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पाकिस्तान को अमेरिका से मिलने वाली रकम में कटौती, 15 करोड़ डॉलर में करना होगा संतोष

Thu, 02 Aug 2018 06:28 PM IST
भाषा, वॉशिंगटन
भाषा, वॉशिंगटन Updated Thu, 02 Aug 2018 06:28 PM IST
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Pakistan will get 150 million dollar without taking action against terrorist network
Donald Trump
अमेरिकी संसद द्वारा पारित रक्षा विधेयक के अनुसार अब पाकिस्तान को अमेरिका से सहायता पाने के लिए आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है। कल पारित इस विधेयक में भले ही पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता राशि घटाकर 15 करोड़ डॉलर कर दी गयी है, लेकिन इस धन को पाने के एवज में हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई की पूर्व शर्त भी ट्रंप प्रशासन ने हटा ली है।
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अमेरिकी कांग्रेस के सीनेट में 2019 वित्त वर्ष के लिए जॉन एस मैक्केन नेशनल डिफेंस अथॉराइजेशन एक्ट (एनटीएए) (रक्षा विधेयक) कल 10 मतों के मुकाबले 87 मतों से पारित कर दिया गया। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने विधेयक पर पिछले सप्ताह ही मुहर लगा दी थी। अब यह हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जायेगा।
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पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में व्हाइट हाउस राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्य रहे अनीश गोयल ने पीटीआई से कहा, विधेयक में पाकिस्तान को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली कुल राशि घटाकर 15 करोड़ डॉलर कर दी गयी है। यह पिछले वर्ष मंजूर 70 करोड़ डॉलर के मुकाबले काफी कम है। 
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उन्होंने कहा, हालांकि अब पाकिस्तान को यह धन राशि पाने के लिए हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई दिखाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। साथ ही पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए भी कोई सहायता नहीं दी जाएगी। गोयल का कहना है, ऐसे में मौजूदा विधेयक पर ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद पेंटागन आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान पर दबाव नहीं बना सकेगा।

15 साल में अमेरिका से 208461 करोड़ की मदद

अमेरिकी संसद ने 716 अरब डॉलर का रक्षा विधेयक पारित किया है जिसमें भारत के साथ देश की रक्षा भागीदारी मजबूत करने की बात कही गयी है। ओबामा प्रशासन ने भारत को 2016 में अमेरिका के अहम रक्षा साझेदार का दर्जा दिया था। अमेरिकी कांग्रेस में 2019 वित्त वर्ष के लिए जॉन एस मैक्केन नेशनल डिफेंस अथॉराइजेशन एक्ट (एनटीएए) (रक्षा विधेयक) कल 10 मतों के मुकाबले 87 मतों से पारित कर दिया गया।

सदन ने पिछले सप्ताह विधेयक पारित किया था। अब यह कानून बनने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के वास्ते व्हाइट हाउस जाएगा। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट ने संयुक्त कॉन्फ्रेंस रिपोर्ट में कहा कि अमेरिका को भारत के साथ अपनी अहम रक्षा साझेदारी मजबूत करनी चाहिए। दोनों देशों को ऐसी साझेदारी करनी चाहिए जो हमारी सेनाओं के बीच ‘‘रणनीतिक, संचालनात्मक और सामरिक समन्वय बढ़ा सके।’’ 

विधेयक के अनुसार, कांग्रेस का मानना है कि अमेरिका को जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अन्य सहयोगियों तथा साझेदारों के साथ मिलकर मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के मूल्य बरकरार रखने की दिशा में काम करना चाहिए तथा क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता कायम करनी चाहिए।

इस विधेयक में चीन को दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय नौवहन युद्धाभ्यास रिम ऑफ द पैसिफिक एक्सरसाइज (आरआईएमपीएसी) में भाग लेने से रोकने तथा उसकी कंपनियों को रक्षा तथा सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए कुछ दूरसंचार उपकरण मुहैया कराने से रोकने का प्रावधान भी है।

15 साल में अमेरिका से 208461 करोड़ की मदद ले चुका है पाकिस्तान

वैश्विक विकास केंद्र (सेंटर फॉर ग्लोबल डवलवमेंट) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कि 1951 से लेकर 2011 तक अलग-अलग मदों में अमेरिका ने पाकिस्तान को 67 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद दी है। पिछले साल ही अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 255 मिलियन डॉलर की सैन्य मदद पर रोक लगा दी थी। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज्यादा की सहायता दे चुका है, यानी आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए पाकिस्तान को पिछले डेढ़ दशक में अमेरिका से 2 लाख 8 हजार 461 करोड़ रुपये की मदद मिल चुकी है।

यूं तो भारत विभाजन के बाद अस्तित्व में आए पाकिस्तान को उसके गठन से ही अमेरिका मदद देता आ रहा है। लेकिन 2001 में अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद यूएस ने पाकिस्तान को मदद का भंडार खोल दिया। अमेरिका के एक रिसर्च थिंक टैंक की रिपोर्ट में बताया गया है कि 1951 से लेकर 2011 तक अलग-अलग मदों में अमेरिका ने पाकिस्तान को 67 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद दी है।

9/11 हमले के बाद पाकिस्तान को अमेरिकी मदद (अमेरिकी डॉलर में)

2002- 2 अरब डॉलर
2003- 1.3 अरब डॉलर
2004- 1.1 अरब डॉलर
2005- 1.7 अरब डॉलर
2006- 1.8 अरब डॉलर
2007- 1.7 अरब डॉलर
2008- 2.1 अरब डॉलर
2009- 3.1 अरब डॉलर
2010- 4.5 अरब डॉलर
2011- 3.6 अरब डॉलर
2012- 2.6 अरब डॉलर
2013- 2.3 अरब डॉलर
2014- 1.2 अरब डॉलर

