़ते थे जितने भीषण गर्मी वाले दिन, अब दोगुनी हुई उनकी संख्या
Tue, 14 Sep 2021 09:29 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लंदन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लंदन
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 14 Sep 2021 09:29 PM IST
सार
50 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाले दिन मुख्त तौर पर दक्षिण एशियाई और खाड़ी देशों में दर्ज किए जाते हैं। लेकिन अब ऐसे दिन गर्मी के मौसम में यूरोप और अमेरिका में भी दर्ज किए गए।
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दुनियाभर में बढ़ रही भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या।
- फोटो : PTI
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विस्तार
दुनियाभर में गर्म दिनों की संख्या अब तेजी से बढ़ती जा रही है। एक विश्लेषण में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते 1980 के दशक में एक साल में भीषण गर्मी (50 डिग्री सेल्सियस तापमान से ज्यादा) वाले जितने दिन पड़ते थे, उसके मुकाबले अब एक साल में भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या दोगुनी हो गई है। इतना ही नहीं यह स्थिति अब उन क्षेत्रों में भी है, जहां पहले गर्मी का प्रकोप ज्यादा नहीं था।
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बीबीसी के मुताबिक, 1980 के बाद से हर दशक में 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले दिनों की संख्या बढ़ी है। 1980 से 2009 के बीच साल में औसतन 14 दिन तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा रहा है। वहीं, 2010 से 2019 के बीच ऐसे भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या साल में 26 तक पहुंच गई। इसी दौरान 45 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाले दिन औसतन दो हफ्ते ज्यादा दर्ज किए गए।
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विश्लेषण में कहा गया है कि भीषण गर्मी के दिन इंसानों और प्रकृति के लिए जानलेवा हो सकते हैं और इनसे सड़कों, इमारतों और ऊर्जा प्रणाली पर भी असर पड़ता है। 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले ज्यादातर दिन मुख्त तौर पर दक्षिण एशियाई और खाड़ी देशों में दर्ज किए जाते हैं। लेकिन अब ऐसे दिन गर्मी के मौसम में यूरोप और अमेरिका में भी दर्ज किए गए। जहां इटली में इस साल तापमान 48.8 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया, वहीं कनाडा में थर्मामीटर का कांटा 49.6 डिग्री पर था। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जल्द ही जीवाश्म ईधन का इस्तेमाल बंद नहीं किया गया, तो ठंडे देशों में भी 50 डिग्री तापमान पार होना शुरू हो जाएगा।
बीते दशक आधा डिग्री तक बढ़ा वैश्विक तापमान
इस विश्लेषण में ये भी पाया गया कि पिछले दशक में अधिकतम तामान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई। लेकिन दुनिया के कुछ हिस्सों में ये बढ़ोतरी औसत से ज्यादा रही। पूर्वी यूरोप, अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से और ब्राजील में तो औसत तापमान में 1 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि आर्कटिक और दक्षिण एशियाई देशों में यह बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियस तक रही।
क्या होता है भीषण गर्मी का असर?
अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक, अगर ग्लोबल वॉर्मिंग में इसी तरह बढ़ोतरी जारी रही तो 2100 तक दुनियाभर के 1.2 अरब लोग भीषण गर्मी के दायरे में आ जाएंगे। यानी आज गर्मी से प्रभावित लोगों के मुकाबले 79 साल बाद इसकी जद में आए लोगों की संख्या चार गुना होगी। इसका सबसे बुरा असर जमीन पर पड़ता है, जो धीरे-धीरे सूखने के बाद बंजर हो जाती है। इराक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां किसानों की हरी-भरी धरती कुछ ही सालों में रेगिस्तान जैसे इलाके में तब्दील हो गई।