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ट्रंप के सपने! कितनी हकीकत, कितना फसाना?

Tue, 01 Nov 2016 05:35 PM IST
ब्रजेश उपाध्याय/ बीबीसी
ब्रजेश उपाध्याय/ बीबीसी Updated Tue, 01 Nov 2016 05:35 PM IST
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Trump's dreams! How true, how much bait?
ट्रंप ऐर हिलेरी - फोटो : BBC

पिउ रिसर्च के अनुसार, इस बार के चुनावों में अर्थव्यवस्था अमेरिकी वोटरों के लिए अहम मुद्दा है। खासतौर से डोनल्ड ट्रंप के 90 फीसद समर्थकों के लिए यह सबसे बडा मुद्दा है। पूरे देश में हुए कुछ और सर्वेक्षणों में भी अर्थव्यवस्था को सुधारने के मामले में वोटरों की राय थी कि ट्रंप हिलेरी क्लिंटन से बेहतर साबित होंगे। अमेरिकी चुनावों पर हमारी विशेष श्रृंखला की दूसरी कडी में बीबीसी ने इसी मुद्दे पर देश के अलग-अलग हिस्सों में आम अमेरिकियों से बात की।

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न्यूयॉर्क राज्य के बफेलो शहर में कभी हजारों को रोजी रोटी देनेवाला बेथलेहेम स्टील प्लांट लगता है जैसे आज अपनी किस्मत पर रो रहा है। गर्म पिघलते लोहे की जगह यहां सीलन से भरी दीवारें और जंग लगे ढांचे दिखते हैं। ऐसी ही कुछ बंद पड़ी और कुछ अभी भी धुंआ उगल रही मिलों के साए तले स्वानि हाउस अर्थव्यवस्था की गाडी को बरसों से रुकते-बढ़ते देख रहा है।
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यह यहां के सबसे पुराने शराबखानों में से है। इसके मालिक टिम वाइल्स एक कोने में बैठकर हर दिन इस शहर से रूबरू होते हैं। जिस दिन मैं वहां पहुंचा, उस दिन वहां एक बड़ा आइस हॉकी मैच था, जिसकी वजह से बार में खासी रौनक थी। लेकिन उस माहौल में भी ट्रंप और क्लिंटन की बहस सुनाई दे रही थी। वाइल्स का कहना था कि बरसों से सिर्फ डेमोक्रेट्स को अपनाने वाला यह इलाका, इस बार ट्रंप का नाम जप रहा है।
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वे कहते हैं, "ट्रंप बेबाक बातें करते हैं। इस शहर के लोग वैसी ही बातें सुनना चाहते हैं। ट्रंप के पास इतना है कि उन्हें इन राजनेताओं की तरह बात करने की जरूरत नहीं पड़ती।" उनके बार में आनेवाले ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो या तो खुद या फिर उनका कोई अपना इन बड़ी-बड़ी मिलों में काम कर चुका है और उनके बंद होने पर उन्हें रोजी-रोटी के लिए दूसरे रास्ते तलाशने पड़े।
 

यह अमेरिकी मिडल क्लास का वो चेहरा है

Trump's dreams! How true, how much bait?

यह अमेरिकी मिडल क्लास का वो चेहरा है, जिसे लगता है कि अमरीका की महानता इस बात में थी कि वह बड़ी-बड़ी चीजें बनाता था और उसमें पसीना बहानेवाले लोग ही सही मायने में इस देश की अर्थव्यवस्था की धुरी थे। इन्हें उम्मीद है कि ट्रंप ने जिस तरह से अपना बिजनेस खड़ा किया है, उसी तरह वो इन कारखानों को वापस ले आएंगे। बार में अपनी पत्नी के साथ वहां आए एक साहब, जिन्होंने कई बार आग्रह करने पर भी अपना नाम नहीं बताया, पिछले पचास सालों से हर दिन एक फैक्ट्री में सुबह तीन बजे की शिफ्ट में जाते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें स्टील के अलावा न तो कुछ बनाना आता है और न ही वे सीखना चाहते हैं।

वे कहते हैं, "ट्रंप की कई बातें मुझे पसंद नहीं हैं, खासतौर से जिस तरह से वे औरतों के बारे में बात करते हैं। लेकिन आज अगर अर्थव्यवस्था की कमान मुझे किसी के हाथ में सौंपनी हो तो वो ट्रंप ही होंगे।" स्वानि हाउस से कुछ ही दूरी पर जहां कभी बंद कारखाने होते थे, वहां बन रहा है सोलर सिटी। इससे हजारों नौकरियां पैदा होने के आसार हैं।

लेकिन लाल पिघलते लोहे के सामने इस तबके को इस नई अर्थव्यवस्था के ये रंग फीके लगते हैं। देखा जाए तो ओबामा के आठ सालों में अर्थव्यवस्था काफी बेहतर हुई है और बेरोजगारी की दर नीचे गई है। लेकिन रस्टबेल्ट कहलानेवाले इन इलाकों से बड़े कारखानों का पलायन पिछले 40-50 सालों से लगातार चल ही रहा है। ओहायो के यंग्सटाउन इलाके में एक से एक बड़ी स्टील मिलों के कंकाल नजर आते हैं। कभी उन्हीं में से एक में काम करने वाले मार्क जिलेट आज स्कूल बस चलाते हैं। उनका कहना है कि बड़ी फैक्ट्रियां तो सत्तर-अस्सी के दशक में ही बंद होनी शुरू हो गई थीं।

