क्या ओबामा की परीक्षा ले रहे हैं पुतिन?
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अमेरिकी अधिकारी कहते हैं कि व्लादिमीर पुतिन ने बहुत बुरा निर्णय लिया है, जो उनके देश को और बदतर हालत में ले जाएगा। लेकिन यह ओबामा के नेतृत्व की महत्वपूर्ण परीक्षा भी है। इससे पता चलेगा कि दुनिया में अमेरिका की कितनी धमक है।
अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी यूक्रेन के नेताओं से मिलने के लिए कीएफ़ जा रहे हैं। अमेरिका रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर दबाव बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लामबंदी करने का प्रयास कर रहा है।
लेकिन अमरीकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने किसी तरह के सैन्य हस्तक्षेप की संभावना से इनकार किया है। राष्ट्रपति ओबामा के आलोचक उन पर कार्रवाई करने में सुस्ती बरतने का आरोप लगा रहे हैं। शुक्रवार की शाम को उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर रूसी सेना यूक्रेन में हस्तक्षेप करती है तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
विश्वसनीयता का संकट
माना जा रहा है कि उनकी विश्वसनीयता ही सबसे बड़ी समस्या है और पुतिन इसी बात से प्रेरित हुए हैं। इस संकट से निपटने के लिए पश्चिमी देश पूरी तरह तैयार नहीं हैं और यह जब प्रदर्शन अपने चरम पर था, उसी समय यह स्पष्ट था कि पुतिन इतनी आसानी से नहीं मानने वाले।
यहां ध्यान दिलाना महत्वपूर्ण है कि पुतिन ने जॉर्जिया में तब युद्ध किया था जब जॉर्ज डब्ल्यू बुश राष्ट्रपति थे। कोई यह नहीं सोचता कि वो एक शांति प्रिय व्यक्ति हैं। बुश ने कभी सोवियत संघ का अंग रहे एक देश के लिए एक परमाणु शक्ति संपन्न देश से युद्ध न करना ही बेहतर समझा।
वरिष्ठ अमरीकी अधिकारी इस बात को सुनकर भड़क उठते हैं कि ओबामा के पुराने बर्ताव के कारण ही पुतिन की हिम्मत बढ़ी है। ये अधिकारी कहते हैं कि रूस की यूक्रेन नीति विफल हो गई है। वहां अब उनका कोई आधार नहीं है और अब ताक़त का प्रयोग ही उनके लिए एकमात्र चारा है। इन अधिकारियों का कहना है कि दुनिया उन्हें कठघरे में खड़ा कर रही है न कि ओबामा को।
पुतिन बेफिक्र, यूक्रेन में विरोध प्रदर्शन
अमेरिका दुनिया भर में रूस के ख़िलाफ़ गोलाबंदी कर रहा है इसलिए आने वाले दिनों में बहुत कुछ हो सकता है। रूस पर दबाव बनाने का पहला कदम जून में सोची में होने वाली जी-8 देशों की बैठक है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन ने इस बैठक को रद्द कर दिया है।
पश्चिमी देशों की 'ऑफ रैम्प' योजना के तहत रूसी मूल के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक भेजने का प्रस्ताव है जो पुतिन को शायद ही पसंद आए। क्रीमीया 1783 से ही रूस का हिस्सा रहा है और सोवियत संघ के शुरुआती दिनों में यह रूसी संघ में शामिल एक स्वशासित गणराज्य था। 1954 में ख्रुश्चेव ने इसे यूक्रेन को दे दिया। अब पुतिन इसे वापस लेना चाहते हैं। यहां से पीछे हटना एक उनके लिए विफलता होगी और एक अपमान भी। ओबामा के साथ दिक्कत यह है कि आर्थिक प्रतिबंध अपना असर दिखाने में लंबा वक्त लेते हैं।
पुतिन को किसी भी कूटनीतिक दबाव की फिक्र नहीं है। लगता है कि उन्हें पश्चिमी नेताओं को चिढ़ाने में मज़ा आ रहा है। यह साफ देखा जा सकता है कि परिस्थिति कैसे और ख़राब हो सकती है और यह स्पष्ट नहीं है कि इस बढ़ते संकट से ओबामा कैसे निपटते हैं।