आप भी जान लीजिए, क्या है चमचमाते अमेरिकी शहरों का राज
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हम दुनिया के सामने अपने गंदे होने का ढिंढोरा तो पीट ही रहे हैं और दुनिया वालों से ठीक से सीख भी नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत का सपना आसानी से पूरा हो सकता है, बशर्ते थोड़ी तकनीक विकसित हो और नागरिक कायदों का पालन करें। अमेरिका में नदी, नहरों, नालों व तालाबों में कहीं न तो कोई कूड़ा या पॉलीथिन नजर आती और न ही कूडे़ या गंदगी के ढेर दिखते हैं।
हर घर के बाहर तीन-तीन कूड़ेदान
यहां हर घर के बाहर तीन तरह के प्लास्टिक के बड़े कूड़ेदान रखे जाते हैं। एक डिब्बे में घासफूस, खरपतवार व वनस्पतियां, दूसरे डिब्बे में रिसाइकिल होने वाला कूड़ा जैसे एल्युमीनियम, लोहा, लकड़ी व कांच के कूड़े आदि डाले जाते हैं, जबकि तीसरे डिब्बे में चायपत्ती, सब्जी, फल के छिलके, बाथरूम व रसोई का कूड़ा डाला जाता है।
नगर प्रशासन हर डिब्बे का कूड़ा उठाने के लिए अलग-अलग ट्रक/डंपर भेजता है। वनस्पतियों से कंपोस्ड खाद और रिसाइक्लेबल कूड़े की छंटाई कर उसे अलग अलग फैक्ट्रियों को बेच दिया जाता है। कूड़ा उठाने वाली गाड़ी सप्ताह में एक बार आती है। खास बात है कि कूड़ा इधर उधर डालना तो दूर, यदि कूड़ेदान का ढक्कन खुला छोड़ा तो भी जुर्माना तय है।
टैक्स देते हैं सुविधा लेते हैं
यहां कूड़ा हटाने के लिए स्थानीय प्रशासन का दस टायरा ट्रक आता है। जिसमें चारों ओर घूमने वाली मशीनें पहले झाडू से कूड़ा अंदर करती है फिर पानी का छिड़काव कर सारी मिट्टी मशीन के अंदर खींच ली जाती है। यह सब कर्मचारी ड्राइविंग सीट पर बैठे बैठे ही क रता है। स्थानीय प्रशासन इस सेवा के बदले नागरिकों से तीन माह का 250 डॉलर (17000 रुपये) वसूलता है। बेहतरीन सीवर सिस्टम के कारण नालियों में कहीं पानी होता ही नहीं।
स्ट्रीट लाइट्स के लिए सेंसर
भारत के शहरों में जहां तमाम इलाकों में स्ट्रीट लाइटें दिन भर जलती हैं और करोड़ों रुपये का बिजली व्यय होता है। वहीं अमेरिका में स्ट्रीट लाइट अंधेरा होने पर स्वयं जलती हैं और उजाला होने पर स्वत: ही बंद हो जाती हैं। स्ट्रीट लाइट का जलना व बुझना यहां सेंसर से होता है। इसीलिए बिजली की जरा भी बर्बादी नहीं होती।