अपनी जरूरत के मुताबिक पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है अमेरिका, गवाह हैं आंकड़े

आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि पिछले 15 वर्षों से उनके देश को मूर्ख बनाने की कोशिश हुई है। अमेरिकी मदद का पाकिस्तान ने गलत इस्तेमाल किया है। ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान बौखला गया था और जवाब आया था कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तानी मदद के बदले उसे अमेरिकी मदद मिली थी।

पाकिस्तान, आतंकवाद और अमेरिकी मदद

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंधों में नरमी और गरमी समय के साथ बदलता रहा है। 1951 और 2011 के बीच पाकिस्तान ने अमेरिका से 67 बिलियन डॉलर की सहायता राशि प्राप्त की थी। लेकिन 1965 में पाकिस्तान और भारत में तनाव शुरु होने के बाद अमेरिका ने सैन्य सहायता पर रोक लगा दी थी। पाकिस्तान पर प्रतिबंध अगले 15 सालों तक जारी रहा।

1979 में सीआईए ने पाकिस्तान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम की पुष्टि की जिसके बाद राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने खाद्य सहायता को छोड़कर सभी सहायता निलंबित कर दी। 1980 के शुरुआत में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण के बाद एक बार फिर से पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता की राशि बढ़ा दी गई। राष्ट्रपति बुश यह प्रमाणित करने में विफल रहे कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, तब 1990 के दशक के दौरान भी अधिक से अधिक सहायता राशि पर रोक लगा दी गई थी। 1993 में अमेरिकी सहायता मिशन पर 8 सालों के लिए रोक लगा दी गई। 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद सहायता राशि में फिर से कटौती कर दी गई।

अगर 1951 से 2000 के बीच के समय को देखें तो ये बात स्पष्ट है कि 1980 का साल पाकिस्तान के लिए अमेरिकी मदद महत्वपूर्ण है। दरअसल अफगानिस्तान में राजनीतिक संक्रमण का दौर चल रहा था। दुनिया दो खेमों में बंटी हुई थी। एक खेमे का नेतृत्व रूस कर रहा था। अफगानिस्तान में अपने दबदबे को कायम रखने के लिए रूस वहां के राष्ट्रपति नजीबुद्दौला का समर्थन कर रहा था। अमेरिका को डर था कि रूस अफगानिस्तान के और दक्षिण यानि पाकिस्तान तक अपना प्रभाव बढ़ा सकता है और उस तरह के हालात दक्षिण एशिया में अमेरिका के लिए बेहतर नहीं होगा। लिहाजा अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान के लिए अपने खजाने को खोल दिया।

लेकिन सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद हालात बदल चुके थे। अफगानिस्तान में कट्टरपंथी ताकतें सिर उठाने लगी थीं और वहां की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही थीं। ये सच है कि अब रूस से अमेरिका को किसी तरह का डर नहीं था। लेकिन एक अलग तरह का खतरा भी आहट दे रही थी। 90 के दशक में उदारीकरण के बाद अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते बेहतर हो रहे थे। भारत 1998 के परमाणु परीक्षण के जरिए अपनी ताकत को दुनिया के सामने दिखाया। अमेरिकी इमदाद पर पल रहे पाकिस्तान को ये सबकुछ रास नहीं आया और उसने भी परमाणु परीक्षण किया। अमेरिका को ये सब नागवार लगा और उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोक दी।

9/11 के बाद पाकिस्तान के हालात बदले

9/11 के आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान के हालात बदल गए थे। तालिबान और अलकायदा के खात्मे के लिए अमेरिका ने कसम खाई। अफगानिस्तान में अमेरिका को अपनी योजना कामयाब बनाने के लिए एक ऐसे सहयोगी की तलाश थी जो उसकी सामरिक जरूरतों को पूरी कर सके। इन सब परिस्थितियों में अमेरिका के लिए पाकिस्तान एक बेहतर विकल्प था। आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि काफी हद तक बढ़ा दी गई। 2004 में अमेरिका ने एक अरब डॉलर की ऋण राहत की अवधि बढ़ा दी।

2009 में केरी-लुगर-बर्मन एक्ट जिसे पाकिस्तान के साथ बेहतर भागीदारी एक्ट 2009 के नाम से भी जाना जाता है, पारित किया गया। कांग्रेस ने वित्त वर्ष 2010 से वित्त वर्ष 2014 तक के पांच वर्षों के दरम्यान आर्थिक सहायता तीन गुना बढ़ाकर 7.5 अरब डॉलर करने का फैसला किया। 2002 से 2009 के बीच पाकिस्तान को दिया गया अमेरिकी विदेशी सहयोग का केवल 30 फीसदी ही आर्थिक कारणों से जुड़ा था। बाकी 70 फीसदी फंड सुरक्षा कारणों के लिए था। 2011 में कुल फंड का 3.4 फीसदी अमेरिकी सहायता प्राप्त करने वाला पाकिस्तान चौथा सबसे बड़ा देश बन गया था।

1951 से 2017 तक के पाकिस्तान-अमेरिकी संबंधों को देखें तो वो बहुत हद तक अमेरिका की जरूरतों के हिसाब से नियंत्रित होता रहा। पाकिस्तान सिर्फ कठपुतली की भूमिका में था। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में खटास ओबामा प्रशासन के दौरान ही शुरू हो चुका था जब अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क की खबरें सामने आने लगी। हक्कानी नेटवर्क के खात्मे के नाम पर पाकिस्तान ने अमेरिका से मदद ली। लेकिन कनाडाई-अमेरिकी जोड़ी को हक्कानी नेटवर्क द्वारा बंधक बनाए जाने की पुख्ता जानकारी के बाद ट्रंप प्रशासन की नजर तिरछी हो गई थी।
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