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'माओ भारत को सबक सिखाना चाहते थे'

Sat, 10 Sep 2016 01:18 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी
रेहान फजल/बीबीसी Updated Sat, 10 Sep 2016 01:18 PM IST
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mao china vivechna
- फोटो : BBC

माओ के बारे में मशहूर था कि उनका दिन रात में शुरू होता था। वह लगभग पूरी रात काम किया करते थे और सुबह तड़के सोने के लिए जाते थे। उनका अधिकतर समय उनके बिस्तर पर व्यतीत होता था। यहाँ तक कि खाना भी वो बिस्तर पर ही खाते थे। उनकी ये पलंग हमेशा उनके साथ जाती थी। ट्रेन में भी उनके लिए खास तौर से वो पलंग लगाई जाती थी।

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यहाँ तक कि जब वो 1957 में मास्को गए तो उस पलंग को जहाज से मास्को पहुंचाया गया क्योंकि माओ किसी और पलंग पर सो ही नहीं सकते थे। घर पर वो सिर्फ एक नहाने वाला गाउन पहनते थे और नंगे पैर रहते थे। चीन स्थित भारतीय दूतावास में उस वक्त जूनियर अफसर रहे नटवर सिंह बताते हैं कि 1956 में जब लोकसभा अध्यक्ष आयंगर के नेतृत्व में भारत का संसदीय प्रतिनिधिमंडल चीन पहुँचा तो उसे एक रात साढ़े दस बजे बताया गया कि चेयरमेन माओ उनसे रात 12 बजे मुलाकात करेंगे।
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माओ ने एक एक करके सभी सांसदों से हाथ मिलाया। शुरू में माओ मूड में नहीं थे और एक दो लफ्जों में आयंगर के सवालों के जवाब दे रहे थे लेकिन थोड़ी देर बाद वह खुल गए। आयंगर ने जब कहा कि आज़ादी के बाद का भारत एक ढोल की तरह था जिसे रूस और अमरीका दोनों तरफ से बजाते रहते थे, तो माओ ने जोर का ठहाका लगाया।
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पूरी बैठक के दौरान माओ एक के बाद एक सिगरेट जलाते रहे। जब वहाँ मौजूद भारतीय राजदूत आर के नेहरू ने भी अपने मुँह में सिगरेट लगाई तो माओ ने खड़े होकर खुद दियासलाई से उनकी सिगरेट जलाई। माओ के इस जेस्चर पर वहाँ मौजूद भारतीय सांसद और राजनयिक दंग रह गए।

अगले साल जब भारत के उप राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन आए तो माओ ने अपने निवास चुंग नान हाई के आंगन के बीचोंबीच आकर उनकी अगवानी की। जैसे ही दोनों ने हाथ मिलाया राधाकृष्णन ने माओ के गाल को थपथपा दिया।

भारत के उप राष्ट्रपति ने जबरदस्त पंच लाइन कही

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उप राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन

इससे पहले कि वह इस बेतक्कलुफी पर अपने गुस्से या आश्चर्य का इजहार कर पाते भारत के उप राष्ट्रपति ने जबरदस्त पंच लाइन कही, ‘अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए। मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है।’ भोज के दौरान माओ ने खाते खाते बहुत मासूमियत से अपनी चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कौर उठा कर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया।

माओ को इसका अंदाजा ही नहीं था कि राधाकृष्णन पक्के शाकाहारी हैं। राधाकृष्णन ने भी माओ को यह आभास नहीं होने दिया कि उन्होंने कोई नागवार चीज की है। उस समय राधाकृष्णन की उंगली में चोट लगी हुई थी। चीन की यात्रा से पहले कंबोडिया के दौरे के दौरान उनके एडीसी की गलती की वजह से उनका हाथ कार के दरवाजे के बीच आ गया था और उनकी उंगली की हड्डी टूट गई थी। माओ ने इसे देखते ही तुरंत अपना डॉक्टर बुलवाया और उसने नए सिरे से उनकी मरहम पट्टी की।

जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष चीन आता था, उससे माओ की मुलाकात पहले से तय नहीं की जाती थी। माओ का जब मन होता था, उन्हें बुला भेजते थे, जैसे वो उन पर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों। पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर अपनी आत्मकथा ईयर्स ऑफ रिनिउअल में लिखते हैं, "मैं चीनी प्रधानमंत्री चू एन लाई से बात कर रहा था कि अचानक वो कहते थे कि चेअरमैन माओ आपका इंतजार कर रहे हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं थीं कि हम उनसे मिलने के लिए तैयार हैं या नहीं। हमारे साथ किसी अमरीकी सुरक्षाकर्मी को जाने की इजाजत नहीं होती थी। जब हमारी माओ से मुलाकात हो जाती थी तब प्रेस को बताया जाता था कि ऐसा हो गया है।"

