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अमेरिका में बसने वाले भारतीयों की सफरगाथा

Fri, 04 Apr 2014 11:53 AM IST
Updated Fri, 04 Apr 2014 11:53 AM IST
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Story of the Indians who got settled in America

नासा, माइक्रोसोफ्ट जैसी अमेरिका की बड़ी कंपनियों में काम करने वाले भारतीय मूल के अमेरिकियों का सफर अमेरिका में कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। हजारों मील दूर दुनिया के किसी कोने में पेड़ से टूटकर एक नारियल गिरा, हवा और बारिश के थपेड़ों ने उसे धकेलकर एक नदी में पहुंचा दिया, नदी के साथ बहता हुआ नारियल समुद्र में पहुंचा और फिर महीनों तक डूबने उतराने के बाद लहरों ने उसे जमीन पर ला पटका।

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नारियल को मिट्टी पसंद आई, मिट्टी ने भी नहीं पूछा किस देश के हो, किस जात के हो, किस रंग के हो। नारियल ने जड़ जमाने की कोशिश की, कुछ ही महीनों में कोपलें फूटीं और वक्त के साथ वो टूटा हुआ फल एक हरा भरा पेड़ बन गया।
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कहते हैं कि कुछ हद तक यही है अमेरिका और यहां बसनेवालों की कहानी। यहां की मिट्टी ने सालों से रंग, जात, धर्म, भाषा, जेब की परवाह किए बिना उन सबको गले लगाया है जो कहीं से टूटकर, कहीं से उखड़कर आए और अपनी मेहनत से, अपनी ताकत से सूरज को थामने की कोशिश की।
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सफल भारतीयों की कहानी

Story of the Indians who got settled in America

इस हफ़्ते मैं वाशिंगटन के स्मिथसोनियन म्यूजियम में भारतीय मूल के अमरीकियों पर चल रही प्रदर्शनी देखने गया। भारतीय मूल के लोगों की एक से बढ़कर एक कामयाब कहानियों से दीवारें रंगी हुई हैं।

ऐसा लगा जैसे 1931 में जेम्स ट्रसलो ऐडम्स की लिखी किताब 'द एपिक ऑफ़ अमेरिका' का हर पन्ना सजीव हो उठा हो।

इस किताब में पहली बार अमेरिकन ड्रीम की परिभाषा दी गई थी यानि एक ऐसी मिट्टी का सपना जहां जिंदगी बेहतर हो, जहां काबिलियत की कद्र हो।

भारतीयों के खिलाफ हिंसा

Story of the Indians who got settled in America

उन्हीं तस्वीरों के बीच में है न्यूयॉर्क टाइम्स का छह सितंबर 1907 का पन्ना। हेडलाइन है—ग़ुस्साई भीड़ ने हिंदूओं को भगाया। पांच सौ से ज्यादा गोरे मजदूरों ने बेलिंघम शहर में टिंबर कारखाने में काम करनेवाले ज्यादातर सिख मजदूरों पर हमला किया, उन्हें बेरहमी से मारा-पीटा, कपड़े फाड़ डाले, बेइज्जत किया और दो सौ मजदूरों को रात भर एक बेसमेंट में बंद रखा।

ये नस्ली हिंसा थी और इसका मकसद था उन्हें इतना डरा देना कि वो शहर छोड़ दें और टिंबर मिलों में गोरे मज़दूरों की नौकरी पर कोई ख़तरा नहीं आए। अस्सी के दशक में न्यू जर्सी में भी भारत से आए लोगों पर हमले हुए। हमला करने वालों ने अपना नाम रखा था डॉटबस्टर्स—डॉट यानि बिंदी जो भारतीय महिलाएं लगाती थीं।

उनका नारा था कि वो न्यू जर्सी से भारतीयों को हर हाल में भगाएंगे और सड़क पर अगर कोई “हिंदू” नज़र आया तो उसपर हमला करेंगे। यहां भी वजह थी भारतीयों की बढ़ती आर्थिक तरक्की।

ब्लू से व्हाइट कॉलर

Story of the Indians who got settled in America

जिस तबके ने कभी इस कौम पर हमला किया वो अब सिर्फ हसरत भरी निगाहों से उन्हें ताकता है। भारतीय मूल के ज्यादातर लोग ब्लू कॉलर से व्हाइट कॉलर में तब्दील हो चुके हैं या हो रहे हैं। वो माइक्रोसॉफ़्ट में काम करते हैं, नासा में रिसर्च करते हैं, हार्वर्ड में पढ़ाते हैं, अस्पतालों में लोगों की जान बचाते हैं—ये जगह भीड़ वाली नहीं है। यहां तो बस वही बुलाए जाते हैं जिनमें कुव्वत होती है।

भारतीय मां-बाप दिन रात अपने बच्चों को कतार में आगे रखने की मशक्कत में जुटे रहते हैं। छठी क्लास से ही प्वांइट्स जमा किए जाते हैं कि अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला हो। बहुतों ने अपने आलीशान घरों में टीवी नहीं लगवा रखा है, बस किताबें दिखती हैं। स्कूलों में टीचर मान कर चलते हैं कि भारतीय बच्चा है तो वो हार्वर्ड, कोलंबिया और स्टैनफ़र्ड पर ही निशाना लगा रहा होगा।

स्मिथसोनियन की ये कामयाब तस्वीरें कई पीढ़ियों की कमाई है। ये याद दिलाती हैं कि पानी में बहकर आए नारियल को बहुत मेहनत करनी पड़ी है परदेस की इस मिट्टी में जड़ जमाने के लिए।

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