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जापान : 200 साल में सिंहासन छोड़ने वाले पहले सम्राट बने अकिहितो, नए युवराज बने नारुहितो
Wed, 01 May 2019 05:33 AM IST
Avdhesh Kumar
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस, टोक्यो
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस, टोक्यो
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Wed, 01 May 2019 05:33 AM IST
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akihito
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जापान के सम्राट अकिहितो ने मंगलवार को अपना सिंहासन छोड़ दिया है। जापान के शाही घराने के पिछले 200 साल के इतिहास में पद छोड़ने वाले वह पहले राजा हैं। 85 वर्षीय अकिहितो का जन्म ईश्वर के एक पुत्र के रूप में हुआ लेकिन वे लोगों के दिलों में सम्राट के रूप में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। वे सुनहरे भूरे रंग के पारंपरिक लिबास व काले रंग की परंपरागत जापानी टोपी पहले प्रार्थना स्थल पर पहुंचे और उनके सिंहासन छोड़ने की प्रक्रिया शाही महल में पारंपरिक रीति रिवाजों के साथ शुरू हुई।
अकिहितो अपना ‘क्राइसैंथिमम थ्रोन’ अपने सबसे बड़े बेटे युवराज नारुहितो (59) को सौंप रहे हैं। नारुहितो बुधवार को एक अलग समारोह में सम्राट का पद ग्रहण करेंगे। इसके साथ ही ‘रेइवा’ नामक नए राजशाही युग की शुरुआत होगी। यह युग नारुहितो के पूरे शासनकाल तक जारी रहेगा। बुधवार को युवराज नारुहितो को राजपरिवार की तलवार, मूल्यवान आभूषण और राजपरिवार की मुहरें सौंपी जाएंगी। तकनीकी तौर पर अकिहितो मंगलवार की रात 12 बजे तक सम्राट बने रहे।
कानून बनाकर राजगद्दी छोड़ने की इजाजत मिली
साल 2016 में सम्राट अकिहितो ने देश के नाम एक खास संबोधन में कहा था कि उन्हें इस बात का डर है कि उनकी बढ़ती उम्र के कारण वे एक राजा के कर्तव्य ठीक तरह से नहीं निभा पाएंगे। उसी समय उन्होंने इस बात के संकेत दिए थे कि वह राजगद्दी छोड़ना चाहते हैं। उनके गद्दी छोड़ने के लिए बाकायदा कानून बनाकर उन्हें इसकी इजाजत दी गई। हाल ही के वर्षों मं उन्होंने हार्ट सर्जरी व प्रोस्टेट कैंसर पर काबू पाया।
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शाही परंपरा तोड़ने वाले सम्राट रहे अकिहितो
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर अकिहितो सिर्फ 13 साल के थे जिसमें जापान की हार हुई। लेकिन अपने समकालीन दिग्गजों से अलग उन्होंने कभी इसके लिए अफसोस नहीं जताया। 1992 में उन्होंने चीन का दौरा किया और यह किसी जापानी शासक का पहला चीन दौरा था। यही नहीं, जापानी राजघराने की 1500 साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने राजघराने की नहीं बल्कि एक साधारण महिला से विवाह किया।
आखिरी संबोधन में राजगद्दी छोड़ने वाले सम्राट ने अपने कर्तव्यों के पालन में खुद को भाग्यशाली माना
सम्राट अकिहितो ने अपने आखिरी भाषण में जापानी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, मैं ईमानदारी से उन लोगों को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने राज्य के प्रतीक के रूप में मेरी भूमिका को स्वीकारा और समर्थन दिया। आज मैं सम्राट के रूप में अपने कर्तव्यों का समापन कर रहा हूं। मैंने लोगों के प्रति विश्वास और सम्मान की भावना के साथ सम्राट के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन किया और मैं खुद को सबसे भाग्यशाली मानता हूं कि ऐसा करने में मैं सक्षम रहा। मैं दिल से जापान और दुनिया भर के लोगों के लिए शांति व खुशी के लिए प्रार्थना करता हूं।
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अकिहितो अपना ‘क्राइसैंथिमम थ्रोन’ अपने सबसे बड़े बेटे युवराज नारुहितो (59) को सौंप रहे हैं। नारुहितो बुधवार को एक अलग समारोह में सम्राट का पद ग्रहण करेंगे। इसके साथ ही ‘रेइवा’ नामक नए राजशाही युग की शुरुआत होगी। यह युग नारुहितो के पूरे शासनकाल तक जारी रहेगा। बुधवार को युवराज नारुहितो को राजपरिवार की तलवार, मूल्यवान आभूषण और राजपरिवार की मुहरें सौंपी जाएंगी। तकनीकी तौर पर अकिहितो मंगलवार की रात 12 बजे तक सम्राट बने रहे।
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कानून बनाकर राजगद्दी छोड़ने की इजाजत मिली
साल 2016 में सम्राट अकिहितो ने देश के नाम एक खास संबोधन में कहा था कि उन्हें इस बात का डर है कि उनकी बढ़ती उम्र के कारण वे एक राजा के कर्तव्य ठीक तरह से नहीं निभा पाएंगे। उसी समय उन्होंने इस बात के संकेत दिए थे कि वह राजगद्दी छोड़ना चाहते हैं। उनके गद्दी छोड़ने के लिए बाकायदा कानून बनाकर उन्हें इसकी इजाजत दी गई। हाल ही के वर्षों मं उन्होंने हार्ट सर्जरी व प्रोस्टेट कैंसर पर काबू पाया।
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शाही परंपरा तोड़ने वाले सम्राट रहे अकिहितो
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर अकिहितो सिर्फ 13 साल के थे जिसमें जापान की हार हुई। लेकिन अपने समकालीन दिग्गजों से अलग उन्होंने कभी इसके लिए अफसोस नहीं जताया। 1992 में उन्होंने चीन का दौरा किया और यह किसी जापानी शासक का पहला चीन दौरा था। यही नहीं, जापानी राजघराने की 1500 साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने राजघराने की नहीं बल्कि एक साधारण महिला से विवाह किया।
आखिरी संबोधन में राजगद्दी छोड़ने वाले सम्राट ने अपने कर्तव्यों के पालन में खुद को भाग्यशाली माना
सम्राट अकिहितो ने अपने आखिरी भाषण में जापानी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, मैं ईमानदारी से उन लोगों को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने राज्य के प्रतीक के रूप में मेरी भूमिका को स्वीकारा और समर्थन दिया। आज मैं सम्राट के रूप में अपने कर्तव्यों का समापन कर रहा हूं। मैंने लोगों के प्रति विश्वास और सम्मान की भावना के साथ सम्राट के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन किया और मैं खुद को सबसे भाग्यशाली मानता हूं कि ऐसा करने में मैं सक्षम रहा। मैं दिल से जापान और दुनिया भर के लोगों के लिए शांति व खुशी के लिए प्रार्थना करता हूं।