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मौत देने वाली मशीन की भयावह कहानी

Sun, 16 Mar 2014 08:23 AM IST
स्टीफन सैकर/बीबीसी हार्डटॉक
स्टीफन सैकर/बीबीसी हार्डटॉक Updated Sun, 16 Mar 2014 08:23 AM IST
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I knew I have killed one more human being

डॉक्टर एलेन अल्ट जब जॉर्जिया के करेक्शन कमिश्नर की अपनी भूमिका के बारे में बताते हैं तो ऐसा लगता है मानो टीवी स्टूडियो को भूलकर वे मृत्युदंड देने वाले चैंबर के दिनों को फिर से जी रहे हैं। वे मुझसे कहते हैं, "मुझे आज भी रात को डरावने सपने आते हैं।" अल्ट बताते हैं, "यह पहले से सुविचारित हत्या की तरह है, जिसके बारे में आप केवल कल्पना कर सकते हैं और जो आपके मनोजगत में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है।"

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जिस आदमी की देखरेख में पाँच बार मौत की सज़ा दी गई हो, उसके होठों पर 'हत्या' जैसे शब्द का आना असाधारण प्रतीत होता है। एलेन अल्ट को आख़िर क्या हुआ? वो क्या बात है जो उनको न्याय व्यवस्था के वफादार सेवक से मृत्युदंड के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले एक भावुक प्रदर्शनकारी में तब्दील कर देती है।
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पीड़ादायक सफ़र
डॉक्टर अल्ट का सफ़र एक प्रमोशन के साथ शुरू हुआ। डॉक्टर अल्ट एक मनोवैज्ञानिक के रूप में जॉर्जिया की जेल के डॉयग्नोस्टिक एंड क्लासिफिकेशन सेंटर में काम कर रहे थे। जब इस जेल को मृत्युदंड देने वाले केंद्र के रूप में चुना गया, तो डॉक्टर अल्ट इसके वार्डन बनाए गए।
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वो खुद मृत्युदंड के बारे क्या सोचते हैं इस पर गहराई से विचार किए बिना ही वो मौत देने वाली मशीन के प्रमुख बन गए। जॉर्जिया में मृत्युदंड के लिए इलेक्ट्रिक चेयर का प्रयोग किया जाता था। अल्ट को वहाँ दिए गए हर मृत्युदंड की हर बात पूरी तरह याद है।

उनके लिए शायद सबसे अधिक पीड़ादायक याद है 17 वर्षीय क्रिस्टोफ़र बर्जर को दिया गया मृत्यदंड। यह किशोर कमोबेश मानसिक दुर्बलता की स्थिति में था। वो एक जघन्य बलात्कार और हत्या में शामिल था। बर्जर ने मृत्यु के इंतज़ार में 17 साल बिताए। डॉक्टर अल्ट ने उसे बदलते हुए देखा।

इस अशांत युवक को शिक्षा मिली, उसका दिमाग़ विकसित और परिपक्व हुआ। वो बताते हैं कि बर्जन एक गंभीर अपराध का दोषी था, लेकिन उसे निराशाजनक ढंग से पश्चाताप भी था। जब डॉक्टर अल्ट बर्जर के मृत्युदंड के बारे में मुझे बता रहे थे तो उनके शब्दों में एक प्रभाव था लेकिन उनकी ख़ामोशी उससे भी ज्यादा प्रभावशाली थी।

डॉक्टर अल्ट के दुःख और पश्चाताप को कम करने के लिए दो दशकों का समय शायद कम है। 'मैंने एक इंसान को मार डाला।'' अल्ट कहते हैं, "उसके आख़िरी शब्द थे-कृपया मुझे माफ़ कर दीजिए।"

वह बताते हैं, "मैं उसके शरीर में दौड़ते हुए करंट को देख सकता था। इलेक्ट्रिक चेयर में उसका सिर पीछे खिंच गया और वहाँ पूरी तरह सन्नाटा फैल गया।।।मैं जानता था कि मैंने एक और इंसान को मार डाला।" हर मृत्युदंड ने डॉक्टर अल्ट की आशंका को और बढ़ा दिया। विलियम हेनरी हैंस एक काले व्यक्ति थे। उनको गोरे लोगों की बहुसंख्यक जूरी ने तीन महिलाओं की हत्या का दोषी ठहराया था।

जूरी के एक काले सदस्य ने बाद में नस्ली भेदभाव की बात कही। जूरी के एक गोरे सदस्य ने कहा "इस मृत्युदंड से एक हब्शी तो कम होगा, जो बच्चे नहीं पैदा करेगा।" हैंस की आईक्यू इतनी कम थी कि वह कुछ विशेषज्ञों को लगता था कि वो एक याचिका भी नहीं दायर कर सकता था। दोषी ठहराए जाने के बाद उसे मौत की सज़ा मिली और इसे अंजाम देने की ज़िम्मेदारी डॉक्टर अल्ट पर आई।

मैंने डॉक्टर अल्ट से पूछा कि आप पीछे क्यों नहीं हटे? वह जवाब देते हैं, "अंत में मैंने ऐसा किया। लेकिन तब तक काफ़ी देर हो गई थी?"वे बताते हैं, "मैंने पूरी ज़िंदगी हर उस लम्हे और हर मृत्युदंड पर पश्चाताप करते हुए बिताई है।"

अपराधबोध और शर्म
अल्ट ने 1995 में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उसके बाद उन्होंने अपराधबोध की भावना से बाहर आने के लिए मनौवैज्ञानिक परामर्श का सहारा लिया। वो अमेरिका में मृत्युदंड के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले प्रमुख लोगों हैं। वो नहीं मानते कि मौत की सज़ा देने से समाज में बुराई पर रोक लगती है।

मृत्युदंड के मामले का एक नस्ली पक्ष भी है। वे कहते हैं, "किसी गोरे व्यक्ति की हत्या करने वाले को किसी काले व्यक्ति की हत्या करने की तुलना में मृत्युदंड पाने की तीन गुना ज़्यादा संभावना होती है।"मृत्युदंड के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान में अल्ट के कुछ पुराने साथी भी जुड़ चुके हैं। उन जैसों की बात का असर होता भी दिख रहा है।

अमेरिका के 28 राज्यों ने मृत्युदंड का विरोध किया है और मृत्युदंड देने की संख्या में आश्यर्चजनक रूप से कमी आई है। साल 2012 में 43 लोगों को मृत्युदंड दिया गया, जबकि 1990 के दशक में सैकड़ों लोगों को मौत की सज़ा दी गई थी।


डॉक्टर अल्ट अपने देश का हृदय परिवर्तन करने के लिए अपने अनुभवों का सहारा लेते हैं। वो कहते हैं, "सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति को अपना जीवन संदेह, शर्म और अपराधबोध में बिताने के लिए मजबूर करने का किसी को हक़ नहीं है।"

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