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आखिर अरबों रुपए की इन पेटिंग्स में ऐसा क्या है?
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Tue, 14 May 2013 05:10 PM IST
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वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का माहौल है, लेकिन चित्रकला और मूर्ति कला की कीमतें आसमान छू रही हैं।
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सात साल पहले पिकासो की पेंटिंग 'द ड्रीम' को लॉस वेगास के कैसिनो मालिक स्टीव व्यान महज़ 139 लाख डॉलर (लगभग सात अरब 61 करोड़ रुपए) में बेचना चाहते थे।
इस साल मार्च महीने में यही पेंटिंग एक अमरीकी संग्रहकर्ता ने 150 लाख डॉलर यानी लगभग 8 अरब 22 करोड़ रुपए देकर खरीदी।
इससे उनकी हैरानी का अनुमान लगाया जा सकता है कि सात सालों में एक पेंटिंग की कीमत एक अरब रुपए बढ़ सकती है।
यह पेंटिंग पाब्लो पिकासो की युवा प्रेमिका मारे थ्रेसे की कामुक तस्वीरों में से एक है। जिसे उन्होनें 1932 में अपने उत्कट प्रेम संबंधों के दौरान बनाया।
पिकासों के द्वारा बनाई कृतियों की बाज़ार में भारी मांग है। जिसकी बाज़ार में काफी ऊंची कीमत लगती है।
कला का बाज़ार
लेकिन "द ड्रीम" पेंटिंग में छेद होने के कारण अरबपति स्टीव कोहन ने तस्वीर को खरीदने का सौदा सात साल पहले वापस ले लिया था।
सात सालों बाद इस तस्वीर की मरम्मत करके बेचा गया तो इसकी कीमत ने एक रिकार्ड बना डाला।
पिकासों की प्रेमिका की यह यह तस्वीर लगभग 8 अरब 22 करोड़ रुपयों में बिकी। यह पिकासो की किसी तस्वीर के लिए अमरीकी संग्रहकर्ता द्वारा चुकाई गई सबसे अधिकतम कीमत है।
दुनिया के अधिकांश देश मंदी की चपेट में हैं, लेकिन इसके समानांतर तमाम पेंटिंग्स अरबों रुपए में बिक रही हैं। जिससे पता चलता है कि कला का बाज़ार मंदी की पकड़ से बाहर है।
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पिछले साल न्यूयॉर्क में एडवर्ड मंच की 'द स्क्रीम' को लगभग 120 लाख डॉलर या लगभग 658 करोड़ से अधिक कीमत में बेचा गया।
कला बाज़ार में कला वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का अंदाज़ा 'द स्क्रीम' से मिलता है।
बाज़ार का विस्तार
वर्तमान में नई अर्थव्यवस्थाओं के उभार और बदलती जीवन शैली में कला फ़ैशन का रुप ले रही है।
इस कारण से भी विलासिता की वस्तुओं का बाजा़र और विस्तृत हो रहा है। पिछले 25 सालों में इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है।
कला अर्थशास्त्री डॉक्टर क्लेयर मैकएंड्रयू ने 2012 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि डीलरों और कला बिक्री केंद्रों से लगभग 27।2 अरब डॉलर की कलाकृतियों की बिक्री हुई।
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वर्तमान में यह कीमत लगभग तिगुनी बढ़कर 65।8 अरब डॉलर हो गई है।
उनके मुताबिक 2012 में पिछले साल बिक्री में कमी के बावजूद कलाकृतियों के कारोबार का आंकड़ा 56 अरब डॉलर के आसपास रहा।
नई अर्थव्यवस्थाओं के जुड़ने के कारण कला वस्तुओं की बिक्री में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ कला का कारोबार और बेहतर हुआ है।
वर्तमान में यह एक वैश्विक बाज़ार के रुप में उभर रहा है। जिस पर अमरीका और यूरोप का कोई दबाव नहीं है। यह वहां के कलाकारों के दबदबे से भी आज़ाद है।
पिछले दो सालों में चीन में कला वस्तुओं पर खर्च करने की प्रवृत्ति में असाधारण बढ़ोत्तरी देखी गई। उसने कला वस्तुओं की खरीद में शीर्ष स्थान हासिल किया।
चीन और हांगकांग कला वस्तुओं की बिक्री में संयुक्त रुप से 25 प्रतिशत हिस्सा साझा करते हैं। अमरीका 33 प्रतिशत हिस्से के साथ शीर्ष पर बना हुआ है। लेकिन चीन अभी भी नंबर दो पर कायम हुआ है।
चीन में कला वस्तुओं की बिक्री का स्तर पश्चिमी देशों के नामचीन लोगों के समकक्ष है। ग्यारहवीं शताब्दी की सुंदर अक्षरों की पट्टिका को आश्चर्यजनक 63।8 लाख डॉलर में बेचा गया।
खाड़ी देशों में बढ़ती मांग
निजी और राज्य प्रायोजित संग्रहालयों के फ़ैशन के कारण भी कला वस्तुओं के बाज़ार में तरक्की हो रही है।
खाड़ी देशों जैसे कतर और संयुक्त अरब अमीरात में महत्वाकांक्षी संग्रहालयों के लिए कला वस्तुओं की खरीद की जा रही है।
कतर का शाही परिवार की मसाया अल थानी, सक्रिय खरीददारों में से एक हैं, उन्हें विश्व के सबसे बड़े खरीददारों में से एक माना जाता है।
उनको आधुनिक और समसामयिक कलाकृतियों को खा़सतौर पर पसंद करती हैं। कतर किसी कलाकृति के अधिकतम कीमत देने वाले देश के रुप में जाना जाता है।
सिज़ैन की कलाकृति "कार्ड प्लेयर" को 250 लाख डॉलर में खरीदा गया था।
अधिकांश नव-संपन्न लोगों के लिए कलाकृतियां खरीदना आकर्षक जीवनशैली से जुड़ने का माध्यम है।
" बड़े कलाकारों की कृतियों के लिए बाज़ार में भारी मांग है। लेकिन नए और कम लोकप्रिय कलाकारों के लिए स्थितियां बेहतर हों जरुरी नहीं है।"
सारी दुनिया में अनगिनत कला मेले लगते हैं और लोग कला दीर्घाओं की भव्य पार्टियों शामिल होते हैं।
फ़ैशन पत्रिकाओं, घड़ी कंपनियों और बैंकों का ऐसे मौकों पर जमघट लगता है। जो कला को नए उपभोक्ता बाज़ार के रुप में देख रहे हैं।
भारत और चीन में कला वस्तुओं की खरीद को शौक या फ़ैशन की बज़ाय निवेश के रुप में देखा जाता है।
उजाले का अंधेरा
पूरे परिदृश्य में एक तरह का विभाजन दिखाई पड़ता है। संपन्न लोगों का एक छोटा सा हिस्सा प्रसिद्ध कलाकारों की कृतियों की कीमतों को बढ़ाने में योगदान दे रहा है।
लेकिन कला बाज़ार का वह हिस्सा जो मध्य और निचले स्तर पर है,उस पर लोग कम ध्यान दे रहे हैं।
कला बाज़ार का पूरा परिदृश्य बहुत सुंदर दिखाई देता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश कलाकारों को उनकी कृतियों की अच्छी कीमत नहीं मिलती।
विशेषकर मध्यम स्तरीय बाज़ारों में कुछ कला दीर्घाएं बंद होने की कगार पर हैं, तो बाकी अपने कठिन दौर से गुज़र रही हैं। कला दुःखद रुप से संपन्न लोगों का शौक बनकर रह गई है।