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कनाडा चुनाव: पीएम जस्टिन ट्रूडो ने किया जीत का एलान, जानें कितने भारतवंशियों ने लड़ा था चुनाव, क्या थे भारत से जुड़े मुद्दे?
Mon, 20 Sep 2021 07:59 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ओटावा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ओटावा
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 20 Sep 2021 07:59 PM IST
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कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, एनडीपी (लेफ्ट) के नेता जगमीत सिंह और कंजर्वेटिव पार्टी के नेता एरिन ओ टूल। (बाएं से दाएं)
- फोटो :
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विस्तार
कनाडा में आम चुनाव के नतीजे आ गए हैं। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के की लिबरल पार्टी ने छोटे अंतर से जीत हासिल की है। इसी के साथ ट्रूडो ने चुनाव जिताने के लिए देशवासियों का धन्यवाद भी किया। उधर कंजर्वेटिव पार्टी के एरिन ओ टूल ने हार स्वीकारते हुए अहम मुद्दों को न उठा पाने की बात स्वीकार की। इस चुनाव में कोरोना महामारी के साथ नौकरियों का मुद्दा भी बड़ा था। इसके अलावा भारत से जुड़े दो अहम मुद्दे भी चुनाव में शामिल रहे।कनाडा चुनाव में कौन-कौन से नेता थे आमने-सामने?
2015 से ही चुनाव जीतने के बाद जस्टिन ट्रूडो मजबूत नेता के तौर पर उभरे। 2019 में भी उन्हें जीत मिली। उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही। लेकिन 2020 में शुरू हुई कोरोना महामारी के बाद ट्रूडो की मुश्किलें बढ़ीं और उन्हें चुनौती देने वाले कई चेहरे सामने आए।
ट्रूडो के सामने जो सबसे बड़ा चेहरा चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी के नेता एरिन ओ टूल का रहा। एरिन ओ टूल कनाडा में दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता माने जाते हैं और कोरोना महामारी, कनाडा की खुली सीमाओं और विदेश नीति को लेकर ट्रूडो को घेरते रहे हैं।
कनाडा में क्या हैं इस बार के बड़े चुनावी मुद्दे?
कनाडा में इस बार सत्तासीन लिबरल पार्टी और विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी के सामने कोरोनावायरस पहला सबसे बड़ा मुद्दा रहा। देश में कोरोना केस के बढ़ने के दौरान ट्रूडो सरकार की जबरदस्त आलोचना हुई। उन पर वैक्सीन का सौदा देरी से करने और इन्हें लोगों तक न पहुंचा पाने के गंभीर आरोप भी लगे। इसके अलावा महामारी के बीच सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव कराने के लिए भी कनाडा की जनता ट्रूडो से नाराज बताई गई थी।
कनाडा के चुनाव में जो अन्य बड़े मुद्दे असर डाल सकते हैं, उनमें नौकरियों की कमी, अफगानिस्तान से आ रहे लोग और जलवायु परिवर्तन भी शामिल हैं। लेकिन कनाडा के ताकतवर भारतवंशी समुदाय से जुड़े दो मुद्दे भी इस आम चुनाव में चर्चा का विषय रहे इनमें एक मुद्दा है- कृषि कानून का, जबकि दूसरा मुद्दा था फ्लाइट बैन का।
कनाडा के चुनाव में जो अन्य बड़े मुद्दे असर डाल सकते हैं, उनमें नौकरियों की कमी, अफगानिस्तान से आ रहे लोग और जलवायु परिवर्तन भी शामिल हैं। लेकिन कनाडा के ताकतवर भारतवंशी समुदाय से जुड़े दो मुद्दे भी इस आम चुनाव में चर्चा का विषय रहे इनमें एक मुद्दा है- कृषि कानून का, जबकि दूसरा मुद्दा था फ्लाइट बैन का।
कनाडा के चुनाव में क्यों असर डाल सकते हैं भारत से जुड़े मुद्दे?
