Social Media: 10 दोस्तों की खुदकुशी ने झकझोर कर रख दिया, अब सोशल मीडिया की लत छुड़ा रही है यह 24 साल की लड़की
No Social Media Campaign:
आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी हथेली से चिपका रहता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह वर्चुअल दुनिया हमारी असल जिंदगी पर कितना भारी पड़ रही है? अमेरिका के कोलोराडो की रहने वाली 24 साल की मैडी फ्रीमैन की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है।

विस्तार
सोशल मीडिया लोगों की जिंदगी को कैसे प्रभावित कर रहा है, अब इसकी चर्चा खुल कर होने लगी है। टीनएजर्स पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों को देखते हुए हाल ही में अस्ट्रेलियाई सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, टिकटॉक जैसे तमाम छोटे-बड़े प्लेटफॉर्म्स पर रोक लगा दी है। यूं तो सोशल मीडिया हर उम्र के लोगों के जीवन पर असर डाल रहा है, लेकिन 18 साल से कम उम्र के बच्चों पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा है। आज हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी बताएंगे, जिसने अपने 10 दोस्तों को खोने के बाद, सोशल मीडिया से टीनएजर्स को दूर करने के लिए एक मुहिम खड़ी कर दी।
अमेरिका के कोलोराडो स्टेट के लिटलटन शहर की रहने वाली मैडी फ्रीमैन (Maddie Freeman) आज 24 साल की हैं। उन्हें महज 12 साल की उम्र में पहला स्मार्टफोन मिल गया था। हाई स्कूल आते-आते उनकी हालत यह थी कि वह दिन के करीब 10 घंटे सोशल मीडिया पर बिताती थीं। लेकिन इसी दौरान उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने 10 दोस्तों को खुदकुशी करते देखा। साल 2020 में तो उन्होंने महज एक साल में 5 दोस्तों को खो दिया। इस व्यक्तिगत नुकसान ने मैडी को अंदर तक हिला दिया। वह समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर उनकी पीढ़ी इतनी उदास और अलग-थलग क्यों है?
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एक फिल्म ने बदल दी सोच
साल 2020 में मैडी ने नेटफ्लिक्स पर 'द सोशल डिलेमा' (The Social Dilemma) डॉक्यूमेंट्री देखी, जिसने उनकी आंखें खोल दीं। उन्हें समझ आया कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम और बिजनेस मॉडल युवाओं को अकेला और परेशान बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। महामारी के दौरान बढ़े अकेलेपन और मानसिक तनाव में इसकी भूमिका और भी साफ नजर आई। प्यू रिसर्च सेंटर की 2025 की एक रिपोर्ट भी इसी खतरे की पुष्टि करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, 45% किशोरों की नींद, 40% की प्रोडक्टिविटी और 19% की मानसिक सेहत पर सोशल मीडिया का सीधा बुरा असर पड़ रहा है। मैडी को अहसास हुआ कि उनकी पूरी पीढ़ी इस डिजिटल जाल का शिकार हो रही है और यही उनकी मानसिक समस्याओं की मुख्य जड़ है।
मैडी ने ऐसे की सोशल मीडिया के खिलाफ बदलाव की शुरुआत
मैडी ने एक साधारण सी अर्जी (पिटीशन) से शुरुआत की, जो देखते ही देखते वायरल हो गई। इसके बाद उन्होंने स्कूलों में जाकर प्रजेंटेशन देनी शुरू की और छात्रों को एक चुनौती दी कि उन्हें पूरे नवंबर महीने सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनानी है। इसे उन्होंने 'नो सो नवंबर' (No Social Media November) नाम दिया। शुरुआत में सिर्फ 30 छात्र उनके साथ जुड़े, लेकिन इसके नतीजे चमत्कारिक थे। छात्रों ने ईमेल भेजकर बताया कि सोशल मीडिया छोड़ते ही उनके शरीर को लेकर हीन भावना (Body Dysmorphia) खत्म हो गई। खुद मैडी ने भी मोबाइल छोड़कर किताबें पढ़ना और टहलना शुरू किया, जिससे उनकी एंग्जायटी काफी कम हो गई।
'फोर्ब्स 30 अंडर 30' में मिली जगह
आज मैडी 'NoSo' नाम का एक गैर-लाभकारी संगठन चला रही हैं। उनकी संस्था स्कूलों में वर्कशॉप करती है और युवाओं को तकनीक के जाल से बाहर निकालने के लिए मेडिटेशन और माइंडफुलनेस जैसे विकल्प देती है। उन्हें उनके शानदार काम के लिए साल 2025 में 'फोर्ब्स 30 अंडर 30' की सूची में शामिल किया गया था। उनकी यह मुहिम अब सिर्फ एक चैलेंज नहीं, बल्कि एक जीवन रक्षक अभियान बन गई है। मैडी आज भी उन बच्चों से मिलती हैं जो बताते हैं कि इस प्रोग्राम की वजह से उन्होंने अपनी जान न लेने का फैसला किया। मैडी का लक्ष्य है कि 'नो सो नवंबर' भी स्वास्थ्य के अन्य बड़े ट्रेंड्स की तरह दुनिया भर में मशहूर हो जाए, ताकि कोई भी युवा सोशल मीडिया का शिकार न बने।
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