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चीन में कागज की मुद्रा देख हैरान हुए थे मार्को पोलो

Tue, 08 Aug 2017 06:39 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Tue, 08 Aug 2017 06:39 PM IST
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Marco Polo was surprised to see the  paper currency in China
मार्को पोलो 1271 ईसवी में चीन आए थे

आज से करीब 750 साल पहले वेनिस के एक युवा सौदागर मार्को पोलो ने अपनी चीन यात्राओं का आश्चर्यजनक वृतांत लिखा था। इसका नाम 'दुनिया के अजूबों की किताब' है और इसमें दुनिया के उन अनोखे तौर-तरीकों का जिक्र है, जिनके वह साक्षी रहे। मगर इनमें एक अनुभव इतना असाधारण था कि वह हैरान रह गए। उन्होंने लिखा है, 'मैं कैसे भी बताऊं, मगर आपको यकीन नहीं दिला पाऊंगा कि जो कह रहा हूं वह एकदम सच है।'

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किस बात को लेकर उलझे थे पोलो?
वह एक ऐसे आविष्कार से रूबरू होने वाले पहले यूरोपियन थे जो आज की अर्थव्यवस्था का आधार है- पेपर मनी या कागज की मुद्रा। मजेदार बात यह है कि आज के करंसी नोट कागज से नहीं बल्कि कॉटन या प्लास्टिक फाइबर से बने होते हैं। इसी तरह से चीन की जिस मुद्रा ने मार्को पोलो को हैरान किया था, वह भी पेपर की नहीं बनी थी।
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इसे पेड़ की छाल से तैयार की गई पट्टी से बनाया जाता था और इसपर पर कई अधिकारियों के दस्तखत होते थे। इसपर चंगेज खान की लाल रंग की एक चमकीली मुहर भी होती थी। जिस वक्त मार्को पोलो चीन गए थे, उस वक्त वहां कुबलई खान का शासन था जो चंगेज खान के पोते थे। मार्को पोलो की किताब में इस विषय के अध्याय का शीर्षक भी बहुत लंबा था- 'महान खान कैसे पेड़ों की खाल से पेपर जैसा कुछ बनाते हैं और वह पूरे देश में मुद्रा के रूप में चलता है।' नई बात यह थी कि जिस तरह से सिक्कों की कीमत उनमें मौजूद चांदी या सोने के मूल्य के बराबर होती थी, नोटों के साथ ऐसा नहीं था। इनकी कीमत सरकार तय करती थी।
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कागज की मुद्रा को अक्सर 'फिएट मनी' कहा जाता है। लैटिन में फिएट का मतलब है- यह इतना होगा (मूल्य)। मार्को पोलो इस सिस्टम से बहुत प्रभावित हुए जिसमें छाल का विनियम इस तरह से होता था मानो वह सोना या चांदी हो।

सचुआन के व्यापारियों के लिए यह बड़ी सिरदर्दी थी।

Marco Polo was surprised to see the  paper currency in China
लोहे के सिक्के

जो सोना चलन में नहीं था, वह कहां था?

सोना शासक की निगरानी में रखा गया था। पेड़ों की छाल से बनाए गए नोट मार्को पोलो को पता लगने से कई साल पहले से चलन में थे। इनका चलन करीब 3 शताब्दी पहले शुरू हुआ था। साल 1000 में चीन सी सचुआन प्रांत में इसकी शुरुआत हुई थी जो अपनी पाक शैली के लिए प्रसिद्ध है। सचुआन सीमावर्ती इलाका था। इसकी सीमाएं उन देशों से लगती थी जो अक्सर वैर रखते थे। चीन के शासक नहीं चाहते थे कि सोने या चांदी के कीमती सिक्के सचुआन से विदेशियों के हाथ चले जाएं।

तब उन्होंने नियम बनाया जो थोड़ा पागलपन भरा लगता है- सचुआन को लोहे से बने सिक्के इस्तेमाल करने होते थे।

