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ऐसा 'अनहैकेबल' कम्युनिकेशन नेटवर्क जिससे दुनिया नहीं जान पाएगी चीन के 'सीक्रेट'

Wed, 26 Jul 2017 01:00 PM IST
BBC
BBC Updated Wed, 26 Jul 2017 01:00 PM IST
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Now the world will not know the 'Secret' of China
कम्युनिकेशन नेटवर्क - फोटो : BBC

दुनिया भर में साइबर हमलों के बढ़ते मामलों और खतरों के बीच चीन एक ऐसा कम्युनिकेशन नेटवर्क लांच करने जा रहा है जो 'अनहैकेबल' होगा, यानी जिसमें सेंध लगाना संभव नहीं होगा। कम से कम ये इस मायने में बेहतर होगा कि इसमें किसी भी प्रकार की हैकिंग की कोशिश का तुरंत पता लगा लिया जाएगा। इस नई तकनीक को क्वांटम क्रिप्टोग्राफी कहा जा रहा है और पारंपरिक क्रिप्टोग्राफी के तरीकों से इसे बिल्कुल अलग माना जा रहा है। चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार जिनान प्रांत में इस पर किए जा रहे काम को 'मील का पत्थर' कहा गया है।

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लेकिन ये प्रोजेक्ट एक बड़ी कहानी का हिस्सा है- चीन उस तकनीक में आगे बढ़ना चाहता है जिसमें पश्चिमी देश हमेशा से निवेश करने में डरते रहे हैं। जिनान में बनाए जा रहे इस नेटवर्क में सेना, सरकार, वित्तीय संस्थान और बिजली विभाग से जुड़े करीब 200 कर्मचारी अपने संदेश सुरक्षित तरीके से भेज सकेंगे, इस जानकारी के साथ कि केवल वो ही इन संदेशों को पढ़ पा रहे हैं।
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क्वांटम कम्युनिकेशन में चीन के आगे बढ़ने का मतलब है कि वो ऐसे सॉफ्टवेयर बनाएगा जो इंटरनेट में मौजूद खामियों को दूर कर उसे मजबूत बनाएंगे और भविष्य में अन्य देश भी चीन से इस तरह के सॉफ्टवेयर खरीद सकते हैं। 

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Now the world will not know the 'Secret' of China
leser beam - फोटो : BBC

अगर आप इंटरनेट पर सुरक्षित तरीके से संदेश भेजना चाहते हैं तो पारंपरिक एन्क्रिप्शन संदेश पढ़ने के लिए जरूरी की (चाबी) को गणित के कठिन आंकड़े के रूप में छिपा देता है। लेकिन गणित की बात करें तो 'कठिन' की परिभाषा क्या है? इसका मतलब है कि आपको तेजी से नंबरों के बड़े संयोजन के बारे में सोचना पड़ेगा। साल 2017 की बात करें तो इसका मतलब है एक फास्ट और बेहतर कंप्यूटर।

जैसे-जैसे कंप्यूटर बेहतर बनते जा रहे हैं नंबरों पर आधारित एन्क्रिप्शन में ये संयोजन भी अब और बड़े होते जा रहे हैं। एन्क्रिप्शन की भी एक सीमा है और धीरे-धीरे ये तरीका भी कमजोर होता जा रहा है। माना जा रहा है कि क्वांटम कंप्यूटर्स के बनने के साथ नंबरों को छोटा करने की तकनीक में बड़ा बदलाव आएगा और इससे आधुनिक एन्क्रिप्शन सॉफ्टवेयर को और भी मजबूत किया जा सकेगा।

क्वांटम कम्युनिकेशन अलग तरीके से काम करता है- अगर आपको एक बेहद सुरक्षित संदेश भेजना है तो आप अलग से इसे खोलने की चाबी (की) भेजेंगे, वो भी लाइट पार्टिकल के रूप में। इसके बाद ही आप असल संदेश को एन्क्रिप्ट कर उसे भेज सकते हैं। संदेश पाने वाले को पहले से मिली चाबी के जरिए आपके संदेश को खोल कर पढ़ना होगा। क्वांटम 'की' की सबसे बढ़िया बात ये है कि अगर कोई लाइट पार्टिकल्स को पढ़ने की कोशिश करता है तो वो उसके स्परूप को बदले बिना संभव नहीं होगा, यानी हो सकता है कि चाबी(की) बदल जाए या फिर नष्ट ही हो जाए। इसका मतलब है कि संदेश भेजने वाले और पाने वाले दोनों को ही किसी भी तरह की हैकिंग की कोशिश का तुरंत ही पता लग जाएगा और इस तरह ये लगभग 'अनहैकेबल' कहा जा सकता है।

