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पैसे पास हों तो फिर जाता है दिमाग?

Fri, 30 Aug 2013 03:57 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Fri, 30 Aug 2013 03:57 PM IST
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हमने आपने अपने घर परिवार और आस पड़ोस में कई बार ये जरूर सुना है- पैसे से उसका दिमाग फिर गया है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या वाकई ऐसा होता है?
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एक नया शोध बताता है कि पैसों के प्रभाव से इंसानों का स्वभाव बदलने लगता है। पुराने जमाने में लोग पैसों के बदले सामान का लेनदेन करते थे और इसके जरिए आम लोगों में सहयोग की भावना कहीं ज्यादा होती थी।

बड़े लोगों के समूह में ऐसा सहयोगात्मक रवैया अभी भी देखा जा सकता है लेकिन छोटे लोगों के समूह में यह देखा गया है कि अगर मामला फायदा हासिल करने का होता है तो लोगों में आपस में बांटने की प्रवृति कम हो जाती है।
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देखा गया कि किसी मामले में जब पैसा का महज नाम के लिए रखे गए तब भी लोगों की उदारता में कमी आई।

बदलता स्वभाव

यह शोध प्रोसेडिंग्स ऑफ द नेशनल अकादमी ऑफ सांइसेज में प्रकाशित हुआ है।

जब किसी समूह में पैसे की भूमिका बढ़ने लगती है तो उस समूह कि सामूहिकता प्रभावित होने लगती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि महज सांकेतिक लाभ की सूरत में भी लोगों का एक दूसरे के प्रति रवैया बदल जाता है।
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इस शोध अध्ययन का नेतृत्व करने वाले अमरीकी चैपमैन यूनिवर्सिटी के गैबरिले कैमेरा ने बताया कि वे अनजाने लोगों के बड़े समूहों में सहभागिता के पहलू की जांच करना चाहते थे क्योंकि वहां लोगों में एक दूसरे की सहयता करने की संभावना अपेक्षाकृत कम ही होती।

इस दल ने एक ऐसा प्रयोग चुना जिसके तहत छोटे और बड़े समूह के लोगों के बीच टोकन के बदले उपहार देने की व्यवस्था थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस प्रलोभन का असर लोगों के व्यवहार पर होने लगा।

जब सारे टोकन खर्च हो गए तो यह पाया गया कि उपहार देने वाले शख्स में दूसरे की सहायता का भाव कम हो चुका है। यह छोटे लोगों के समूह में देखा गया।

प्रोफेसर कैमेरा बताते हैं, "पैसों के इस्तेमाल से बड़े समूहों में तो सहभागिता का स्तर बढ़ता है लेकिन छोटे समूहों में यह कारगार नहीं हो पाता।"

बड़े समूह पर असर नहीं

32 लोगों के बड़े समूह में देखा गया कि टोकन के इस्तेमाल से सहभागिता का स्तर बढ़ गया। कैमेरा इसे भी दिलचस्प बताते हुए कहते हैं, "यह दिलचस्प है क्योंकि इसमें हमने देखा कि आर्थिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ने के बावजूद टोकन लोगों के रवैये पर असर डालता है।"

उनके मुताबिक़ दुनिया भर के लोगों के रोजमर्रा के जीवन के लेन देन में इसके नतीजे को देखा जा सकता है। अमरीका के सांता फे इंस्टीट्यूट के सैम बोउल्स इस शोध अध्ययन से नहीं जुड़े हैं लेकिन वे इंसानों में मौजूद सहयोगात्मक रवैये का अध्ययन करते रहे हैं।

वे कहते हैं कि स्वार्थी लोगों के बीच आपस में सहयोग का भाव हमेशा मौजूद होता है। वे कहते हैं, "इस अध्ययन में सबसे दिलचस्प बात यह है कि टोकन से लोगों का स्वभाव बदलता है। टोकन की अनुपस्थिति में जो लोग उदारता दिखाते हैं, टोकन की मौजूदगी में वे स्वार्थी हो जाते हैं।"


हालांकि सैम बोउल्स कहते हैं कि टोकन का लेन देन हमेशा काम नहीं करता क्योंकि मानवों में तब तक सहकारी गुण नहीं मिलते जब तक उसके नैतिक या अन्य पसंद नहीं मिलने लगें।
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