लोहे के सिक्के ज्यादा व्यावहारिक नहीं थे

अगर आप मुट्ठी भर चांदी के सिक्कों, मान लीजिए 50 ग्राम, को बदलवाना चाहें तो आपको लोहे के इतने सिक्के मिलेंगे कि उनका वजन आपके भार से ज्यादा हो जाएगा। अगर आप बाजार में कुछ खरीदने जाएं तो हो सकता है कि सामान खरीदकर लौटते वक्त के मुकाबले जाते समय आपके बैग का वजन ज्यादा हो।

सचुआन के व्यापारियों के लिए यह बड़ी सिरदर्दी थी।

सोने और चांदी के सिक्कों को इस्तेमाल करना गैर-कानूनी था और लोहे के सिक्के इस्तेमाल करना अव्यावहारिक था। जाहिर है, ऐसे में उन्होंने विकल्पों की तलाश शुरू की। विकल्प को नाम दिया गया- जियाओजी या विनियम वाले नोट। वे वचनात्मक नोट थे। कई किलो सिक्के उठाने के बजाय एक जाना-माना और भरोसेमंद सौदागार वचनात्मक नोट जारी करता जिसमें उसने किसी और समय अपने बिल अदा करने का वादा किया होता। उस समय जब लेनदेन करना सभी के लिए सुविधाजनक हो।

इस सिस्टम में कई खामियां थीं यह बहुत सरल सा विचार था मगर तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी। इन नोटों का खुला चलन शुरू हो गया। मान लीजिए कि मैं मिस्टर जैंग को कुछ चीजें बेचता हूं और बदले में मुझे वह वचनात्मक नोट दे देते हैं। फिर मैं आपके पास कुछ खरीदने आता हूं। लोहे के सिक्के देने के बजाय मैं आपको वचनात्मक नोट दे सकता हूं। मगर मेरे लिए सुविधाजनक यह रहेगा कि मैं आपको वही नोट दे दूं जो मैंने मिस्टर जैंग से लिया है। क्योंकि हम दोनों ही जानते हैं कि जैंग भरोसे के काबिल हैं।

ऐसे में आपने, मैंने और जैंग ने मिलकर एक तरह से पेपर मनी का शुरुआती संस्करण तैयार कर लिया। यह अदा करने के वचन वाला पेपर था और इसकी कीमत थी। इसे बिना भुनाए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर किया जा सकता था। मगर मिस्टर जैंग बहुत खुश हैं क्योंकि उनका नोट एक आदमी से दूसरे आदमी के पास जा रहा है और उन्हें लोहे के सिक्कों से पेमेंट करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही। यह तो एक तरह से ऐसा था कि जब तक आपका वचनात्मक नोट सर्कुलेट हो रहा है, तब तक आपको बिना ब्याज वाला लोन मिला हुआ है। या फिर यह एक ऐसा लोन है जो आपको कभी चुकाना ही नहीं।

ऐसे में चीन के प्रशासन ने इन नोटों को जारी करने को लेकर नियम बना दिए कि किन परिस्थितियों में कैसे इन्हें जारी किया जा सकता है। मगर जल्द ही उन्होंने प्राइवेट जियाओजी पर बैन लगा दिया और इस काम को अपने हाथों में ले लिया।

कामयाब रहे आधिकारिक पेपर नोट

Marco Polo was surprised to see the  paper currency in China
एक नोट पर मार्को पोलो

कामयाब रहे आधिकारिक पेपर नोट

आधिकारिक जियाओजी कामयाब रहे। ये कई हिस्सों में चलन में आए, देश से बाहर भी। ये लोहे के सिक्कों से कहीं ज्यादा कीमती थे क्योंकि इन्हें आसानी से ले जाया जा सकता था। शुरू में सरकार द्वारा जारी किए गए जियाओजी को प्राइवेट जियाओजी की ही तरह आसानी से भुनाया जा सकता था। यह काफी तार्किक सिस्सटम था। कागज के नोटों में उनकी असली कीमत लिखी होती थी। मगर फिर सरकार ने 'फिएट सिस्टम' जारी किया। नियम वही रखे मगर धातु के जियाओजी में पेमेंट करना बंद कर दिया। अगर आप पुरानी जियाओजी लेकर राजकोष जाते तो आपको नए जियाओजी दे
दिए जाते। यह एक नया कदम था।

