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तालिबान: चीन और पाकिस्तान का प्रेम बन सकता है बड़े नुकसान का कारण, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

Sun, 22 Aug 2021 08:33 PM IST
गौरव पाण्डेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 22 Aug 2021 08:33 PM IST
सार

अफगानिस्तान में सत्ता का नियंत्रण एक बार फिर तालिबान के हाथ में आ चुका है। अपने कट्टरपंथी इस्लामी विचारों के लिए कुख्यात तालिबान शासन को चीन और पाकिस्तान वैश्विक मान्यता दिलाने के लिए संयुक्त रणनीति बना रहे हैं और अपने हित साधना चाहते हैं। लेकिन, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि चीन और पाकिस्तान को इसका दीर्घकालिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। खास तौर पर अमेरिका इन्हें झटका दे सकता है। चीन और पाकिस्तान, अफगानिस्तान विवाद का बदला लेने के लिए अमेरिका के गुस्से का शिकार बन सकते हैं। 

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As China and Pakistan weigh recognizing Taliban experts warn long term losses due to US anger
अफगानिस्तान में तालिबानी लड़ाके - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

15 अगस्त को तालिबान के अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा करने के बाद से ही चीन और पाकिस्तान तालिबान के साथ संपर्क बढ़ाने में लगे हुए हैं। दोनों ही अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों की वापसी की आशंकाओं के बावजूद अफगानिस्तान में 20 साल से चल रहे युद्ध के बाद अमेरिका की हार से खुश हैं। पाकिस्तान सरकार हालांकि दावा करती है कि वह अफगानिस्तान में किसी की पक्षधर नहीं है। लेकिन यहां तालिबान की वापसी से पाकिस्तान की सरकार पूरी तरह बेफिक्र नजर आ रही है।

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हांगकांग के साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि अफगानी लोगों ने पश्चिमी गुलामी की जंजीरें तोड़ दी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान के साथ सम्मिलित राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है। इसमें खास तौर पर उसके दो करीबी सहयोगी, चीन और रूस भी शामिल हैं। उसका कहना है कि ऐसा अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए जरूरी है। 
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पूर्व पाकिस्तानी राजदूत मलीहा लोधी कहती हैं कि पाकिस्तान को अपने पड़ोसी देश में शांति से सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है वहीं, वहां संघर्ष व अस्थिरता से खोने के लिए भी उसके पास सबसे अधिक है। लोधी यूनाइटेड किंगडम (यूके), संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के लिए पाकिस्तान की राजदूत रह चुकी हैं। वह कहती हैं, पाकिस्तान को अपनी पश्चिमी सीमा पर स्थिरता के मामले में तभी फायदा मिल सकेगा जब तालिबान प्रभावी ढंग से शासन करने, अन्य जातीय समूहों को समायोजित करने और स्थायी शांति स्थापित करने में सक्षम होगा।
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लोधी कहती हैं कि अगर तालिबान ऐसा नहीं कर पाता है तो अफगानिस्तान एक अनिश्चित और अस्थायी भविष्य का सामना कर सकता है जो पाकिस्तान के हित में नहीं होगा। 

तालिबान के शासन का तरीका तय करेगा भविष्य

सिंगापुर में एस राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज (आरएसआईएस) में एसोसिएट रिसर्च फेलो अब्दुल बासित का कहना है कि पाकिस्तान और तालिबान के संबंध सामरिक भिन्नताओं पर आधारित सुविधाओं का मेल हैं। पाकिस्तान के लिए तालिबान की मदद करके भारत को अफगानिस्तान से बाहर रखना था। तालिबान के लिए, यह अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की उपस्थिति का विरोध करना था और पाकिस्तानी मदद का फायदा लेकर इसे अफगानिस्तान से बाहर करना था। जो कि आखिरकार वह करने में पूरी तरह सफल रहा।

बासित कहते हैं कि सुविधाओं के इस मेल के अलावा पाकिस्तान और तालिबान के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव, असहमतियां और विभिन्नताएं हैं। उन्होंने कहा, 'उदाहरण के लिए, इस्लामाबाद पूर्वी अफगानिस्तान में हजारों पाकिस्तानी तालिबान लड़ाकों के खिलाफ तालिबान की कार्रवाई की कमी से निराश था।' बता दें कि दो जुलाई को पाकिस्तान के राजनेताओं की एक गोपनीय संसदीय ब्रीफिंग में, आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद ने तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया था।

अब्दुल बासित का कहना है कि तालिबान के लिए आवाज उठा रहे चीन और पाकिस्तान, दोनों को अमेरिका की ओर से बड़ा झटका लग सकता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एनालिस्ट अस्फंद्यार मीर कहते हैं कि अमेरिका-पाकिस्तान के संबंध तनावपूर्ण बने रहेंगे। वाशिंगटन ने पाकिस्तान से आतंकवाद विरोधी समर्थन और तालिबान पर दबाव बनाने के लिए कहा है। वहीं, बासित के अनुसार, यदि तालिबान जिम्मेदारी से व्यवहार करे और अपनी सरकार संयमित तरीके से चलाए, तो अमेरिका-पाकिस्तान संबंध बिना किसी सुधार के बने रहेंगे।

चीनी विश्लेषकों ने भी दी कुछ ऐसी ही चेतावनी

उल्लेखनीय है कि चीनी विश्लेषकों ने भी चीन के लिए कुछ ऐसी ही चेतावनी दी है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के पूर्व मुख्य संपादक वांग शियांगवेई के अनुसार अफगानिस्तान में अमेरिका का सबसे बड़ा युद्ध विनाशकारी हार के रूप में समाप्त हुआ है और इससे चीन को बिगड़े द्विपक्षीय संबंधों के समय अमेरिका के खिलाफ प्रचार का एक मौका मिला है। उनका कहना है, 'चीनी आधिकारिक मीडिया और टिप्पणीकार अफगानिस्तान में अमेरिका की हार का मजाक उड़ाते रहे हैं, एक ऐसा देश जिसे 'साम्राज्यों के कब्रिस्तान' के रूप में जाना जाता है।

वांग कहते हैं कि इस बात में कोई संशय नहीं है कि चीनी दृष्टिकोण से, अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के लौटने से चीन को अधिक भू-राजनीतिक लाभ हैं। लेकिन, अमेरिकी वापसी न केवल क्षेत्रीय स्थिरता और शक्ति संतुलन में अनिश्चितता और जोखिम पैदा करेगी बल्कि इससे अमेरिका को चीन का मुकाबला करने के लिए संसाधनों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा। वांग आगे कहते हैं कि जाहिर है कि अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी से चीन के लिए बेहतर अवसर और जोखिम दोनों की स्थितियां उत्पन्न हुई हैं।

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