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क्या ओबामा हाथ-पर-हाथ धर कर बैठे रहेंगे?
बीबीसी हिंदी/मार्क मैडल
Updated Mon, 17 Dec 2012 12:33 PM IST
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मैं अभी लंदन में हूं और अमेरिका में हुई हत्या की खबर पर नजर बनाए हुए हूं। राष्ट्रपति ने सही कहा- ये दुखद घटना हर माता पिता को छू गई होगी। लेकिन राजनीति ज्यादा दूर नहीं है।
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कुछ घंटों पहले ही मैं अपने ब्रितानी दोस्तों को समझा रहा था कि ब्रिटेन में ज्यादातर लोगों बंदूक की ओर अमेरिकी रुख को समझ नहीं पाते।
कई लोगों को ये व्यवहार पागलपन जैसा लगता है। लेकिन स्थिति थोड़ी अलग है।
अमेरिका में लोगों का मानना है कि बंदूक रखना उनका अधिकार है, ना सिर्फ खेल के लिए बल्कि शिकार और खुद की सुरक्षा के लिए भी। ये अधिकार उन्हें अमेरिका के संविधान के अंतर्गत दिए गए हैं।
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बंदूक अमेरिका के लोगों की रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा है। इसलिए कुछ लोग इस बात पर अड़े रहते हैं कि उन्हें उन बंदूकों को रखने का भी अधिकार मिलना चाहिए जो बहुत सारे लोगों को बहुत कम समय में ही मारने की क्षमता रखते हैं।
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पूर्व में हुई गोलीबारी की घटनाओं के बाद भी सवाल उठे कि क्या इन वारदातों का लोगों की सोच पर असर पड़ेगा, लेकिन जवाब ‘ना’ ही था। लेकिन शायद, इस बार स्थिति अलग हो।
कार्रवाई
राष्ट्रपति ओबामा ने शायद बार-बार अपने आंसुओं को पोछते हुए कहा, “हमने पिछले कुछ सालों में ऐसी दुखद घटनाएं देखीं... एक देश के तौर पर हम ये सब बहुत बार देख चुके हैं।” उन्होंने कहा कि सभी को मिलजुलकर आना होगा और ऐसी घटनाओं से बचने के लिए सार्थक कार्रवाई करनी होगी।
2011 को टस्कन, ऐरीजोना, में हुई गोलीबारी में छह लोग मारे गए थे और 13 घायल हुए थे। इस घटना के बाद भी उन्होंने कुछ ऐसे ही वायदे किए थे।
कुछ नहीं हुआ, और जहां तक मुझे याद है, किसी बदलाव के प्रस्ताव भी सामने नहीं आए थे।
लेकिन उसके बाद एक चुनाव हो चुका है। ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ओबामा उन विषयों को लेकर कार्रवाई करना चाहते हैं जिनमें उन्हें गहरा विश्वास है।
अगर वो बंदूकों के फैलाव को रोकने के लिए कदम उठाते हैं तो ये निडर लेकिन बेहद मुश्किल कदम होगा। हमें देखना होगा कि क्या ओबामा अपने भावुक भाषण से आगे जाकर सचमुच में कोई कार्रवाई कर पाते हैं या नहीं।