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वजन कम करने के अजीबो-गरीब तरीके

Fri, 04 Jan 2013 12:10 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 04 Jan 2013 12:10 PM IST
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when bugs were eating for reduce weight
नए साल में लोग तरह तरह के संकल्प और इरादे करते हैं। इनमें से एक संकल्प अकसर वजन घटाने का होता है जिसके लिए लोग डाइटिंग करते हैं।
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अगर आप सोच रहे हैं कि डाइटिंग आधुनिक चलन है तो ऐसा नहीं है। ग्रीक और रोमनकाल में भी डाइटिंग का चलन था लेकिन तब ये ज्यादातर फिटनेस और सेहत के नज़रिए से की जाती थी।

लेकिन धीरे-धीरे ये एक फैशन जैसा बन गया और डाइटिंग के अजीबो-गरीब तरीके सामने आने लगे। आइए नजर डालते हैं डाइटिंग के कुछ अजीब और सेहत के लिए नुकसानदेह तरीकों पर नजर।
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चबाओ और फेंको
20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के होरेस फ्लेचर ने कहा कि खाना अच्छे से चबाना और फिर थूक देना वजन घटाने का बेहतरीन तरीका है। यानी खाने को इतना चबाओ कि उसके सारे अच्छे तत्व आपके अंदर चले जाएं और जो बच जाए उसे मुंह से थूक दो। फ्लेचर के मुताबिक करीब 700 बार खाद्य पदार्थ को चबाएं। ये तरीका काफी लोकप्रिय था। फ्रांज काफ्का और हेनरी जेम्स जैसी मशहूर हस्तियां इस तरीके से डाइटिंग करती थीं।
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इतिहासकार लुईस फॉक्सक्रॉफट के मुताबिक बात यहां तक पहुंच गई थी कि पार्टियों में समय का ख्याल जाता था ताकि लोगों को खाना चबाना का समय मिले। साथ ही आप दो हफ्ते में एक ही बार शौच जा सकते थे और मल से कोई बदबू नहीं आती थी। फ्लेचर अपने मल का नमूना साथ लेकर घूमते थे और लोगों को दिखाते थे।

टेपवर्म (फीता कृमि)
डाइटिंग का ये तरीका कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। इतिहासकार लुईस फॉक्सक्रॉफट कहती हैं कि टेपवर्म खाने का चलन 18वीं सदी की शुरुआत में हुआ। इमसें लोग गोली की शक्ल में टेपवर्म खाते थे। मान्यता ये थी कि टेपवर्म आंतों में जाकर बड़े होते हैं और खाने को सोख लेते हैं। इससे वज़न घट सकता था पर साथ में उलटी और दस्त भी हो सकता था।

जब लोगों का वजन कम हो जाता था तो वे एंटी-पैरासिटीक दवाई लेते थे ताकि टेपवर्म यानी कीड़े मर जाएं। डाइटिंग करने वाले को शौच के जरिए कीड़ों को निकालना होता था जिससे पेट संबंधी बीमारियां हो सकती थीं। ये जोखिम भरा तरीका था। टेपवर्म यानी कीड़े नौ मीटर की लंबाई तक बढ़ सकते हैं और सिररदर्द, मिर्गी आदी जैसी बीमारियों की वजह भी बन सकते हैं।

आर्सेनिक
19वीं सदी में डाइटिंग के लिए दवाइयां और पोशन लोकप्रिय हो गए लेकिन उनमें अकसर आर्सेनिक जैसे खतरनाक पदार्थ होते थे। अकसर लोग बताई गई संख्या से ज़्यादा गोलियां ले लेते थे ताकि वो अधिक वजन कम कर सकें। लेकिन इससे आर्सेनिक की अधिकता से जहर फैलने का डर रहता था। आमतौर पर विज्ञापनों में बताया भी नहीं जाता था कि दवा में आर्सेनिक है। बहुत से सड़क छाप डॉक्टर खुद को विशेषज्ञ बताकर ये दवाएं बेचते थे।

विनेगर या सिरका

सेलिब्रिटी डाइट एक फैशन है। 19वीं सदी में भी ये चलन था कि लोग जानी मानी हस्तियों की तरह दिखना चाहते थे। मशहूर ब्रितानी कवि लॉर्ड बायरन ने सिरकायुक्त डाइट प्रचलित की जो बेहद लोकप्रिय हुई। वे रोज़ सिरका पीते थे और सिरका में डूबे आलू खाते थे। उल्टी और हैजा इसके साइडएफेक्ट थे। रोमांटिक मूवमेंट के इस लोकप्रिय कवि जैसी छरहरा काया पाने के लिए युवा केवल सिरके और चावल पर जिंदा रहते थे।

रबड़ के कपड़े
19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के बाद रबड़ का उत्पादन और इस्तेमाल बहुत बढ़ गया। इसमें रबड़ से बने निकर और अंदरूणी कपड़े शामिल हैं। माना जाता था कि रबड़ चर्बी को रोक कर रकती है और इससे पसीना भी आता है। लोगों को उम्मीद थी कि इससे वजन कम होगा।


इतिहासकार फॉक्सक्रॉफ्ट कहती हैं कि महिला और पुरुष दोनों रबड़ के कपड़े पहनते थे हालांकि ये असुविधाजनक था क्योंकि इससे माँस नर्म पड़ जाता था और ज़्यादा नमी के कारण टूट सा जाता था जिससे संक्रमण होने का डर रहता था। प्रथम विश्व युद्ध शुरु होने के बाद ये चलन रुका क्योंकि युद्ध के लिए रबड़ चाहिए थी।
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