फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   congress leader rahul gandhi invited 15 opposition parties leaders on breakfast to counter modi government

सियासत: 'लुटियन दिल्ली' से बाहर मोहल्ले तक 'विपक्षी साइकिल यात्रा' पहुंची, तो परेशान हो जाएगी भाजपा!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 03 Aug 2021 05:07 PM IST
सार

'विपक्ष, जिसने साइकिल यात्रा में भाग लिया है, उसके पास भावना तो है, लेकिन 'सीमेंट' नहीं है। वह सीमेंट जो विपक्ष में एक मजबूत जोड़ लगा सके। ऐसा जोड़ जो चुनाव तक सभी को साथ ले जाए। अभी तो महज एक सुगंध है।'

विज्ञापन
congress leader rahul gandhi invited 15 opposition parties leaders on breakfast to counter modi government
साइकिल चलाते हुए राहुल गांधी - फोटो : Agency

विस्तार

संसद का मानसून सत्र, 'सत्ता और विपक्ष' के बीच चले रहे गतिरोध की भेंट चढ़ रहा है। रोजाना कुछ देर की 'कार्यवाही' के बाद लोकसभा और राज्यसभा को स्थगित कर दिया जाता है। विपक्ष, पेगासस और किसानों के मुद्दे पर सदन में चर्चा के लिए अड़ा है। सरकार, विपक्ष को सदन न चलने के लिए जिम्मेदार ठहराती है। विपक्षी दलों को अब सरकार का रुख समझ आने लगा है। आठ माह से किसानों के मामले में केंद्र सरकार टस से मस नहीं हुई। अब 'पेगासस' पर चर्चा के लिए तैयार नहीं है। इससे विपक्ष आहत हुआ है। उसे भविष्य की मुसीबतें साफ दिख रही हैं।

विज्ञापन


राजनीतिक विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, इसी वजह से मंगलवार को 15 राजनीतिक दल, राहुल गांधी के नाश्ते पर पहुंच गए। राहुल ने नारा दिया, 'एकमात्र प्राथमिकता-हमारा देश, हमारे देशवासी'। इसके बाद साइकिल यात्रा संपन्न हो गई। अगर लुटियन दिल्ली से बाहर गांव देहात की गलियों और शहरों के मोहल्लों तक 'विपक्षी साइकिल यात्रा' पहुंचती है तो भाजपा परेशानी में आ सकती है। अन्यथा, ट्वीटर पर वीडियो डालकर विपक्षी दलों के नेता खुद को कुछ देर के लिए खुश रखेंगे, इससे ज्यादा साइकिल यात्रा के कोई मायने नहीं हैं।

विज्ञापन

विपक्षी एकता संभव, बशर्ते हर पार्टी अपने धर्म का निर्वाह करे  

लोकतंत्र का व्याकरण इतना आसान नहीं है। लोग, जिस पार्टी को बहुमत देते हैं, उसे एकाएक अल्पमत में ला देना, ऐसा बहुत कम संभव होता है। ये उसी स्थिति में हो सकता है, जब जनहित की पूरी तरह अनदेखी हो रही हो और विपक्ष, छोटे से छोटे मुद्दे पर सरकार को घेर रहा हो। डॉ. आनंद कुमार के मुताबिक, विपक्षी एकता तभी संभव हो पाती है, जब हर पार्टी अपने धर्म का निर्वाह करे। विपक्षी दलों में भी दो तरह के विरोधी हैं। एक, पूर्ण विरोधी जैसे कांग्रेस व सीपीआई आदि। दूसरा, आंशिक विरोधी जैसे बसपा, सपा, अकाली दल व जेडीयू आदि। इसके बाद कुछ दल सामाजिक आधार, सिद्धांत और कार्यक्रम के आधार पर बंटे होते हैं। जैसे कोई सवर्ण एवं पिछड़ों को लेकर चलता है। कोई नौकरी पेशा और मजदूरों की बात करता है। कार्यक्रम भी अलग-अलग होते हैं। जैसे एक राजनीतिक दल का मुख्य फोकस सिविल कोड या राम मंदिर है तो दूसरी पार्टी दलित उत्थान के एजेंडे पर आगे बढ़ती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