कनाडा में इस बार भारतीय मूल के 49 उम्मीदवार चुनावी दौड़ में शामिल रहे। 2019 में हुए पिछले चुनाव में यह संख्या करीब 50 थी। तब 20 भारतवंशी संसद पहुंचे थे। इनमें 18 सिख नेता शामिल थे। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अपनी 36 सदस्यीय कैबिनेट में चार भारतवंशी सांसदों को मंत्री के तौर पर जगह दी थी। इनमें तीन सिख और एक हिंदू नेता भी शामिल थीं।
आंकड़ों से समझिए भारतवंशी और सिख समुदाय की ताकत
- कनाडा की आबादी करीब 3.76 करोड़ है। इनमें 10 लाख से कुछ ज्यादा भारतीय कनाडा में रजिस्टर्ड हैं। यानी कुल आबादी में तकरीबन 2.7 फीसदी भारत से सीधे तौर पर रिश्ता रखते हैं।
- इन भारतवंशियों में 5 लाख से ज्यादा के सिख होने का अनुमान है। 2011 में कनाडा में सिखों की संख्या 4.68 लाख थी। इस लिहाज से कनाडा की कुल आबादी में 1.4 फीसदी लोग सिख समुदाय से हैं।
- इसके बावजूद ट्रूडो ने अपनी 36 सदस्यीय कैबिनेट में चार भारतवंशियों को जगह दी। कैबिनेट में यह प्रतिनिधित्व 11 फीसदी था जो कि आबादी के मुकाबले करीब चार गुना था। कैबिनेट में अकेले सिख मंत्रियों का प्रतिनिधित्व ही 8.33 फीसदी था। यह कनाडा में सिखों की आबादी के मुकाबले छह गुना था।
कनाडा में कैसे इतना ताकतवर बना भारतीय समुदाय?
- कनाडा के सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक, 2006 से 2016 के बीच कनाडा में पंजाबी बोलने वाले लोगों की संख्या 3.68 लाख से 5.02 लाख पर पहुंच गई। यानी 10 साल में ही 36.5 फीसदी की बढ़ोतरी। यह कनाडा में फिलीपींस और अरब समुदाय के बाद किसी समुदाय के बढ़ने की तीसरी सबसे तेज रफ्तार रही।
- 2018 में सामने आया था कि कनाडा में 92,231 लोगों को स्थायी नागरिकता मिली। उनमें 39,600 यानी 43 फीसदी भारतीय नागरिक थे, खासकर पंजाब से आने वाले सिख नागरिकता पाने में सबसे आगे थे।
- कनाडा में भारतवंशियों और मुख्य तौर पर सिख समुदाय की ताकत किस हद तक बढ़ी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2018 में जब कनाडाई खुफिया रिपोर्ट में खालिस्तानियों को पांच सबसे बड़े आतंकी खतरों में शामिल किया गया था, तब सिख समुदाय की नाराजगी के चलते ट्रूडो को खुद आगे आकर इस मुद्दे को नकारना पड़ा था।
- सिख समुदाय की बढ़ती आबादी का असर कनाडा के चुनाव नतीजों में भी झलकने लगा है। कुल आठ संघीय सीटों पर सिख मजबूत हैं। इसके अलावा 15 सीटों पर वे किसी भी पार्टी के पक्ष में नतीजे बदल सकते हैं। टोरंटो और वैंकूवर में तो सिख समुदाय इतना ताकतवर है कि कई सीटों पर उसके नेता चुनाव में आमने-सामने खड़े होते हैं। इसके अलावा सिख समुदाय के कुछ नेता अपने सामाजिक कार्यों के लिए लोकप्रिय हैं और वे उन जगहों पर भी चुनाव जीत लेते हैं, जहां सिख अल्पसंख्यक हैं।
इस बार किस पार्टी से कितने भारतवंशियों को मौका?
कनाडा के आम चुनाव में इस बार 49 भारतवंशियों को मौका मिल रहा है। इनमें सबसे ज्यादा 16 उम्मीदवार विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी की तरफ से हैं, जबकि 15 को ट्रूडो की लिबरल पार्टी ने मौका दिया है। इसके अलावा जगमीत सिंह की नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ने 12 और पीपुल्स पार्टी ऑफ कनाडा ने छह भारतवंशियों को मौका दिया है। अपनी-अपनी सीटों को बचाने के लिए रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन, विविधता और युवा मामलों के मंत्री बरदीश चग्गड़, सार्वजनिक सेवा मामलों की मंत्री अनीता आनंद और पूर्व विज्ञान-उद्योग मंत्री नवदीप बैंस भी चुनाव लड़ने उतरेंगे।
कई सीटों पर आमने-सामने खड़े हैं भारतवंशी
इन कैबिनेट मंत्रियों के अलावा जिन भारतीय नेताओं को चुनाव लड़ने का मौका मिला है, उनमें टोरंटो की पंजाबी बहुल ब्रैंप्टन सिटी की पांच सीटों में से चार में भारतवंशी ही आपस में लड़ रहे हैं। इन सीटों पर सांसद मनिंदर सिद्धू, रूबी सहोटा, सोनिया सिद्धू और कमल खेड़ा का मुकाबला क्रमशः नवल बजाज, मेधा जोशी, रमणदीप ब्रार और गुरप्रीत गिल से है। इसी तरह एल्बर्टा की सीट पर कंजर्वेटिव पार्टी के जग सहोटा, लिबरल पार्टी के जॉर्ज चहल और एनडीपी के गुरिंदर गिल के बीच मुकाबला है। वैंकूवर दक्षिण की सीट पर रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन को पंजाबी मूल के नेता सुखबीर गिल (कंजर्वेटिव पार्टी) से चुनौती मिल रही है।