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Keyboard - फोटो : BBC

सवाल यह उठता है कि अगर क्वांटम कम्युनिकेशन वाकई में इंटरनेट पर भेजे जाने वाले संदेशों को इतना ही सुरक्षित बना देता है तो चीन इसमें सबसे आगे क्यों है? लंदन के इंपीरियल कॉलेज के प्रोफेसर म्यूंगशिक किम कहते हैं, "लंबे समय तक तो लोगों को लगा ही नहीं कि उन्हें इसकी जरूरत है।" वो कहते हैं कि इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी कि बाजार में इस तकनीक की मांग होगी भी या नहीं।

वो कहते हैं, "आज के दौर में संदेशों के एन्क्रिप्ट करने के लिए नंबरों की जो व्यवस्था थी वो इतनी शानदार थी कि किसी ने नई तकनीक के इस्तेमाल के बारे में सोचा ही नहीं।" इस मामले में शोध पहले से ही मौजूद है और इसमें चीन आगे नहीं है. लेकिन जिस मामले में चीन को बढ़त हासिल है वो है इसका इस्तेमाल।

इस तकनीक पर पहले काम करने वालों में से एक विएना यूनिवर्सिटी में क्वांटम फिजिसिस्ट प्रोफेसर ऐंटोन जेलिंगर कहते हैं, "यूरोप ने इसके पहले इस्तेमाल का मौका गंवा दिया है।" वो कहते हैं कि उन्होंने 2014 में यूरोपीय संघ को इस बारे में विश्वास दिलाने की कोशिश की थी ताकि क्वांटम तकनीक पर हो रहे काम के लिए अधिक धम मिल सके लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वो कहते हैं, "अब यूरोप इस मामले में अब पिछड़ गया है और इस कारण हम भी इसमें बराबरी नहीं कर सकते." हालांकि अमेरिका और यूरोप में क्वांटम की पर आधारित नेटवर्क काम कर रहे हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर शोध से जुड़े हैं ना कि व्यावसायिक संस्थाओं से।

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Encryption - फोटो : BBC

एक मुश्किल तो ये है कि जिनान नेटवर्क जैसा कार्यक्रम चलाना काफी महंगा काम है और अगर इसके लिए कोई बाजार न ढ़ूंढ़ा गया तो इसके लिए सरकार या निवेशकों से आर्थिक मदद पाना मुश्किल हो सकता है। सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर क्वांटम टेक्नोलजी के वैलेरियो स्करानी कहते हैं, "हमें मानना पड़ेगा कि चीन इस काम में निवेश कर रहा है, वो आर्थिक रूप से मजबूत हैं और उनके पास लोग हैं जो कि शायद अमेरिकी सेना के सिवा और किसी के पास नहीं।" चीन ने जो क्वांटम कम्यूनिकेशन सॉफ्टवेयर बनाए हैं उनमें केवल जिनान नेटवर्क ही नहीं है।

बीते साल चीन से केबल तारों से न नापी जा सकने वाली जगहों के बीच क्वांटम कम्युनिकेश नेटवर्क का परीक्षण करने के लिए एक उपग्रह छोड़ा था। देश के दो मुख्य शहरों बीजिंग और शांघाई के बीच एक लिंक भी बनाया गया था ताकि इसका टेस्ट कर हैकिंग का पता लगाया जा सके।

हालांकि क्वांटम कम्युनिकेशन भविष्य में पारंपरिक एन्क्रिप्शन की जगह लेगा या नहीं अभी इस बारे में साफ तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इसका इस्तेमाल करने वालों को लगता है कि इसकी संभावनाए हैं और इसे बनाने और इससे जुड़े सॉफ्टवेयर को बनाने और उसका परीक्षण करने वालों में चीन सबसे आगे होगा। प्रोफेसर जेलिंगर कहते हैं, "ये कुछ ऐसा होगा कि जब तकनीक ने अपना बाजार खुद ही तलाश लिया हो।" जब चीनी कंपनियां इस तकनीक को बाजार में उतारेंगी तो हो सकता है कि सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय बैंक ही इसे खरीदने के लिए पहले आगे आएं।

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