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वर्ष 2050: जवानों पर भारी पड़ेगे बूढ़े लोग

बीबीसी हिंदी Updated Mon, 15 Oct 2012 12:45 PM IST
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 old people will more than young in 2050
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विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी दस अरब तक पहुंच जाएगी, लेकिन क्या ये आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा भी हो सकता है? हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफ़पीए) ने दुनिया की बूढ़ी होती आबादी के बारे में एक रिपोर्ट पेश की है।
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यूएनएफ़पीए की डॉक्टर एन पाउलिज़्को कहती हैं, "आज दुनिया में हर नौ में से एक व्यक्ति की उम्र 60 साल या उससे ज़्यादा है। लेकिन वर्ष 2050 तक हर पांच में से एक व्यक्ति 60 साल या उससे बड़ा होगा और उस वक्त तक 15 साल से कम उम्र से कहीं अधिक संख्या बड़ी उम्र के लोगों की होगी।"

चिंता या ख़ुशी का विषय?
संयुक्त राष्ट्र के लिए ये आंकड़े ख़ुशी के साथ ही चिंता का विषय भी हैं। अच्छी बात ये है कि ज़्यादा लोग लंबे समय तक जी रहे हैं लेकिन चिंता की बात ये है कि ये बदलाव एक आर्थिक और सामाजिक चुनौती पेश करता है।

डॉक्टर पाउलिज़्को चाहती हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा देश जनसंख्या में आने वाले इस बदलाव के लिए तैयार रहें क्योंकि इसमें कोई शक़ नहीं है कि ये हो रहा है।

वो कहती हैं, "वर्ष 2050 के आंकड़ों के बारे में हमें पूरा यक़ीन है क्योंकि उस समय जो लोग 60 साल के होंगे वो तो पैदा हो चुके हैं। ये महज़ अनुमान नहीं है।"

लेकिन इस समीकरण का एक पक्ष है जन्म दर। ये दर किस तरह बदलेगी इसका अनुमान लगाना ज़्यादा मुश्किल और ज़्यादा दिलचस्प है। लंबे समय से आंकड़ों का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ एक ऐसे "जनसांख्यिकी में बदलाव" की बात कर रहे हैं जो समाज के समृद्ध होने पर आता है।

डॉक्टर एन पाउलिज़िस्को कहती हैं, "जनसांख्यिकी में बदलाव का मतलब है एक आबादी में जन्म और मृत्यु दरों का उच्च स्तर से निचले स्तर पर आना, और ये ज़्यादातर आर्थिक और सामाजिक विकास का नतीजा होता है।" जैसे-जैसे देश ज़्यादा समृद्ध होते हैं, प्रजनन दर कम होता जाती है, लेकिन उसके बाद क्या होता है?

कई विशेषज्ञों का मानना है कि विकसित देशों में आबादी बढ़ने की दर कम ही रहेगी, लेकिन ताज़ा सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि ये सोच ग़लत हो सकती है।

आबादी के अनुमान-कितने सही, कितने ग़लत
ब्रिटेन के साउथहैंपटन विश्वविद्यालय के ईएसआरसी सेंटर फॉर पॉपुलेशन चेंज की निदेशक प्रोफ़ेसर जेन फॉल्किंघम कहती हैं, "इतिहास पर नज़र डालें तो देखेंगे कि यूरोप में प्रजजन दर कम हो रही है, लेकिन अगर हम पिछले लगभग 10 वर्षों को देखें तो हम पाएंगे कि सबसे ज़्यादा विकसित देशों में प्रजजन दर बढ़ी है।"

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर फ़्रांचेस्को बिलारी कहते हैं कि विकसित देशों के प्रजनन दर में इस बढ़ोतरी की वजह सिर्फ़ अप्रवासन नहीं है। इसके साथ ही स्थानीय लोग भी बदल रहे हैं।" लेकिन सवाल ये है कि हाल में विकसित देशों के प्रजनन आंकड़ों में देखी गई बढ़ोतरी से वैश्विक आबादी के अनुमानों पर कितना असर पड़ सकता है?

डॉक्टर पाउलिज़्को इसे बहुत ज़्यादा नहीं मानतीं और उनकी ये सोच सही भी हो सकती है, लेकिन इस बारे में यक़ीन के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि सांख्यिकीविद लंबे समय से अहम जनसांख्यिकी बदलावों के बारे में सही पूर्वानुमान करने में असफल रहे हैं।

प्रोफ़ेसर फॉल्किंघम कहती हैं, "दरअसल पिछले 50 सालों से जनसंख्या के पूर्वानुमानों के बारे में हम लगातार ग़लत साबित हुए हैं, और इसकी एक वजह ये है कि हमने लोगों के, ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों के बढ़ते और बेहतर जीवनकाल को सही तरह से नहीं आंका, और इसलिए भी क्योंकि हम प्रजनन के प्रचलनों को पहचानने में भी नाक़ाम रहे हैं।"

असल में जनसंख्या के पूर्वानुमान हमेशा ही एक अनिश्चित विज्ञान रहेगा. दूसरे शब्दों में कहें, अगर हम भविष्य में झांके तो कुछ भी हो सकता है।
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