लेकिन उसके बाद जिस तरह के वाणिज्य समझौते हुए, उसने उनके वापस खड़े होने की उम्मीद खत्म कर दी। इसमें वो खास तौर से बिल क्लिंटन के नॉर्थ अमरीकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी नैफ्टा समझौते का जिक्र करते हैं। कहते हैं, "ट्रंप ने कहा है कि वे सभी व्यापार समझौतों को रद्द करेंगे और अमरीका के हितों को सबसे ऊपर रखेंगे। हिलेरी अभी तो कह रही हैं कि वे हमारे हितों का ख्याल रखेंगी, लेकिन वे वॉल स्ट्रीट के हाथों बिकी हुई हैं।"




 

नौकरियां वापस लाकर कारखानों को फिर से शुरू करने की बात करते हैं

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यह नारा काफी हद तक प्राइमरी चुनावों में हिलेरी के खिलाफ खड़े उनके डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंदी बर्नी सैंडर्स ने दिया था। ट्रंप ने इसे और जोरदार ढंग से बुलंद किया। इस बार के चुनावों में एक तरह से अमरीका के चारों ओर न सिर्फ ईंट और गारे की दीवार बनाने की बात हो रही है, बल्कि एक संरक्षणवादी (प्रोटेक्शनिस्ट) अर्थव्यवस्था की दीवार की बुनियाद डालने की कोशिश भी की जा रही है। हिलेरी क्लिंटन को काफी हद तक प्राइमरी चुनावों के दौरान अपने रूख में बदलाव लाना पडा और फिलहाल वे भी इसी तरफ झुकती नजर आ रही हैं। जहां बड़े-बड़े कारखाने थे वहां यह सोच वोटरों को काफी भा रही है।

जब ट्रंप चीन और मेक्सिको से नौकरियां वापस लाकर यहां के कारखानों को फिर से शुरू करने की बात करते हैं, तो तालियों की गूंज थमती नहीं है। लेकिन आर्थिक जानकारों की मानें तो ट्रंप जो ख्बाब दिखा रहे हैं, उसे आज की दुनिया में पूरा करना असंभव सा है।

इसी माहौल में नई अर्थव्यवस्था, एक नई सोच भी पैदा हो रही है। पेंसिलवेनिया के ईरी शहर में रेडियस कोवर्क के नाम से अपनी कंपनी शुरू करनेवाले बिल शॉल्ज और शॉन फेडोर्को का मानना है कि ट्रंप जितने भी वादे कर लें, बड़े कारखाने अब वापस नहीं आ रहे। अब तो सारा खेल कुर्सी, कंप्यूटर और टेक्नॉलॉजी का है। शॉन फेडोर्को कहते हैं, "मेरे और बिल दोनों ही के पिता मिलों में काम करते थे। लेकिन वो अर्थव्यवस्था अब मर चुकी है।"

यहां सिफ 2,500 लोग काम करते हैं

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​इन दोनों ने एक खाली पड़े फ्लोर को कम्युनिटी वर्कस्पेस में तब्दील कर दिया है, जहां आकर कोई भी बहुत छोटी सी रकम देकर इंटरनेट पर अपना बिजनेस शुरू कर सकता है। ईरी शहर की आबादी अब मुश्किल से एक लाख की रह गई है, सड़कें सूनी दिखती हैं। रेल की पटरियां बनानेवाली जी ई कंपनी में 15,000 कामगार थे। अब यहां सिफ 2,500 लोग काम करते हैं।

वेलोसिटी नेटवर्क के नाम से एक इंटरनेट कंपनी चलानेवाले जोएल डिउटरमैन कहते हैं कि एक बड़ी कंपनी बंद होती है तो जैसे पूरे शहर को सदमा लग जाता है। वे कहते हैं, "मैं तो चाहूंगा कि एक साथ 2500 लोगों को नौकरियां देने वाली एक कंपनी की जगह सौ-सौ लोगों को नौकरियां देने वली 25 कंपनियां लगें। यह आज के वक्त की जरूरत है।"

वे कहते हैं यहां सब कुछ अभी सस्ता है, इमारतें खाली पड़ी हैं। अमरीकी कंपनियां जो काम बेंगलुरु में करवाती हैं, वे रस्टबेल्ट के ऐसे शहरों में भी हो सकता है। लेकिन ट्रंप लोगों को वह रास्ता नहीं दिखा रहे हैं।

शहर में कई ऐसे लोग हैं, जिनके अपनों ने यहां के बड़े कारखानों में काम किया है। लेकिन वे अब उधर नहीं देख रहे। उनका मानना है कि अमरीकन ड्रीम अब अगर पूरा हो सकता है तो इस नई डिजिटल इकॉनॉमी की वजह से। नई अर्थव्यवस्था की बात करनेवाले इन लोगों में से ज्यादातर हिलेरी क्लिंटन को वोट देने की बात कर रहे हैं।

काफी हद तक रस्टबेल्ट के वोट नई और पुरानी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बंट रहे हैं। एक बड़ा तबका है, जो मानता है कि ट्रंप बंद पड़े कारखानों में जान डाल देंगे, दूसरा वर्ग वह है, जो कहता है कि ये यू टर्न मुमकिन नहीं है।

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