स्मार्टफोन पर इंटरनेट चलाने से हर दिन गर्म हो रही है धरती, 10 साल में 3.5% तापमान में हुआ इजाफा

प्रदीप पांडे
प्रदीप पाण्डेय, अमर उजाला, नोएडाप्रदीप पांडे
Sat, 27 Jul 2019 05:55 PM IST
Your smartphone is also responsible for climate change, data center makes earth warm
स्मार्टफोन के कारण गर्म हो रही है धरती - फोटो : amar ujala/रोहित झा

    जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है, तो वाहनों और फैक्ट्रियों को दोषी ठहराया जाता है। कई बार एयर कंडीशनर (एसी) के बढ़ते इस्तेमाल को भी धरती के बढ़ते तापमान के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस स्मार्टफोन के बिना आप एक पल भी नहीं रह सकते, वही स्मार्टफोन ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी जिम्मेदार है। आइए आज जानते हैं कि आखिर स्मार्टफोन कैसे ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार है।

    इंटरनेट डाटा की सुनामी

    Internet speed
    Internet speed - फोटो : Flickr

    दरअसल, इंटरनेट से चलने वाली डिवाइसेज जैसे लैपटॉप, मोबाइल और टैबलेट जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। क्लाइमेट होम न्यूज के साल 2016 में किए गए सर्वे के मुताबिक पूरी दुनिया में पिछले 10 सालों में रोज इस्तेमाल हो रही अरबों डिवाइसेज के कारण धरती के तापमान में 3.5 फीसदी की वृद्धि हुई है, जो साल 2040 तक 14 फीसदी तक पहुंच जाएगी।

    साल 2025 तक पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने वाली बिजली का 20 फीसदी हिस्सा इंटरनेट और मोबाइल डिवाइसेज में खर्च होगा और इसका सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन पर पड़ेगा। अब बड़ा सवाल यह है कि इतनी बिजली खर्च कहां होगी। तो आपको बता दें कि इंटरनेट का इस्तेमाल जितना अधिक होगा, उतने ही डाटा सेंटर खुलेंगे और इन डाटा सेंटर को चालू रखने के लिए बिजली की खपत होगी। एक रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्टफोन के कारण उर्जा का उत्सर्जन 2020 तक 11 फीसदी तक बढ़ जाएगा, जो 2010 तक चार फीसदी था और यह सभी निजी कंप्यूटर, मोबाइल और टैबलेट के चलते हो रहा है। स्मार्टफोन के कारण 2020 तक कार्बन डाइऑक्साइड में 125 मेगाटन तक की बढ़ोतरी होगी।

    इस मसले पर काम कर रहे स्वीडिश शोधकर्ता एंडर्स एंड्रे का मानना है कि पूरी दुनिया में इंटरनेट यूजर्स की बढ़ती संख्या के साथ ही बिजली की खपत भी काफी तेजी से बढ़ेगी। एंडर्स एंड्रे के अनुमान के मुताबिक, 2025 तक इस क्षेत्र में बिजली की खपत प्रति वर्ष 200-300 टेरा वाट प्रति घंटे (TWh) से बढ़कर 3,000 टेरा वाट प्रति घंटा तक पहुंच जाएगी। एंडर्स ने इसे डाटा सुनामी कहा है और साथ ही यह भी कहा है कि साल 2025 तक हालात और भी भयावह होने वाले हैं।

    एंडर्स के मुताबिक 5G नेटवर्क का इस्तेमाल जल्द ही कई देशों में शुरू होने वाला है। इसके अलावा अब इंटरनेट से कनेक्टेड कारें भी आ रही हैं। साथ ही रोबोट भी इंटरनेट के जरिए काम कर रहे हैं। जिसके चलते अधिक संख्या में डाटा सेंटर भी खुलेंगे, क्योंकि इन सभी डिवाइसेज से मिलने वाले डाटा को स्टोर करने की जरूरी पड़ेगी।

    रिसर्च के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं, बल्कि इनका प्रोडक्शन जिम्मेदार है और इसमें इनका योगदान 85 से 95 फीसदी तक है, क्योंकि फोन के उत्पादन में ऊर्जा की खपत के अलावा इन डिवाइसेज में सोने के साथ अन्य दुर्लभ धातुओं जैसे येट्रियम, लैंथेनियम की माइनिंग भी हो रही है। बता दें कि ये तत्व केवल चीन में ही उपलब्ध हैं। स्मार्टफोन के भारी प्रोडक्शन के लिए कंपनियां भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि हर कुछ महीनों के अंतराल पर मोबाइल कंपनियां नए फीचर्स के साथ नया स्मार्टफोन पेश कर रही हैं। ऐसे में लोग पुराना स्मार्टफोन बेचकर नया खरीद रहे हैं।

    24X7 घंटे काम करने वाले इन डाटा सेंटर्स में बहुत ज्यादा बिजली की खपत हो रही है, क्योंकि पूरी दुनिया में लोग हर सेकेंड या तो मैसेज भेज रहे हैं या फिर कोई फाइल डाउनलोड कर रहे हैं। इसके कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा जहां साल 2007 में 215 मेगाटन थी, जिसके 2020 तक बढ़ कर 764 मेगाटन पहुंचने की संभावना है और इसमें डाटा सेंटर्स का योगदान दो तिहाई होगा।

    तो कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हर पल और हर घंटे हम तकनीक के इस्तेमाल से ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि कर रहे हैं और सोचने वाली बात यह है कि स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या पूरी दुनिया में हर रोज बढ़ रही है। अकेले भारत में ही 2022 तक स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या 86 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।

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