चीन क्यों बन गया है अमेरिका का 'दुश्मन नंबर वन'?
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विश्लेषकों ने जैसे अनुमान लगाए थे, उससे कहीं अधिक रफ्तार से चीन की सेना का आधुनिकीकरण हो रहा है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक स्टडीज यानी आईआईएसएस के विशेषज्ञों ने अब कहा है कि अब अमेरिका अपनी सेना का मुकाबला रूस से नहीं बल्कि चीन से करेगा, खासकर समंदर में और हवा में। यानी चीन की नेवी और वायु सेना अमेरिका को टक्कर देने की तैयारी में है।
हालाँकि थल सेना की बात करें तो अमेरिका अब भी दुनियाभर में अपना मुकाबला रूस से ही मानता है। तो पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया कि चीन की सेना का कायाकल्प होने जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि चीन की सेना पहले भी दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में शुमार रही थी, लेकिन चीन अपना असल प्रतिद्वंद्वी रूसी फौजियों को ही मानता रहा था।
ऐसा नहीं है कि 1959 से दुनियाभर के देशों में सैन्य तैयारियों पर होने वाले खर्च पर निगरानी रखने वाली संस्था आईआईएसएस के विशेषज्ञों की ही ऐसी राय हो, दूसरे कई जानकारों का भी ऐसा ही मानना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी सेना का आधुनिकीकरण और तकनीकी दक्षता का कोई मुकाबला नहीं है। चीन की सेना की कुछ उपलब्धियों को देखिए- उनकी लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लेकर फिफ्थ जेनरेशन के लड़ाकू विमानों तक। पिछले साल चीन ने समंदर में अपनी ताकत बढ़ाने का एक और कारनामा किया- जंगी जहाज टाइप 55 क्रूजर।
चीन एक और विमानवाहक पोत तैयार कर रहा है और साथ ही मिलिट्री कमांड का अपना पूरा ढांचा भी बना रहा है ताकि एक ऐसा मुख्यालय तैयार हो सके जिसमें सेना की सभी शाखाएं शामिल हों।
चीन को अपनी सेना की ताकत बढ़ाने के लिए रूस से तकनीकी मिली
तोप से गोले दागने की बात हो, मिसाइलों की, हवाई कवच की बात हो या फिर जमीन पर हमला बोलने की, एशिया की इस महाशक्ति के पास हर वो हथियार मौजूद है जो किसी भी दुश्मन के दांत खट्टे कर सकता है। यही नहीं अगर हमलावर दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका भी हो तो उसे भी चीन से कड़ी टक्कर मिलेगी।
1990 के दशक में चीन को अपनी सेना की ताकत बढ़ाने के लिए रूस से तकनीकी मिली थी, इसके बाद चीन की नौसेना ने पनडुब्बियों की तादाद बढ़ाने का फैसला किया। चीन अपनी हवाई ताकत बढ़ाने के लिए अपने जखीरे में एक और लड़ाकू विमान शामिल करने को तैयार है। चीन की सरकार का कहना है कि जे-20 विमान जल्द ही चीन की सीमाओं की रक्षा करने में लग जाएंगे।
हालांकि जे-20 की मारक क्षमता को लेकर आईआईएसस के जानकारों को संदेह है। इस साल प्रकाशित आईआईएसएस की रिपोर्ट कहती है, "चीन की वायुसेना को अभी इस नए जेट को निरंतर विकसित करने की जरूरत है ताकि चौथी पीढ़ी के इस लड़ाकू विमान को फिफ्थ जेनरेशन का लड़ाकू विमान बनाया जा सके।"
रिपोर्ट में कहा गया है, "चीन की तरक्की किसी से छिपी नहीं है। वो इस जेट को अपनी वायुसेना में शामिल कर सकता है ताकि हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की उसकी मारक क्षमता पश्चिमी देशों के बराबर हो जाए।"
अमेरिका और उसके सहयोगी शीतयुद्ध के दौर के बाद से ही अपनी हवाई ताकत बढ़ाने में जुटे हैं और इस दौरान उन्होंने अपने कुछ ही जंगी जहाज गंवाए हैं। चीन, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल विकसित कर रहा है जो कि टैंकर और कमांड एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट को तबाह कर सकती है।
