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शरीर की पोजिशन बदलने पर सवाल हल होने की संभावना 50% बढ़ जाती है : रिसर्च
एजेंसी, न्यूयॉर्क
Updated Sun, 05 Aug 2018 03:18 PM IST
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अगर गणित का कोई मुश्किल सवाल हल नहीं हो रहा हो, तो जरा शरीर की पोजिशन बदलकर देखिए। ऐसा करने से सवाल के हल होने की संभावना 50% तक बढ़ जाएगी। सैन फ्रांसिस्को यूनिवर्सिटी में हाल में हुए एक शोध में यह जानकारी निकलकर सामने आई है। यूनिवर्सिटी ने पढ़ाई और शरीर के पॉश्चर के बीच संबंध का पता लगाने के लिए करीब एक हजार छात्रों पर शोध किया। इन सभी छात्रों को गणित के कुछ सवाल हल करने के लिए दिए गए। देखा गया कि सवाल हल करते-करते कुछ ही देर में छात्रों के शरीर का पॉश्चर बदलने लगता है।
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कुछ अपनी पीठ बिल्कुल सीधी करके बैठने लगे तो कुछ कुर्सी के बिल्कुल आगे खिसककर बैठ गए। कई छात्र तो खड़े ही हो गए। कुछ ऐसे भी थे जो मेज पर झुककर सवाल हल कर रहे थे। टेस्ट खत्म होने के बाद 56% छात्रों ने माना कि खड़े होकर सवाल हल करने में उन्हें आसानी महसूस हुई। इसका कारण है- एक्टिव और पैसिव ब्रेन यानी सक्रिय और कम सक्रिय दिमाग। शरीर के पॉश्चर का दिमाग की रफ्तार पर सीधा असर पड़ता है। लेटकर या आरामतलब होकर पढ़ाई करने से दिमाग की सक्रियता कम होती है। शरीर की मुद्रा सुधारने पर ये सुधरती है। दफ्तरों में भी अगर खड़े होकर काम किया जाए तो नतीजे में 40% तक का सुधार होता है। इसी वजह से यूरोपीय देशों में स्टैंडिंग ऑफिस का कल्चर बढ़ रहा है।
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शोध टीम में शामिल प्रोफेसर एरिक पेपर बताते हैं- "अगर बच्चे लंबी देर तक बैठकर पढ़ रहे हैं, तो उन्हें हर 30 मिनट में कुछ देर के लिए खड़े होकर भी पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से बेहतर नतीजा आने की संभावना तो बढ़ती ही है, साथ ही पढ़ाई में होने वाला तनाव भी कम होता है। ये नतीजा सिर्फ गणित तक नहीं, बल्कि सभी विषयों और हर उस काम के लिए है, जिसमें एकाग्रता की जरूरत होती है। गणित के सवाल तो इसलिए दिए गए क्योंकि इसे सबसे कठिन विषय माना जाता है।'
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"स्टीरियोटाइप थ्रेट' वाले बच्चों के लिए ज्यादा कारगर
किसी विषय के स्टीरियोटाइप थ्रेट से जूझ रहे बच्चों के लिए ये नतीजा खासा कारगर है। स्टीरियोटाइप थ्रेट यानी किसी चीज का दिल में डर या झिझक बैठ जाना। यानी जो छात्र किसी खास विषय का नाम सुनकर ही घबरा जाते हैं, उनको खड़े होकर पढ़ने की कोशिश करें। शोधकर्ताओं ने कहा कि- फोकस और क्रिएटिविटी को बढ़ाने के लिए ही संगीतकार धुन तैयार करने का काम अक्सर खड़े होकर ही करते हैं। भीड़ को संबोधित करते समय खड़े रहने का कॉन्सेप्ट भी यहीं से निकला है, ताकि इंसान बोलते समय घबराए नहीं।