जोरामथंगा: राजनीति के खिलाड़ी पर बैडमिंटन के शौकीन

sachin yadavसचिन यादव Updated Sun, 24 Nov 2013 02:58 PM IST
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केवल मिज़ोरम की इकलौता ऐसा राज्य है जहाँ कोई बागी संगठन केंद्र के साथ शांति समझौते पर दस्तखत करके सक्रिय राजनीति के रास्ते से होता हुआ सत्ता में आया और 1986 से ही इस राज्य में अमन बरकरार है। 60 के दशक में सशस्त्र संघर्ष शुरू करने वाला संगठन मिज़ो नेशनल फ्रंट अब मिज़ोरम की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी है।
पहले पु लालडेंगा के हाथों में इसकी कमान थी और अब पु ज़ोरमथंगा इस संगठन के मुखिया हैं। म्यांमार के घने जंगलों के गुरिल्ला अड्डों से मुख्यमंत्री के पद तक का ज़ोरमथंगा का सफर और मिज़ो राज्य की कहानी कम दिलचस्प नहीं है।
दारफुंगा और वान्हनुअइछिंगी के घर में जन्मे ज़ोरमथंगा आठ भाई-बहनों में नीचे से दूसरे नंबर पर है। उनका जन्म म्यांमार सीमा के पास मिज़ोरम के चंफई जिले के सामथांग गाँव में 13 जुलाई 1944 को हुआ था। उनके पाँच भाई और तीन बहन हैं।

1960 में चंफई में ही स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद ज़ोरमथंगा ग्रेजुएशन के लिए इम्फाल के डीएम कॉलेज आ गए। युवा ज़ोरमथंगा शिक्षक बनना चाहते थे लेकिन मिज़ोरम की मुश्किल भरी सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियाँ उन्हें अपने राज्य वापस ले आईं। वे लालडेंगा की अगुवाई वाली मिज़ोरम नैशनल फ्रंट में शामिल हो गए।

राजनीति में शुरुआत
"केवल मिज़ोरम की इकलौता ऐसा राज्य है जहाँ कोई बागी संगठन केंद्र के साथ शांति समझौते पर दस्तखत करके सक्रिय राजनीति के रास्ते से होता हुआ सत्ता में आया और 1986 से ही इस राज्य में अमन बरकरार है। 60 के दशक में सशस्त्र संघर्ष शुरू करने वाला संगठन मिज़ो नेशनल फ्रंट अब मिज़ोरम की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी है। "

एमएनएफ एक प्रतिबंधित संगठन था और गुप्त तरीके से एक अलग देश के लिए सक्रिय था। इन्हीं हालात में 1966 में पास हआ एक ग्रेजुएट बागी बन गया था। ज़ोरमथंगा को रन बंग इलाके के सचिव के पद की पेशकश की गई और उन्होंने तीन साल तक ये जिम्मेदारी संभाली।

1969 में एमएनएफ के सारे कैडर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) चले गए। बाद में लालडेंगा ने ज़ोरमथंगा को अपना सचिव बना लिया जिस पद पर वे सात साल तक बने रहे। 1979 में वे एमएनएफ के उपाध्यक्ष बन गए। विद्रोह के दौरान सेना ने ज़ोरमथंगा को गिरफ्तार कर लिया।

उन्हें असम राइफल्स के क्वॉर्टर गार्ड में रखा। इसकी वजह ये थी कि वे असम राइफल्स को आईज़ॉल शहर से बाहर ले जाने के लिए सक्रिय रूप से दबाव बना रहे थे। 1990 में हुई लालडेंगा की मृत्यु तक ज़ोरमथंगा उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे।

सशस्त्र संघर्ष के दिनों में और उसके बाद के वक्त में भी ज़ोरमथंगा ने लालडेंगा के दूत की हैसियत से कई दक्षिण एशियाई देशों की यात्रा की। 25 साल के संघर्ष के बाद एमएनएफ ने 30 जून 1986 को ऐतिहासिक मिज़ो शांति समझौते पर दस्तखत किया और 1987 में मिज़ोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया।

इसी ऐतिहासिक मिज़ो समझौते के बाद राज्य की राजनीति में ज़ोरमथंगा का पदार्पण हुआ। 1987 के पहले मिज़ोरम विधानसभा चुनाव में जोरमथंगा अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र चंफई से पहली बार विधायक बने। बागी से मुख्यमंत्री बने लालडेंगा के मंत्रिमंडल में उन्हें वित्त और शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई।

भ्रष्टाचार के आरोप
1990 में लालडेंगा के निधन के बाद ज़ोरमथंगा के हाथ में एमएनएफ की कमान आ गई। 2008 में कांग्रेस के एक नए उम्मीदवार टीटी ज़ोथनसांगा के हाथों चंफई सीट से हारने तक ज़ोरमथंगा यहीं से विधायक चुने जाते रहे थे।

