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अमेरिका ने स्वीकारा खुफिया क्षेत्र एरिया-51 का अस्तित्व

Sat, 17 Aug 2013 03:38 PM IST
Updated Sat, 17 Aug 2013 03:38 PM IST
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us admitted existence of intelligence sector area 51

अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने एरिया-51 के नाम से विख्यात खुफिया परीक्षण क्षेत्र के अस्तित्व को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया है।

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हाल ही में यू-2 खुफिया विमान कार्यक्रम से संबंधी दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दिया गया है।

सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में इस क्षेत्र के एलियंस और अज्ञात उड़न वस्तुओं (यूएफओ) से संबंधों पर भी रोशनी डाली गई है।

ग्रूम झील के नजदीक स्थित रेगिस्तान को परीक्षणों के लिए इसलिए चुना गया था क्योंकि यह एक परमाणु परीक्षण केंद्र के भी नजदीक था।

ब्रितानी रक्षा पत्रकार और यू-2 कार्यक्रम का इतिहास लिखने वाले क्रिस रोबोक ने बीबीसी को बताया कि यह कार्यक्रम बेहद खुफिया था। अमेरिका को इसके बारे में हर जानकारी को बाकी दुनिया से छुपाना था।
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रूस पर निगरानी
गौरतलब है कि शीत युद्ध के दौरान रूस पर नजर रखने के लिए विकसित किए गए निगरानी विमान यू-2 का अमेरिका अब भी इस्तेमाल करता है।

सीआईए के यू-2 कार्यक्रम के 1992 में लिखे गए आंतरिक दस्तावेजों के अधिकतर हिस्सों को संपादित करने के बाद 1998 में ही सार्वजनिक कर दिया गया था। लेकिन महत्वपूर्ण जानकारियां रोक ली गईं थी।
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जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव द्वारा जानकारी मांगने के बाद अब रोकी गई महत्वपूर्ण जानकारियों को भी सार्वजनिक कर दिया गया है।

साल 1955 में सीएआई और वायुसेना के एक हवाई सर्वेक्षण के बाद एरिया-51 को इस कार्यक्रम के लिए चुना गया था।

दस्तावेजों के मुताबिक तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वाइट आइसेनहॉवर ने स्वयं इस जमीन के अधिकरण पर हस्ताक्षर किए थे।

जुलाई 1955 में विमान बनाने वाली कंपनी लॉकहीड, सीआईए और वायुसेना के कर्मचारी इस क्षेत्र में काम करने के लिए पहुंच गए थे।

जारी किए गए दस्तावेजों में न सिर्फ यू-2 विमान कार्यक्रम का पूरा ब्यौरा है बल्कि इनमें एरिया-51 में रही लोगों की दिलचस्पी और यूएफओ के साथ इसके नाम के जुड़ने जैसे विषयों पर भी रोशनी डाली गई है।

पचास के दशक में इस इलाके में यू-2 विमान सामान्य विमानों की उडा़न की ऊंचाई से बहुत ऊपर उड़ता था जिसके कारण यहां यूएफओ देखे जाने की रिपोर्टें भी आती रहती थीं।


दस्तावेजों के लेखक ग्रैगरी पैडलो और डोनाल्ड वेल्जेनवाख लिखते हैं, "उस वक्त किसी को यकीन नहीं था कि 60 हजार फिट से ऊपर कोई चीज उड़ान भर सकती है। इसलिए आसमान में इस ऊंचाई पर किसी चीज के दिखने की उम्मीद भी नहीं की जाती थी।"

उच्च स्तरीय चर्चा
इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की याचिका 2005 में दायर की गई थी लेकिन यूनिवर्सिटी को यह कुछ समय पहले ही हासिल हो सके।

नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव के वरिष्ठ वैज्ञानिक जैफ रिचेलशन कहते हैं कि गोपनीयता कि लंबी अवधि इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि एरिया-51 के अस्तित्व के बारे में दुनिया भर के लोग पहले से ही जानते थे।

रिचेलशन कहते हैं कि एरिया-51 के अस्तित्व को स्वीकारने का फैसला सीआईए ने हाल ही में सोच समझकर लिया है।

उन्होंने कहा, ''जहां तक मुझे लगता है पहली बार एरिया-51 के अस्तित्व को स्वीकारने के बारे में उच्चस्तर पर चर्चा हुई है।''


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