किसिंजर आगे लिखते हैं, "हमें सीधे माओ की स्टडी में ले जाया जाता था। उसकी तीन दीवारें किताबों से अटी पड़ी होती थीं। कुछ किताबें मेज पर और कुछ तो जमीन पर भी रखी होती थीं। सामने एक वी शेप की मेज होती थी जिस पर उनका जैसमीन टी का प्याला रखा होता था। उसके बगल में ही माओ का उगालदान होता था। 

माओ उठ कर मेरा स्वागत करते थे

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माओत्से तुंग और तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर - फोटो : BBC

मेरी पहली दो मुलाकातों में तो वहाँ एक लकड़ी का पलंग भी पड़ा रहता था। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश के सबसे ताकतवर शासक की स्टडी में कम से कम मुझे तो विलासिता और बादशाहत के प्रतीकों की एक भी झलक नहीं दिखाई दी। कमरे के बीचोंबीच एक कुर्सी पर बैठे हुए माओ उठ कर मेरा स्वागत करते थे। उनकी मदद करने के लिए उनकी बगल में दो महिला अटेंडेंट खड़ी रहती थी। वो मेरी तरफ मुस्करा कर इस गहरी निगाह से देखते थे मानो खबरदार कर रहे हों कि इस छलकपट के चैंपियन को मूर्ख बनाने की कोशिश करना फिजूल होगा। 

1971 में जब राष्ट्रपति निक्सन ने माओ से दुनिया की कुछ घटनाओं पर बातचीत करनी चाही तो माओ बोले ‘ बातचीत? इसके लिए तो आपको हमारे प्रधानमंत्री के पास जाना पड़ेगा। मुझसे तो आप सिर्फ दार्शनिक मुद्दों पर बात कर सकते हैं।" माओ के डाक्टर रह चुके जी शी ली ने माओ के निजी जीवन के बारे में बहुचर्चित उसमें वो लिखते हैं, "माओ ने अपने जीवन में अपने दाँतों पर कभी ब्रश नहीं किया। जब वो रोज उठते थे तो दातों को साफ करने के लिए वो रोज चाय का कुल्ला किया करते थे। एक समय ऐसा आ गया था कि उनके दाँत इस तरह दिखाई देते थे जैसे उनपर हरा पेंट कर दिया गया हो।"

माओ को नहाने से भी बहुत नफरत थी। हाँ तैरने के वो बहुत शौकीन थे और अपने आप को तरोताजा रखने के लिए गर्म तौलिए से स्पंज बाथ लिया करते थे। ली लिखते हैं कि निक्सन से मुलाकात के समय माओ इतने मोटे हो गए थे कि उनके लिए एक नया सूट सिलवाया गया क्योंकि उनके पुराने सूट उन्हें फिट ही नहीं आ रहे थे। 

उनकी नर्स जाऊ फ्यू मिंग ने उनकी दाढ़ी बनाई और उनके बाल काटे। निक्सन के साथ उनकी मुलाकात के लिए सिर्फ 15 मिनट निर्धारित थे लेकिन ये बातचीत 65 मिनट तक चली। जैसे ही निक्सन कमरे से बाहर गए माओ ने अपना सूट उतार कर अपना पुराना बाथ रोब पहन लिया। माओ वैसे तो जूते पहनते नहीं थे। अगर पहनते भी थे तो कपड़े के जूते। औपचारिक मौको पर जब उन्हें चमड़े के जूते पहनने होते थे तो वो पहले उसे अपने सुरक्षा गार्ड को उसे पहनने के लिए देते थे ताकि वो ढीले हो जाएं।

माओ की गजब की याददाश्त थी

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माओ की एक और जीवनीकार जंग चैंग लिखती हैं कि माओ की गजब की याददाश्त थी। पढ़ने लिखने के वो बहुत शौकीन थे। उनके शयनकक्ष में उनकी पलंग के आधे हिस्से पर एक फुट की ऊँचाई तक चीनी साहित्यिक किताबें पड़ी रहती थीं। उनके भाषणों और लेखन में अक्सर उन किताबों से लिए गए उद्धरणों का इस्तेमाल होता था। वो अक्सर मुड़े तुड़े कपड़े पहनते थे और उनके मोजों में छेद हुआ करते थे। 1962 के भारत चीन युद्ध में माओ की बहुत बड़ी भूमिका थी। वो भारत को सबक सिखाना चाहते थे।