ललथनहावला की अगुवाई वाली कांग्रेस से मुकाबले के लिए 1998 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ज़ोरमथंगा ने मिज़ोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस से गठजोड़ कर लिया। एमएनएफ और एमपीसी के सियासी गठजोड़ ने राज्य विधानसभा की 40 सीटों में से 33 जीत ली थीं।

इस जीत के बाद ज़ोरमथंगा ने एक गठबंधन सरकार की कमान सँभाली। हालांकि गठबंधन सरकार की ये कोशिश नाकाम रही और 2003 के विधानसभा चुनाव में एमएनएफ ने अकेले ही जनता के बीच गई। ज़ोरमथंगा पर मिज़ोरम के लोगों ने भरोसा बरकरार रखा और लगातार दूसरी बार उन्हें सत्ता मिली।

10 साल तक सत्ता में बने रहने के बाद 2008 के चुनाव में ज़ोरमथंगा को पुनर्जीवित हुई कांग्रेस ने सत्ता विरोधी लहर पर सवार होकर करारी शिकस्त दी। एमएनएफ 21 के आँकड़ें से सिमटकर राज्य विधानसभा की तीन सीटों तक रह गया। इन चुनावों में ज़ोरमथंगा अपनी पारंपरिक चंफई सीट भी गँवा बैठे थे।

विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में आई कांग्रेस ने 2006 में ज़ोरमथंगा के खिलाफ उनकी सरकार के दौरान आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति बनाने का मामला शुरू किया।

एफआईआर
"ऐतिहासिक मिज़ो समझौते के बाद राज्य की राजनीति में ज़ोरमथंगा का पदार्पण हुआ। 1987 के पहले मिज़ोरम विधानसभा चुनाव में जोरमथंगा अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र चंफई से पहली बार विधायक बने। बागी से मुख्यमंत्री बने लालडेंगा के मंत्रिमंडल में उन्हें वित्त और शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई।"

दिसंबर 2009 में मिज़ोरम के वरिष्ठ नागरिकों के एक संगठन ने ज़ोरमथंगा के खिलाफ प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत दिए जाने वाले हरेक ठेके पर तीन फीसदी की दर से कटौती करके पैसा एमएनएफ के पार्टी कोष में लेने के लिए एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज कराई।

जून 2007 में भ्रष्टाचार पर नज़र रखने वाली संस्था प्रिज़्म ने ज़ोरमथंगा की संपत्ति को लेकर राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के समक्ष एक और एफआईआर दर्ज कराई। प्रिज़्म ने बाद में गुवाहाटी हाई कोर्ट में भी इस मुद्दे पर एक जनहित याचिका भी दायर की।

ज़ोरमथंगा को इन आरोपों से बेदाग बरी होना अभी बाकी है और ये वो सवाल हैं जो मतदाताओं के मन में वोट देते वक्त रहेंगे। उनकी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता ज़ोरमथंगा पर निरंकुश तरीके से काम करने और धोखा देने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए।

22 अन्य लोगों के साथ कांग्रेस में हाल ही में शामिल हुए एमएनएफ के पूर्व सचिव सी लालज़ारज़ोवा कहते हैं, "मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के दौरान ज़ोरमथंगा को दिल्ली से पैसे मिला करते थे। ये रकम करोड़ों में होती थी जो कभी भी पार्टी के सदस्यों या आम लोगों तक नहीं पहुँच पाती थी।"

'आखिरी मौका'
22 अक्टूबर को ही ज़ोरमथंगा की पार्टी के तीन सचिवों ने अपनी वफादारी कांग्रेस के लिए बदल ली। उन्होंने एमएनएफ पर ‘मिज़ो राष्ट्रवाद’ के सिद्धांतों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले पाँच वर्षों के दौरान पार्टी की हालत बद से बदतर हो गई है।

1998 जैसी जीत की उम्मीद में इस बार एमएनएफ ने मिज़ोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और गारालैंड ऑटोनोमस बॉडी के साथ चुनाव पूर्व गठजोड़ किया जिसमें तीनों पार्टियाँ क्रमशः 31, आठ और एक सीट पर चुनाव लड़ेंगी।

एमएनएफ के 52वें स्थापना दिवस के मौके पर ज़ोरमथंगा ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, "1998 के विधानसभा चुनाव से पहले हमारे पास 14 विधायक थे। लोकसभा चुनावों में इनमें से पाँच पर हम पिछड़ गए थे और तीसरे स्थान पर रहे। लेकिन एमएनएफ और एमपीसी के गठजोड़ ने 33 सीटें जीतीं। ईश्वर हमें पर्याप्त संख्या विधायक देगा ताकि हम सरकार बना सकें।"

कुछ ही दिनों में 70 साल के होने जा रहे ज़ोरमथंगा हर सवेरे बैडमिंटन खेलते हैं लेकिन चुनावी मैदान में वापसी के लिए उनके पास ये आखिरी मौका हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या इस पूर्व बागी के लिए बिना चूके सही निशाना लगा पाना मुमकिन हो पाएगा।
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