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रूस पर प्रतिबंधों के बाद चर्चा: क्या बिना डॉलर का उपयोग किए चल सकता है काम?

Mon, 07 Mar 2022 05:59 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांग कांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांग कांग Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 07 Mar 2022 05:59 PM IST
सार

अब ज्यादातर जानकारों की निगाह चीन पर हैं। एक संभावना यह जताई गई है कि रूस के साथ मिल कर चीन द्विपक्षीय व्यापार में भुगतान का नया सिस्टम बनाएगा। इसमें बिना डॉलर का सहारा लिए आपसी मुद्राओं में लेन-देन की जाएगी। भारत पहले इस दिशा में सफल प्रयोग कर चुका है। जब ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत ने रुपये में भुगतान कर ईरान से तेल खरीदा था...

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According to experts, after strict economic sanctions, Russia condition has now become like North Korea
रूसी करेंसी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर अब तक के सबसे सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वजह से उसका पश्चिमी देशों के साथ वित्तीय संबंध लगभग पूरी तरह टूट गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस मामले में रूस की हालत अब उत्तर कोरिया जैसी हो गई है। इससे रूसी कंपनियों के डिफॉल्ट करने (तय समय पर कर्जा ना चुका पाने) की आशंका बेहद गहरी हो गई है। लेकिन पश्चिमी देशों के जिस फैसले ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है, वह रूस के सेंट्रल बैंक पर लगाए गए प्रतिबंध हैं। बैंक ऑफ रसा के जमा धन को अमेरिका ने जब्त कर लेने का फैसला किया है।

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लेकिन अमेरिका के इस कदम ने डॉलर में अपना धन रखने की दशकों से जारी चलन पर बहस खड़ी कर दी है। खास कर इस मामले में चीन के रुख पर विशेषज्ञों की नजर है, जिसके पास दो ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अमेरिकी मुद्रा है। विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि क्या अमेरिका के हालिया कदम को देखते हुए अब चीन और ऐसे बहुत से देश किसी अन्य विकल्प की तलाश करेंगे और क्या दुनिया में ऐसे विकल्प मौजूद हैं?   

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अमेरिका से टकराव महंगा

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने एक इंटरव्यू में कहा है कि विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन धन की सुरक्षा, नकदी की उपलब्धता, और भंडार में मौजूद धन पर मिलने वाले ब्याज से प्रेरित होता है। अभी डॉलर, यूरो और येन जैसी मुद्राएं इन कसौटियों पर खरी उतरती हैं। उन्होंने कहा कि रूस पर हुई कार्रवाई से विभिन्न देशों की सरकारें ये सबक लेंगी कि अमेरिकी प्रतिबंधों का खराब असर होता है, यानी अमेरिका से टकराव लेना महंगा पड़ता है।

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इस बीच कुछ दूसरे विशेषज्ञ अब सलाह दे रहे हैं कि सेंट्रल बैंकों को अब डॉलर में निवेश के बजाय अपना धन कच्चे तेल और सोने जैसी चीजों में लगाना चाहिए। लेकिन एक राय यह है कि सेंट्रल बैंक के अधिकारियों के पास ऐसे व्यापारिक निवेश का कौशल नहीं है। वे सिर्फ वित्तीय प्रबंधन के जानकार होते हैं। इसलिए फिलहाल बहुत से देश डॉलर से पैसा निकाल कर किसी अन्य वस्तु में लगाएंगे, इसकी संभावना कम है।

चीन दे सकता है युवान को बढ़ावा

इस सिलसिले में अब ज्यादातर जानकारों की निगाह चीन पर हैं। एक संभावना यह जताई गई है कि रूस के साथ मिल कर चीन द्विपक्षीय व्यापार में भुगतान का नया सिस्टम बनाएगा। इसमें बिना डॉलर का सहारा लिए आपसी मुद्राओं में लेन-देन की जाएगी। भारत पहले इस दिशा में सफल प्रयोग कर चुका है। जब ईरान पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत ने रुपये में भुगतान कर ईरान से तेल खरीदा था। अब संभावना जताई जा रही है कि चीन संभवतया अपनी मुद्रा युवान को अंतरराष्ट्रीय लेन-देन की मुद्रा के रूप में विकसित करने की कोशिश करेगा।



डॉ. सुब्बाराव ने भी टीवी चैनल सीएनबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘भुगतान की इकाई या साधन के रूप में नए विकल्प सामने आ सकते हैं।’ हालांकि उन्होंने कहा कि जहां तक भंडारण मूल्य (स्टोर वैल्यू) की बात है, तो अभी डॉलर का कोई मुकाबला नहीं है। लेकिन अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी डिजिटल मुद्रा के व्यापक रूप से प्रचलन में आने के बाद डॉलर का बिना सहारा लिए भुगतान का एक कारगर विकल्प दुनिया को मिल सकता है।

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