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अब टीवी पर समाचार पढ़ेंगे आर्टिफिशयल न्यूज एंकर
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 09 Nov 2018 04:41 PM IST
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न्यूज एंकर
- फोटो : BBC
चीन के सरकारी न्यूज चैनल पर आपको कुछ ऐसा देखने को मिल सकता है, जिस पर शायद आप यकीन न कर पाएं। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी ने अपने स्टूडियो में एक ऐसा वर्चुअल न्यूज एंकर उतार दिया है, जो सूट-टाई पहने हुए होगा और जिसकी आवाज आपको किसी रोबोट जैसी लगेगी।
शिंहुआ न्यूज एजेंसी का यह दावा है कि ये न्यूज प्रेजेंटर ठीक उसी तरह खबरें पढ़ सकते हैं जिस तरह से प्रोफेशनल न्यूज रीडर खबरें पढ़ते हैं। हालांकि न्यूज एजेंसी की इस बात से हर कोई सहमत तो नहीं है।
"हैलो, आप देख रहे हैं इंग्लिश न्यूज प्रोग्राम,"अंग्रेजी बोलने वाला ये एंकर अपनी पहली रिपोर्ट कुछ इस अंदाज में पेश करता है। सोगो, एक चीनी सर्च इंजन है। इस सिस्टम को विकसित करने में सोगो का भी अहम योगदान है।
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अपने पहले वीडियो में प्रेजेंटर कहता है "मैं आपकी जानकारी बनाए रखने के लिए लगातार काम करूंगा क्योंकि मेरे सामने लगातार टेक्स्ट टाइप होते रहेंगे।" "मैं आप तक सूचनाओं को एक बिल्कुल नए तरीक़े से पेश करने वाला अनुभव लेकर आऊंगा।"
इसी का एक दूसरा वर्जन भी है जो चीनी भाषा में है लेकिन उसे एक दूसरा शख्स पेश करता है।
शिंहुआ न्यूज एजेंसी का कहना है कि इससे प्रोडक्शन की लागत में बचत की जा सकेगी। एजेंसी का कहना है कि समय-समय पर ब्रेकिंग न्यूज रिपोर्ट प्रसारित करने के लिए ये तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित होगी।
दरअसल, इस तकनीक को विकसित करने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसमें मौलिक प्रेजेंटर की आवाज, लिप मूवमेंट्स और भाव-भंगिमाओं को कॉपी किया गया है।
लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि यह किसी इंसान का 3डी डिजिटल मॉडल है तो ऐसा नहीं है, ये उससे बिल्कुल अलग तकनीक है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मिशेल वूलड्रिज का कहना है कि इन प्रेजेंटर्स के लिए ये काफी मुश्किल है कि वो बिल्कुल नेचुरल नजर आएं।
"इन्हें कुछ मिनट से ज्यादा देर तक देख पाना संभव नहीं है। उनके चेहरे पर कोई भाव-भंगिमाएं नहीं नजर आती हैं, न कोई लय।।सबकुछ बेहद सपाट।"
इसके साथ ही वो इस बात पर भी जोर देते हैं कि टीवी पर जो न्यूज एंकर आते हैं लोग उन्हें उनके चेहरे से पहचानते हैं। उनकी पहचान विश्वसनीयता से जुड़ी हुई होती है, ऐसे में ये परंपरागत तरीक़े से बिल्कुल अलग है।
"आप किसी व्यक्ति से तो कनेक्शन बना सकते हैं लेकिन किसी एनिमेशन के साथ वो जुड़ाव बना पाना संभव नहीं है।" वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स के प्रोफेसर नोएल शिर्के का मानना है कि इस पहले प्रयास की सराहना की जानी चाहिए।
उन्होंने बीबीसी से कहा "हम इसमें समय के साथ और सुधार करते रहेंगे।"
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शिंहुआ न्यूज एजेंसी का यह दावा है कि ये न्यूज प्रेजेंटर ठीक उसी तरह खबरें पढ़ सकते हैं जिस तरह से प्रोफेशनल न्यूज रीडर खबरें पढ़ते हैं। हालांकि न्यूज एजेंसी की इस बात से हर कोई सहमत तो नहीं है।
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"हैलो, आप देख रहे हैं इंग्लिश न्यूज प्रोग्राम,"अंग्रेजी बोलने वाला ये एंकर अपनी पहली रिपोर्ट कुछ इस अंदाज में पेश करता है। सोगो, एक चीनी सर्च इंजन है। इस सिस्टम को विकसित करने में सोगो का भी अहम योगदान है।
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अपने पहले वीडियो में प्रेजेंटर कहता है "मैं आपकी जानकारी बनाए रखने के लिए लगातार काम करूंगा क्योंकि मेरे सामने लगातार टेक्स्ट टाइप होते रहेंगे।" "मैं आप तक सूचनाओं को एक बिल्कुल नए तरीक़े से पेश करने वाला अनुभव लेकर आऊंगा।"
इसी का एक दूसरा वर्जन भी है जो चीनी भाषा में है लेकिन उसे एक दूसरा शख्स पेश करता है।
शिंहुआ न्यूज एजेंसी का कहना है कि इससे प्रोडक्शन की लागत में बचत की जा सकेगी। एजेंसी का कहना है कि समय-समय पर ब्रेकिंग न्यूज रिपोर्ट प्रसारित करने के लिए ये तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित होगी।
दरअसल, इस तकनीक को विकसित करने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसमें मौलिक प्रेजेंटर की आवाज, लिप मूवमेंट्स और भाव-भंगिमाओं को कॉपी किया गया है।
लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि यह किसी इंसान का 3डी डिजिटल मॉडल है तो ऐसा नहीं है, ये उससे बिल्कुल अलग तकनीक है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मिशेल वूलड्रिज का कहना है कि इन प्रेजेंटर्स के लिए ये काफी मुश्किल है कि वो बिल्कुल नेचुरल नजर आएं।
"इन्हें कुछ मिनट से ज्यादा देर तक देख पाना संभव नहीं है। उनके चेहरे पर कोई भाव-भंगिमाएं नहीं नजर आती हैं, न कोई लय।।सबकुछ बेहद सपाट।"
इसके साथ ही वो इस बात पर भी जोर देते हैं कि टीवी पर जो न्यूज एंकर आते हैं लोग उन्हें उनके चेहरे से पहचानते हैं। उनकी पहचान विश्वसनीयता से जुड़ी हुई होती है, ऐसे में ये परंपरागत तरीक़े से बिल्कुल अलग है।
"आप किसी व्यक्ति से तो कनेक्शन बना सकते हैं लेकिन किसी एनिमेशन के साथ वो जुड़ाव बना पाना संभव नहीं है।" वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स के प्रोफेसर नोएल शिर्के का मानना है कि इस पहले प्रयास की सराहना की जानी चाहिए।
उन्होंने बीबीसी से कहा "हम इसमें समय के साथ और सुधार करते रहेंगे।"