ओलंपिक में ध्यानचंद से ज्यादा गोल किसने किए
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ध्यान चंद के छोटे भाई रूप सिंह हॉकी के जादूगर तो नहीं कहलाते थे लेकिन हॉकी कौशल में उनका भी कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ध्यान चंद के साथ लॉस एंजिल्स और बर्लिन में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था। बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने जमाने में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेफ्ट इन रूप सिंह ने ओलंपिक खेलों में ध्यान चंद से ज्यादा गोल किए हैं। गजब का स्टिक वर्क था उनका। उनके शार्ट इतने तेज होते थे कि कई बार डर होता था कि उससे कोई घायल न हो जाए।
रूप ने ही 1936 के बर्लिन ओलंपिक के फाइनल में जर्मनी के खिलाफ पहला गोल किया था। इस मैच को भारत ने 8-1 से जीता था। रूप सिंह के भतीजे और ध्यान चंद के बेटे अशोक कुमार 1975 में विश्व विजेता हाकी टीम के सदस्य थे। वो बताते हैं,'रूप सिंह बहुत स्टाइलिश थे। लंबे-चौड़े खूबसूरत शरीर के मालिक। लॉस एंजिल्स ओलंपिक टीम में चुने जाने पर उन्होंने वहाँ जाने से इंकार कर दिया क्योंकि उनके पास कपड़े नहीं थे।
मेरे बाबूजी ने उन्हें अपने पैसों से कपड़े खरीद कर दिए। उनका एक सूट सिलवाया तब जाकर वो अमरीका जाने के लिए तैयार हुए। वो अपने जमाने के चोटी के गोल स्कोरर थे। उनके हिट गोली की तरह गोल में जाते थे। कई मर्तबा बाबूजी ने उन्हें यह कहते हुए मैच से बाहर भी किया कि तुम मैच खेलने आए हो या खिलाड़ी को घायल करने।'
अशोक कुमार बताते हैं,'वो पेनल्टी कार्नर भी बेहतरीन ढंग से लेते थे। 1932 के ओलंपिक में सबसे ज्यादा गोल रूप सिंह के रहे, ध्यान चंद के नहीं। इन दोनों का कांबिनेशन और आपसी समझ इतनी ख़ूबसूरत थी कि किस जगह गेंद लेनी है या देनी है, उन्हें पहले से पता होता था। लॉस एंजिल्स का ओलंपिक रूप सिंह का था, जहाँ उन्होंने अपने कला कौशल से स्वर्ण पदक जीत कर अमरीका ही नहीं, पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था।'
मैंने हॉकी के सारे गुर अपने पिता ध्यान चंद से नहीं बल्कि अपने चाचा रूप सिंह से सीखे थे
अशोक बताते हैं,'1936 में बर्लिन ओलंपिक के फाइनल में भारत ने पहले हाफ तक जर्मनी पर एक गोल किया था, वो भी रूप सिंह की स्टिक से आया था। गोल के बाद जर्मन टीम भारत पर हमले पर हमले कर रही थी। इस बीच इंटरवल हो गया। इस दौरान दोनों भाइयों में विचार-विमर्श हुआ। ध्यान चंद ने कहा, रूप क्या करें सिर्फ एक ही गोल हुआ है। अगर हम बढ़त नहीं बनाते हैं तो जर्मन गोल बराबर कर लेंगे और हमारी टीम हार सकती है।
दोनों ने तय किया कि वो अब नंगे पैर खेलेंगे। इंटरवल के बाद दोनों भाइयों ने अपने जूते उतार दिए। इसके बाद उनके पैरों में ग्रिप आनी शुरू हो गई। यह मैच भारत ने 8-1 से जीता था। बाबूजी ने बताया कि हिटलर मैच के बीच में ही उठ कर चला गया था। अपनी टीम को हारता हुआ नहीं देख सका वो।'
हॉकी के पूर्व ओलंपियन और जाने-माने अंपायर ज्ञान सिंह कहा करते थे कि उन्होंने रूप सिंह के अलावा और किसी को लेफ्ट इन पर खेलते हुए लेफ्ट आउट के पास पर गोल करते हुए नहीं देखा। 1932 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में उन्होंने अमरीका के खिलाफ 12 गोल किए थे।
अशोक कुमार बताते हैं,'मैंने हॉकी के सारे गुर अपने पिता ध्यान चंद से नहीं बल्कि अपने चाचा रूप सिंह से सीखे थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था जो मुझे आज तक याद है कि खिलाड़ी वो है जो मैच में मार न खाए यानी वो घायल न हो, क्योंकि अगर आप अच्छे खिलाड़ी हैं और आपको चोट लग जाए तो इसका टीम पर असर पड़ता है।
उन्होंने इसका तोड़ ये बताया कि अगर आपको लगे कि विरोधी खिलाड़ी आपको चोट पहुंचाने आ रहा है तो उसके इतने नज़दीक चले जाओ कि उसे हाकी चलाने का मौका ही न मिले। मैंने इस सीख पर अमल किया। इसकी वजह से मुझे अपने करिअर में कभी चोट नहीं लगी।'
हिटलर खेल के मैदान पर
अशोक बताते हैं, 'वो मुझे ये भी हिदायत देते थे कि मैं गेंद को ज्यादा अपने पास न रख कर उसे डिस्ट्रीब्यूट करूँ। अपने साथी खिलाड़ी को इस तरह पास दो कि वो गोल कर सके। वो मुझसे बार-बार यही कहते थे कि आप या तो गोल करें या करवाएं।'
रूप सिंह की एक खासियत और थी कि वो अंपायर के किसी फैसले पर बहस नहीं करते थे। 1936 में उनके शानदार प्रदर्शन के बाद बर्लिन की एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया। लंदन में 2012 में हुए ओलंपिक में भी ध्यान चंद और लेस्ली क्लाडियस के साथ-साथ रूप सिंह के नाम पर एक मेट्रो स्टोशन का नाम रखा गया। रूप सिंह बहुत ही मृदुभाषी थे। उनका छोटा सा परिवार था, जो ग्वालियर में उनके साथ रहता था।
अशोक कुमार बताते हैं, ''जब कभी वो ग्वालियर आते थे तो ध्यान चंद, रूप सिंह और हमारे ताऊ मूल सिंह एक साथ बैठते थे। जब शाम होती थी तो बाबूजी चुपके से उनका छोटा सा ड्रिंक का गिलास बनाते थे। वो कभी खुद या कभी किसी बड़े लड़के से कहते थे जाओ इसे रूप को देकर आओ। उनका भाइयों के प्रति प्यार होता जरूर था। लेकिन ये नहीं कि गले लगा लिया या हँसी मजाक कर लिया। वो अक्सर पूछते थे रूप को खाना मिला या नहीं। मैंने इन दोनों भाइयों के बीच जो प्यार देखा है, वो मुझे कहीं और नहीं नजर आया।'