आज यह है व्यवस्था

आज हम दुनियाभर में जो मुद्रा इस्तेमाल करते हैं, उसे सेंट्रल बैंक तैयार करते हैं। इनमें पुराने नोटों को उतने ही मूल्य के नए नोटों से बदला जाता है। अब हम उस दौर में नहीं रहे कि मिस्टर जैंग का नोट बिना चार्ज किए सर्कुलेट होता रहता है। मगर अब सरकारी वचनात्मक नोट सर्कुलेट होते रहते हैं। सरकार के लिए 'फिएट मनी' काफी फायदेमंद थी। अगर सरकार को ज्यादा बिल चुकाने होते तो वह आराम से ज्यादा मुद्रा छाप सकती है। मगर जिस स्थिति में चीजों और सेवाओं के बदले मुद्रा ज्यादा हो जाए, वहां पर कीमतें बढ़ जाती हैं। यह लालच चीन में बढ़ता चला गया।

सॉन्ग वंश ने बहुत ज्यादा जियाओजी जारी कर दी। इस बीच नकली जियाओजी ने भी समस्याएं खड़ी कर दीं। इस आविष्कार के कुछ दशक बाद, 11वीं सदी के शुरुआत में, जियाओजी का
अवमूल्यन हुआ और यह अपने अंकित मूल्य की सिर्फ 10 फीसदी रह गई।

अन्य देशों के साथ तो कुछ और भी बुरा हुआ

जर्मनी के एक राज्य (वीमार स्टेट-1919-1933 तक अस्तित्व) और जिम्बाब्वे दो चर्चित उदाहरण हैं जहां पर करंसी ज्यादा छापने से कीमतें आसमान छूने लगीं और अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। हंगरी में बहुत ज्यादा महंगाई दर्ज की गई जहां साल 1946 में दाम हर दिन तीन गुने हो जा रहे थे।

अगर उस साल आप बुडापेस्ट में किसी कैफे में जाते तो आपको वहां से निकलते समय तक बिल बढ़ गया होता। इस असाधारण और डरावने अनुभव से कुछ अतिवादी अर्थशास्त्रियों को लगा कि फिएट मनी कभी भी स्थिर नहीं हो सकती। उन्होंने सोने वाले दौर में लौटने की हिमायत की जिसमें पेपर की मुद्रा का मूल्य कीमती धातु के मूल्य के बराबर हो। मगर परंपरावादी अर्थशास्त्रियों का मानना था कि मुद्रा को गोल्ड रिजर्व के बराबर रखना बहुत खराब विचार है।
 
ज्यादातर का मानना था कि कम और अनुमानित महंगाई समस्या नहीं है, बल्कि यह आर्थिक गतिविधियों के लिए अच्छी है। ज्यादा मुद्रा छापना फायदेमंद साबित हो सकता है, खासकर संकटकाल में।
2007 की आर्थिक मंदी के बाद अमेरिका के केंद्रीय रिजर्व ने महंगाई बढ़ाए बिना खरबों डॉलर्स बढ़ाए थे। उसे यह सब करने के लिए कुछ भी प्रिंट नहीं करना पड़ा। वे खरबों डॉलर दरअसल ग्लोबल बैंकिंग सिस्टम में कंप्यूटर के जरिए डाले गए अंक भर थे।

मार्को पोलो होते तो इस घटना को शायद ऐसे दर्ज करते- 'कैसे महान सेंट्रल बैंक ने कंप्यूटर के जरिए अंक जोड़े और उन्हें मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल किया गया।' तकनीक बदल गई है, मगर जिसे हम मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, उसने चकित करना जारी रखा है।

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