नए सामाजिक आधार तलाश रही है भाजपा

भाजपा को लंबे समय तक सत्ता में रहना है तो उसे अपने परंपरागत सिद्धांतों और सामाजिक आधार को बदलना होगा। डॉ. आनंद कुमार बताते हैं, भाजपा अब इसी लाइन पर चल रही है। मंत्रिमंडल विस्तार में इसकी झलक देखने को मिली है। उसके बाद पिछड़ा वर्ग को मेडिकल में आरक्षण भी उसी बदलाव का हिस्सा है। भाजपा को अब यह समझ आ रहा है कि पुराने सिद्धांतों और कार्यक्रमों में दरार आ रही है। यही वजह है कि पार्टी को अब नए सामाजिक आधार तलाशने पड़ रहे हैं। पेगासस, इस मुद्दे को आम लोग नहीं समझ रहे हैं। विपक्षी दल, पेगासस को लेकर संसद नहीं चलने दे रहे हैं, लेकिन इसका राजनीतिक फायदा उन्हें नहीं मिलेगा। वह इसलिए कि लोग पेगासस के बारे में ज्यादा नहीं जानते। वे इतना जानते हैं कि राजा कोई भी हो, ऐसे हथकंडे अपनाता है। चाणक्य नीति में इस तरह की अनेकों बातें पढ़ने को मिल जाएंगी। लोगों को किसानों का मुद्दा पता है, महंगाई के बारे में जानते हैं, दवा, शिक्षा और बेरोजगारी की समस्या से वे जूझ रहे हैं। भाजपा को अब ऐसे मसलों पर नोटिस करना होगा। इन्हें अब दरकिनार नहीं किया जा सकता।





 

विरोधी दलों के पास भावना तो है, लेकिन सीमेंट नहीं है...

विपक्ष, जिसने साइकिल यात्रा में भाग लिया है, उसके पास भावना तो है, लेकिन 'सीमेंट' नहीं है। वह सीमेंट जो विपक्ष में एक मजबूत जोड़ लगा सके। ऐसा जोड़ जो चुनाव तक सभी को साथ ले जाए। अभी तो महज एक सुगंध है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी की भारी विजय के बाद भी विपक्षी एकता का मैसेज नहीं गया। क्योंकि चुनाव के दौरान विपक्षी एकता लोगों की नजरों में नहीं आई। अगर विपक्ष को जनता का आशीर्वाद नहीं मिलता है तो साइकिल यात्रा के कोई मायने ही नहीं है। इसके लिए पूरे देश में साझा कार्यक्रम चलाना होगा। आमजन को उनके पास जाकर 'विपक्षी साइकिल यात्रा' का मतलब समझाना पड़ेगा।

लुटियन की बजाए मोहल्लों में जब साइकिल यात्रा पहुंचेगी, तभी लोगों को विपक्षी एकता पर भरोसा होगा। चाय-नाश्ते के अलावा 'विपक्षी' धर्म का पालन करना होगा। ऐसा नहीं है कि एक वीडियो बनवाकर चुप बैठ गए। इससे जनता में कोई संदेश नहीं जाएगा। यूपी में गठबंधन का अच्छा इतिहास नहीं रहा। कांग्रेस को अपनी परंपरागत दावेदारी छोड़नी होगी, सपा उसकी बात कितना मानेगी, ये बैठ कर तय करना पड़ेगा। क्षेत्रीय पार्टियां कितना पीछे हटेंगी, ये बातें बहुत अहम हैं। दावत पर एकता निर्माण तो ठीक है, लेकिन इसकी सार्थकता तो तभी मालूम होगी, जब ये सब लोग एक साथ आमजन के पास जाएंगे। असल एकता का निर्माण तो लोगों के बीच होगा। वहां जाने के लिए विपक्ष को साझा कार्यक्रम तय करना पड़ेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed