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ऑस्ट्रेलिया: शोधकर्ताओं ने पार्किंसंस से निपटने के लिए बनाया हाइड्रोजेल
Sat, 14 Aug 2021 06:41 AM IST
Kuldeep Singh
एजेंसी, केनबरा
एजेंसी, केनबरा
Published by: Kuldeep Singh
Updated Sat, 14 Aug 2021 06:41 AM IST
सार
- शोधकर्ताओं ने फ्लोरी इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस एंड मेंटल हेल्थ के सहयोग से अमीनो एसिड से बना एक जेल किया विकसित
- मस्तिष्क में इंजेक्ट करने के बाद यह दिमागी क्षति की मरम्मत में काफी मदद कर सकता है
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brain disease
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने एक ऐसा हाइड्रोजेल बनाया है, जिसे एक बार इस्तेमाल के बाद पार्किंसंस और मस्तिष्क संबंधी अन्य रोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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अमीनो एसिड से बना जेल मस्तिष्क में किया जाएगा इंजेक्ट
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने फ्लोरी इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस एंड मेंटल हेल्थ के सहयोग से अमीनो एसिड से बना एक जेल विकसित किया है। इसे मस्तिष्क में इंजेक्ट किया जा सकता है।
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बताया गया कि मस्तिष्क में इंजेक्ट करने के बाद यह दिमागी क्षति की मरम्मत में काफी मदद कर सकता है। हाइड्रोजेल मस्तिष्क के उन हिस्सों का इलाज कर सकता है जिनमें सक्रिय तत्व नहीं होते हैं। शोधकर्ताओं ने इसकी खूबियों के बारे में बताया कि इसे हिलाकर तरल में बदल दिया जाता है जिससे मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं में प्रवेश करना आसान हो जाता है। नसों में प्रवेश करने के बाद यह अपने मूल रूप में थक्का बनना शुरू कर देता है।
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इस तरह से यह मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्सों तक पहुंचने वाली स्टेम कोशिकाओं को आसानी से बदल देता है। ऑस्ट्रेलिया के नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड निस्बेट कहते हैं, इस इलाज को गेम चेंजर कहा जा रहा है क्योंकि यह एक बार में इस्तेमाल किया जा सकता है।
जल्द शुरू होगा क्लीनिकल ट्रायल
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं द्वारा आविष्कार किया गया हाइड्रोजेल का अभी तक केवल जानवरों पर परीक्षण किया गया है। चूहों पर इन प्रयोगों के नतीजों से पता चला कि इन चूहों में पार्किंसंस रोग पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ा। प्रोफेसर डेविड को उम्मीद है कि एक बार जब यह निश्चित हो जाएगा कि इनसानों के लिए इसका इस्तेमाल सभी प्रकार के खतरों और जटिलताओं से सुरक्षित है, तो अगले 5 सालों में इसका क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया जाएगा।
सस्ता होगा इसका उत्पादन
प्रोफेसर डेविड ने कहा कि इस नए हाइड्रोजेल का उत्पादन अपेक्षाकृत सस्ता है और इसे आसानी से बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जा सकता है। उनके मुताबिक यह उत्पादन और भी आसान हो जाएगा जब इसे नियामकों द्वारा मंजूरी मिल जाएगी।