चीन साल 2020 तक ऐसी मिसाइल को तैयार कर लेगा
जानकारों का मानना है कि चीन साल 2020 तक ऐसी मिसाइल को तैयार कर लेगा। इस खबर से अमेरिका और उनके सहयोगियों का घबराना लाजिमी है और वे चीन की इस रणनीति की काट ढूँढने के लिए मजबूर होंगे। उन्हें नई तकनीक तो तैयार करनी ही होगी, हवा में अपनी मारक क्षमता बढ़ाने पर भी काम करना होगा।
हैरानी ये है कि समंदर और हवा में चीनी सेना जितनी मजबूती से आगे बढ़ रही है, जमीन पर उसकी तरक्की की रफ्तार वैसी नहीं है। आईआईएसएस के मुताबिक थल सेना को अत्याधुनिक बनाने के लिए जिस तरह के हथियार चाहिए, चीन के पास सिर्फ इसके आधे हैं। बावजूद इसके चीन ने इस क्षेत्र में जमकर तरक्की की है।
चीन ने सेना के यांत्रिकीकरण के लिए साल 2020 को लक्ष्य बनाया है। इसे चीन ने इन्फॉर्मेशन भी नाम दिया है। इस शब्द का मतलब क्या है, ये तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन चीन लड़ाई में इन्फॉर्मेशन की भूमिका की लगातार निगरानी कर रहा है और अपने हालात के मुताबिक इसे जरूरी बदलावों के साथ अपनाना चाहता है।
अब इस सैन्य ताकत के दम पर चीन की रणनीति साफ है- अगर अमेरिका के साथ जंग छिड़ती है तो जहाँ तक संभव हो उसे अपनी सीमा से दूर रखा जाए और जंग का मैदान प्रशांत महासागर को बनाया जाए। यानी सैन्य शब्दावली में कहें तो दुश्मन को अपने इलाके में फटकने न दिया जाए और जंग उस जगह लड़ी जाए जहाँ दुश्मन कमजोर हो और आप दुश्मन पर भारी हों।
लेकिन चीन का यही एकमात्र लक्ष्य नहीं है। चीन दुनिया को सैन्य साजोसामान भी बेचना चाहता है और इस मामले में भी वो अमेरिका को पीछे छोड़ देना चाहता है। टार्गेट एकदम साफ है, चीन उन देशों को सैन्य तकनीकी का निर्यात करेगा जो अमेरिका के करीबी नहीं हैं। मिसाल के तौर पर चीन अपनी ड्रोन तकनीक को अधिक से अधिक देशों को बेचने का इरादा रखता है।
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अमेरिका ने अपनी ड्रोन टेक्नोलॉजी किसी भी देश को देने से इनकार किया है। हां, नेटो में अमेरिका के सहयोगी ब्रिटेन और फ्रांस इस मामले में अपवाद हैं।
अमेरिका अपनी ड्रोन तकनीक को किसी देश को नहीं बेचेगा
चीन ने ड्रोन के निर्यात को लेकर ऐसी कोई नीति नहीं बनाई है और उसने दुनियाभर में सैन्य प्रदर्शनियों में अपने ड्रोन्स का प्रदर्शन किया है। आईआईएसएस के मुताबिक चीन ने मिस्र, नाइजीरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और बर्मा को ड्रोन बेचे हैं।
अब ड्रोन के मामले में ही देख लीजिए, अमेरिका ने नीति बनाई कि वो अपनी ड्रोन तकनीक को किसी देश को नहीं बेचेगा, तो चीन ने इसके उलट एलान कर डाला कि वो अपनी ड्रोन तकनीक को दूसरे देशों को निर्यात करने को लेकर बेताब है।
बेशक, अब अमेरिका और उसके दूसरे सहयोगी देश सैन्य हथियारों को बेचने के मामले में चीन को अपना दुश्मन नंबर एक मानेंगे। ऐसा तकरीबन एक दशक पहले तक नहीं था और तब अमेरिका रूस को ही अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता था।
ये बात बहुत पुरानी नहीं है जब अच्छी गुणवत्ता के सामान के मामले में चीन को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता था। लेकिन आज की हकीकत ये है कि चीन के हथियार अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों को गुणवत्ता ही नहीं, कीमत के मामले में भी मात दे रहे हैं।
चीन का दावा है कि ऐसे 75 फीसदी हथियारों को वो पश्चिमी देशों के मुकाबले आधी कीमत पर बेचता है जिनकी तकनीक पश्चिमी देशों के मुकाबले की ही है।