चीन में भारत के ऑशार डी फेयर्स रहे लखन मेहरोत्रा बताते हैं, "कहने को तो चीन ने ये कहा कि भारत के साथ लड़ाई के लिए उसकी फारवर्ड नीति जिम्मेदार थी, लेकिन माओ ने दो साल पहले 1960 में ही भारत के खिलाफ रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। यहां तक कि उन्होंने अमरीका तक से पूछ लिया कि अगर हमें किसी देश के खिलाफ युद्ध में जाना पड़े तो क्या अमरीका ताइवान में उसका हिसाब चुकता करेगा? अमरीका का जवाब था कि आप चीन या उससे बाहर कुछ भी करते हैं, उससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हम बस ताइवान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।"

लखन मेहरोत्रा आगे बताते हैं, "अगले साल उन्होंने यही बात ख़्रुश्चेव से पूछी। उस जमाने में तिब्बत की सारी तेल सप्लाई रूस से आती थी। उन्हें डर था कि अगर उनकी भारत से लड़ाई हुई तो सोवियत संघ कहीं पेट्रोल की सप्लाई बंद न कर दे। उन्होंने ख़्रुश्चेव से ये वादा ले लिया कि वो ऐसा नहीं करेंगे और उन्हें बता दिया कि भारत से उनके गहरे मतभेद हैं। ख़्रुश्चेव ने उनसे सौदा किया कि आप दुनिया में तो हमारा विरोध कर रहे हैं, लेकिन जब हम क्यूबा में मिसाइल भेजेंगे तो आप उसका विरोध नहीं करेंगे। 

ख़्रुश्चेव को ये पूरा अंदाजा था कि चीन भारत पर हमला कर सकता है। यहाँ तक कि मिग युद्धक विमानों की सप्लाई के लिए हमारा उनसे समझौता हो गया था। लेकिन जब लड़ाई शुरू हुई रूस ने वो विमान भेजने में देरी की लेकिन चीन को पेट्रोल की सप्लाई नहीं रोकी गई। बाद में जब ख़ुश्चेव से जब ये पूछा गया कि आप ऐसा कैसे कर सकते थे तो उनका जवाब था भारत हमारा दोस्त है लेकिन चीन हमारा भाई है।"

1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर वहाँ के विदेश मंत्रालय ने एक राजकीय भोज का आयोजन किया जिसमें माओ भी मौजूद थे। इस मौके पर दिए गए भाषण में पाकिस्तान पर भारत को आक्रामक बताया गया। भोज में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे जगत मेहता की मेज के सामने जानबूझ कर इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद नहीं रखा गया ताकि वह इस भाषण को समझ न सकें। 

सर्वोच्च नेता का सबसे बड़ा अपमान

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उन्होंने अपने बगल में बैठे स्विस राजदूत के सामने फ्रेंच भाषा में रखा भाषण पढ़ा और भोज से तुरंत वॉक आउट करने का फैसला किया। चीनियों ने इसे अपने सर्वोच्च नेता का सबसे बड़ा अपमान माना। बाहर निकलने पर जगत मेहता की कार को वहाँ नहीं पहुँचने दिया गया और वह और उनकी पत्नी रमा आधे घंटे तक नेशनल पीपुल्स हॉल की सीढ़ियों पर कड़ी सर्दी में ठिठुरते रहे।

1970 में मई दिवस के मौके पर बीजिंग स्थित सभी दूतावासों के प्रमुखों को तियानानमेन स्कवायर की प्राचीर पर बुलाया गया। चेयरमैन माओ भी वहाँ मौजूद थे। राजदूतों की कतार में सबसे आखिर में खड़े ब्रजेश मिश्र के पास पहुँच कर उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति गिरि और प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को मेरा अभिवादन पहुँचा दीजिए।"

वो थोड़ा रुके और फिर बोले, "हम आखिर कब तक इस तरह लड़ते रहेंगे ?" इसके बाद माओ ने अपनी प्रसिद्ध मुस्कान बिखेरी और ब्रजेश मिश्र से पूरे एक मिनट तक हाथ मिलाते रहे। यह चीन की तरफ से पहला संकेत था कि वह पुरानी बातें भूलने के लिए तैयार है। अपनी मौत से तीन महीने पहले तक वो विदेशी नेताओं से मिलते रहे लेकिन वो तब तक बहुत खराब हालत में पहुंच चुके थे। जब थाईलैंड के प्रधानमंत्री उनके कमरे में घुसे तो उन्होंने उन्हें खर्राटे लेते हुए सुना।

सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली क्वान यू जब उनसे मिलने गए तो उन्होंने देखा कि उनका सिर कुर्सी पर एक तरफ लुढ़का हुआ था और उनके मुंह से थूक बह रहा था। जब उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से अपनी मुलाकात की तस्वीरें देखी तो उन्होंने तय किया कि अब वो किसी विदेशी मेहमान से नहीं मिलेंगे। उसके तीन महीने बाद माओ का निधन हो गया।
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