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क्या दुनिया परमाणु जंग के खतरे की ओर बढ़ रही है?

Wed, 31 Oct 2018 11:37 AM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Wed, 31 Oct 2018 11:37 AM IST
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World in under threat of Nuclear War
World War Nuclear - फोटो : BBC
साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने से ठीक पहले जब अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया तो इस एक घटना ने दुनिया की राजनीति में सब कुछ बदल दिया। ये एक नये युग की शुरुआत थी।
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एक ऐसा युग जब दुनिया ने पारंपरिक युद्ध की जगह एक विध्वंसकारी युद्ध के साये में जीना शुरू कर दिया। अमेरिकी सरकार के इस कदम के बाद रूस ने भी परमाणु हथियारों का विकास करना शुरू कर दिया। इसके बाद कई सालों तक अमेरिका और रूस में परमाणु हथियारों की एक ऐसी होड़ लगी रही जिसमें दोनों देश एक दूसरे को पीछे छोड़ने की कोशिश में लगे हुए थे।
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इसी बीच दुनिया ने क्यूबा मिसाइल संकट भी देखा जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध शुरू होने जैसी स्थिति बन गई थी। इस दौर में हमले की चेतावनी मिलते ही आपको और आपके परिवार को तत्काल किसी जगह छिपना होता था।
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लेकिन आखिरकार सोवियत संघ और अमेरिका इस तरह के संघर्ष से बचने के लिए कुछ नियम और शर्तें मानने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन और सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्वाचोव ने साल 1987 में इंटरमीडिएट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज़ ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए।

ये एक ऐतिहासिक घटना थी क्योंकि एक लंबे अरसे तक अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध चलने के बाद दुनिया के ये दो सबसे शक्तिशाली देश इस मुद्दे पर एक समझौता कर पाए थे। इस संधि ने प्रतिबंधित परमाणु हथियारों और ग़ैर-परमाणु मिसाइलों की लॉन्चिंग को रोकने की दिशा में काम किया।

लेकिन ट्रंप को ये संधि पसंद नहीं

अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल ही में ऐलान किया है कि वह अपने देश को इस संधि से बाहर निकाल रहे हैं। डोनल्ड ट्रंप कहते हैं, "दुर्भाग्य के साथ ये कहना पड़ रहा है कि रूस ने इस संधि का सम्मान नहीं किया है। ऐसे में हम इस संधि को तोड़ने जा रहे हैं। हम इस संधि से बाहर निकल रहे हैं।"

अमेरिकी सरकार के इस कदम के बाद सवाल उठता है कि क्या हमें एक परमाणु युद्ध की आशंका से डरना चाहिए या दुनिया को ऐसी संधियों की ज़रूरत है। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें ये समझना होगा कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच जो संधि हुई थी उसका हमारी दुनिया पर क्या असर पड़ा।

आईएनएफ संधि का प्रभाव?

World in under threat of Nuclear War
रोनाल्ड रीगन के साथ मिखाइल गोर्वाचेव - फोटो : BBC
साल 1987 में अस्तित्व में आने वाली इस संधि की वजह से मिसाइलों की एक बड़ी संख्या को नष्ट कर दिया गया जिन्हें युद्ध की स्थिति में तैनात किया जा सकता था। इसके साथ ही इसने कई तरह के हथियारों पर प्रतिबंध लगा दिए। जमीन से लॉन्च की सकने वाली पांच सौ से पचपन सौ किलोमीटर की रेंज वाली मिसाइलों को बैन कर दिया गया।

लेकिन अमेरिकी सरकार का मानना है कि रूस ने इसकैंडर जैसी एक ऐसी मिसाइल बना ली है जो पांच सौ किलोमीटर से भी ज़्यादा की रेंज में हमला कर सकती है जो कि इस संधि का उल्लंघन है। रूस का कहना है कि उसने संधि की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया है। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी संगठन नेटो के सदस्य देश अपने दावे पर अडिग हैं।

अब आगे क्या होगा?

अगर अमेरिका और रूस के रिश्तों की बात करें तो दोनों के बीच परमाणु संघर्ष का अपना इतिहास रहा है। लेकिन अब सवाल सिर्फ रूस का ही नहीं है। चीन इस संधि का हिस्सा नहीं है और उसने ऐसे कई हथियारों को तैनात कर रखा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश जापान-दक्षिण कोरिया इस वजह से असुरक्षित महसूस करते हैं।

अब अगर अमेरिका इस संधि से बाहर होता है तो वह इंटरमीडिएट रेंज की जमीन से लॉन्च की जा सकने वाली नई मिसाइलें बना सकता है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इससे हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए बनाई गई सभी व्यवस्थाएं चरमरा सकती हैं। लंबी दूरी तक परमाणु हथियारों को ले जाने वाली मिसाइलों पर 'स्टार्ट' संधि के तहत प्रतिबंध लगा हुआ है।

लेकिन ये संधि भी 2021 में खत्म होने जा रही है। रूस और अमेरिका इस संधि को आगे बढ़ाने के लिए आपसी सहमति बना सकते हैं।

लेकिन अगर दोनों देशों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ती गई और ये संधि भी खत्म हो गई तो साल 1972 के बाद पहली बार ऐसा होगा जब अमेरिका और रूस के लंबी दूरी वाले परमाणु हथियारों पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं रहेगा।
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