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वो 6 तरकीबें जिनसे दुनिया को मिलेगा भोजन

Thu, 25 Jul 2013 01:07 PM IST
Updated Thu, 25 Jul 2013 01:07 PM IST
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food for world research

भारत में सब के लिए भोजन की गारंटी के कानून पर बहस हो रही है लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी आबादी के लिए खाने का इंतजाम कहां से होगा।

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ये सवाल सिर्फ भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का है लेकिन कई नए और उभरते हुए शोध से इसका जवाब मिलने की उम्मीद नज़र आ रही है।

अनुमानों के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब तक पहुंच जाएगी। इतनी बड़ी आबादी के लिए ख़ाने का इंतज़ाम करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन कम से कम 60% बढ़ाना होगा।
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सबको मिलेगा भोजन?

फसल आनुवांशिकी के एसोसिएट प्रोफेसर शॉन मेज़ का कहना है कि ये मानने के कई कारण हैं कि पर्याप्त भोजन पैदा करना एक “अहम चुनौती” होगी।

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "ये सिर्फ अभी के उत्पादन को दोगुना करना नहीं है क्योंकि पर्याप्त ज़मीन नहीं है। इस का सिर्फ एक हल नहीं है और कभी नहीं हो सकता। जितने पहलू संभव हैं उनकी कोशिश करनी होगी।"
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वैज्ञानिकों का मानना है कि 6 आइडिया हैं जो मदद कर सकते हैं।

फसल उत्पादन

एक टीम ने हाल ही में एक ऐसे रसायन की खोज की है जो फसलों को ऊंचे तापमान से बचा सकेगा।

“क्विनबैक्टीन” नाम का ये रसायन पौधों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाले एक हॉरमोन की नकल करता है जिससे वो गर्मी का मुकाबला कर पाते हैं।

इस शोध की अगुवाई करने वाले अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शॉन कटलर का कहना है कि जब इस रसायन को पौधों पर छिड़का जाता है तो पौधों का मुर्झाना कम होता है, उनका कम पानी खर्च होता है और वो ज़्यादा मुश्किलें झेल पाते हैं।

भोजन की छपाई

तकनीकी कंपनियां रोज़मर्रा के इस्तेमाल में काम आने वाली चीज़ें छापने के ज़्यादा दक्ष तरीके तैयार कर रही हैं।

अब भोजन की छपाई करना वास्तविकता बनता जा रहा है। नासा छपे हुए भोजन के साथ प्रयोग कर रहा है जिससे सुदूर अंतरिक्ष के अभियानों पर भेजे जाने वालों अंतरिक्षयात्रियों को खाना खिलाया जा सकेगा।

मॉर्डन मिडो नाम की एक और कंपनी ने एलान किया है कि ये कृत्रिम मांस छाप सकती है और एक्सटर यूनिवर्सिटी की एक टीम ने तो छपी हुई चॉकलेट तैयार कर ली है।

शून्य से जीवन की शुरुआत

कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में कृत्रिम जीन को जोड़कर नए जीवन की शुरुआत करना शामिल है। ये अभी शुरुआती दौर में है लेकिन कुछ खोजों का असर बहुत दूर तक हो सकता है।

इसमें प्रकृति को इंजीनियरिंग की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जहां एक-एक कर कृत्रिम जीन को कम्प्यूटर पर कृत्रिम डीएनए से तैयार किया जाता है।

अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने हाल ही में खमीर का एक तंतु तैयार किया है, इस में जीव में विटामिन मिला दिए जाते हैं। और जब खमीर से ब्रेड तैयार की जाती है तो उसमें भरपूर विटामिन सी होता है।

वो अनाज जिन्हें भुला दिया गया

गेहूं, चावल और मक्का हमारे भोजन का 60% हिस्सा बनाते हैं। लेकिन मलेशिया में वैज्ञानिक ऐसे अनाजों पर ध्यान दे रहे हैं जिनमें सूखा सहने की शानदार क्षमता है और खराब मिट्टी में भी उगाए जा सकते हैं।

इन लक्षणों को व्यवसायिक फसलों में डालने पर ऐसी फसलें पैदा करने में मदद मिल सकती है जो बदलती जलवायु का ज़्यादा बेहतर ढंग से सामना कर सके।

जीन संवर्धित भोजन

संकर फसलों को उगाने के बजाय जीन संवर्धित फसलों में खाने का आनुवांशिक रंग रूप प्रयोगशाला में बदला जाता है। ब्रितानी सरकार ने हाल ही में एलान किया कि जीन संवर्धित फसलें पारंपरिक पौधों से ज्यादा सुरक्षित हो सकती हैं।


ज़्यादातर सुपरमार्केट जीन संवर्धित भोजन पर पाबंदी लगा चुके हैं लेकिन उन जानवरों का मांस बिकता है जिन्हें जीन संवर्धित फसलें खिलाई गई हैं। शॉन मेज़ का कहना है कि हम ये कहने की हालत में नहीं हैं कि जीन संवर्धित भोजन का इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जब खेती से जुड़ी किसी समस्या का हल पारंपरिक रूप से संभव न हो।

सिकुड़ता हुआ आदमी

“ग्रीनहाउस में पौधा खूब ऊंचा होता है लेकिन इसके बाहर जाने के बाद ये मुर्झा जाता है क्योंकि ये खुद को संभाल नहीं पाता।”

कलाकार और द इनक्रेडिबल श्रिंकिंग मैन की शुरुआत करने वाले आर्न हेंड्रिक्स ने ये तुलना की है। हेंड्रिक्स का कहना है कि उचित पर्यावरणीय परिस्थितियों में मानव सिकुड़ सकता है या लंबे अरसे में छोटा हो सकता है। यानी बदलते पर्यावरण के साथ ख़ुद को ढाल सकता है।

मिलेसा होगनबूम/साइंस रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़

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