{"_id":"b7f408cbf67e26001076cc1983c75be8","slug":"maisoon-zaid-amarican-actress-ramzan","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमेरिकी अभिनेत्री को क्यों रोजे रखना छोड़ना पड़ा? ","category":{"title":"America","title_hn":"अमेरिका","slug":"america"}}
अमेरिकी अभिनेत्री को क्यों रोजे रखना छोड़ना पड़ा?
Updated Fri, 02 Aug 2013 07:51 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मस्तिष्क पक्षाघात (सेलिब्रल पाल्सी) से पीड़ित अमेरिकी हास्य अभिनेत्री मैसून ज़ायिद कुरान से छूट के बावजूद रमज़ान में हमेशा रोज़े रखती रही हैं। लेकिन क्या हुआ इस साल? बता रही हैं ख़ुद मैसून ज़ायिद।
विज्ञापन
मस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित होने के बावजूद मैं रमज़ान में हमेशा रोज़े रखती रही हूँ, लेकिन इस साल मैं हार गई हूँ। 2013 में पवित्र रमज़ान महीने के पहले दिन 10 जुलाई को मेरे रोज़े का अन्त हो गया।
विज्ञापन
मस्तिष्क पक्षाघात के कारण मेरा पूरा शरीर बुरी तरह काँप रहा था।
दोपहर तक मुझे लगने लगा कि मैं अब और नहीं सह सकती थी और समय से पहले आठ बजे ही मैंने रोज़ा तोड़ लिया क्योंकि मैं मुश्किल से सांस ले पा रही थी। मैं जान गई थी कि ये मेरा आखिरी रोज़ा था।
विज्ञापन
रमज़ान की शुरुआत
मैं तीन दशकों से रोज़े रख रही थी। मेरा जन्म अमेरिका में हुआ, पढ़ाई न्यूजर्सी में, जबकि मेरी छुटि्टयां वेस्ट बैंक में बीतती थीं।
मैंने पहली बार रोज़े तब रखे थे जब मैं आठ साल की थी और गर्मी की छुटि्टयों के लिए अपने माता-पिता के गांव में थी।
मध्य पूर्व में इस समय भारी गर्मी होती है जिसकी वजह से रमज़ान का वक्त बहुत कठिन हो जाता है, जबकि खान-पान, धूम्रपान और सेक्स करने से परहेज़ किया जाता है।
मस्तिष्क पक्षाघात जैसी चुनौती के बावजूद रोज़े रखना मेरे लिए कभी भी कठिन नहीं रहा। मैं उन दीवाने मुसलमानों में से हूँ जो रमज़ान को बहुत प्यार करते हैं। इस बीमारी के बाद मुझे रोज़े नहीं रखना चाहिए था, लेकिन रमज़ान इस्लाम के पांच जरूरी स्तम्भों में से एक है।
कुरान की 'सुरा 2, आयत 185' में बीमार लोगों को रोज़े रखने से छूट दी गई है।
इसलिए जब मैने रोज़े रखने का निर्णय किया तो मेरा एक विजेता की तरह स्वागत किया गया, मेरा परिवार खुद को सातवें आसमान पर महसूस कर रहा था।
मैने कोई कमज़ोरी नहीं दिखाई, क्योंकि मैं जानती थी निश्चित रूप से मुझे मरने पर जन्नत नसीब होगी, और इन सबसे ज़्यादा 30 दिन बाद रोज़े ख़त्म होने के समय ईद पर मुझे बेहतरीन उपहार भी मिलेंगे।
माँ का साथ
मेरी माँ मुझसे कहा करती थी कि अगर मैं रोज़े नहीं रख पा रही तो कोई बात नहीं है, मुझे इसकी जगह ग़रीबों को खाना खिलाने जैसा कोई ऐसा काम करना चाहिए जिससे दूसरों का भला हो सके।
मेरे लिए सबसे मुश्किल रमज़ान 2011 में दस दिन की एक यात्रा के दौरान रहा जब मैं अमेरिका में थी। मैं गर्मी में सड़कों पर शूटिंग कर रही थी।
तब मुझे पहली बार रमज़ान में दिक्कत महसूस हुई। मैं प्यासी और थकी हुई महसूस कर रही थी। कभी कभी तो मैं रात को साढ़े आठ बजे तक अपना रोज़ा नहीं खोल पाती थी, लेकिन फिर भी मैं सही सलामत रही।
इस बार रमज़ान में आख़िर मेरा रोज़ा टूट ही गया जब मुझे दिन के उजाले में ही ना चाहते हुए भी पानी पीना पड़ा।
पानी पीते समय मुझे लग रहा था जैसे मैं ज़हर पी रही हूँ, क्योंकि अपनी प्यास बुझाना मुझे अच्छा प्रतीत नहीं हो रहा था। हर साल रमज़ान के दिन मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत दिन रहे हैं। और रोज़े को तोड़ते वक़्त मुझे किसी परंपरा के ख़त्म होने जैसा प्रतीत हो रहा था।
जीवन का मकसद
रोज़े ना रख पाने के कारण मैं शर्मिंदा नहीं हूँ, लेकिन मैं ऐसे कई बीमार और विकलांग लोगों को जानती हूँ जो रोज ना रख पाने के कारण शर्मिंदा महसूस करते हैं।
मेरा मकसद उन लोगों को अब ये बताना है, जो किसी अक्षमता के कारण रोज़े नहीं रख सकते, उन्हे रोज़े रखकर ख़तरा नहीं उठना चाहिए। रोज़े रखते हुए मर जाना सही नहीं है।
इससे बेहतर होगा कि वे दान करके उन लोगों की मदद करें जिन्हें वाकई इसकी ज़रूरत है।