हिमा दास: यूं ही नहीं बनीं भारतीय एथलीट इतिहास की 'स्वर्ण परी'
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2021 के इस खास मौके पर हम एक नजर डालते हैं 'ढिंग एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर भारत की अनुभवी स्टार फर्राटा धाविका हिमा दास की जिंदगानी के बारे में कि कैसे उन्होंने अर्श से फर्श तक का सफर तय किया। भारत की उड़न परी के नाम से मशहूर महिला एथलीट हिमा दास ने अपनी जिंदगी में कई अड़चनों को पार किया है, तब जाकर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। 21 साल की हिमा ने अपनी कड़ी मेहनत से एक-एक सपने को साकार किया।
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हमारे समाज में जितना योगदान पुरुषों का है उतना ही महिलाओं का भी योगदान है। मगर फिर भी उन्हें कई बार बराबरी का हक नहीं मिल पाता है। महिलाओं के अदृश्य संघर्ष को सलाम करने के लिए, उन्हें समान अधिकार और सम्मान दिलाने के उद्देश्य से हर साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। तो आइए इस खास मौके पर हम आपको बताते हैं 'ढिंग एक्सप्रेस' के नाम से मशहूर अनुभवी स्टार फर्राटा धाविका हिमा दास की जिंदगानी के बारे में। जानते हैं कि कैसे उन्होंने अर्श से फर्श तक का सफर तय किया। भारत की उड़न परी के नाम से मशहूर महिला एथलीट हिमा दास ने अपनी जिंदगी में कई अड़चनों को पार किया है तब जाकर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। 21 साल की हिमा ने अपनी कड़ी मेहनत से एक-एक सपने को साकार किया।
'मेरे जुनूं का नतीजा जरूर निकलेगा, इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा'
9 जनवरी 2000 को असम के एक छोटे से गांव कांधूलिमारी (नगांव जिला) में जन्मी हिमा को यूं ही नहीं भारतीय एथलेटिक्स इतिहास की स्वर्ण परी कहा जाता है। इसके लिए उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हीमा रणजीत दास (पूरा नाम) अपने स्कूल के दिनों में लड़कों के साथ फुटबॉल खेला करती थीं। वो अपना करियर फुटबॉल में देख रही थीं और भारत के लिए खेलने की उम्मीद संजोकर रखी थी। अजीज शायर अमीर कजलबाश के शब्दों में कहें तो, 'मेरे जुनूं का नतीजा जरूर निकलेगा, इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा'। कजलबाश की यह पंक्ति हिमा पर सटीक बैठती है। हिमा की कामयाबी में उनके कोच का बहुत बड़ा योगदान है। एथलेटिक्स में आने के बाद हिमा को घर- परिवार से दूर करीब 140 किलोमीटर दूर आकर बसना पड़ा। शुरुआत में उनके परिजन इसके लिए राजी नहीं थे, लेकिन कोच निपोन दास ने काफी जिद करके हिमा के परिजनों को मनाया।
वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप में किया था कमाल
हिमा दास ने जुलाई में फिनलैंड टेम्पेरे में आईएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में गोल्ड मेडल चुकी है। हिमा ने राटिना स्टेडियम में हुए फाइनल में 51.46 सेकेंड का समय निकाला कर इतिहास रचा था। वह महिला और पुरुष दोनों वर्गों में ट्रैक स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय हैं। डायमंड लीग में 49.08 सेकंड का समय निकालकर गोल्ड जीत चुकी हैं। वहीं, हिमा ने वर्ल्ड जूनियर एथलेटिक्स में 51.46 सेकंड के साथ गोल्ड जीता, जबकि गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 51.32 का समय निकाल छठा स्थान हासिल किया था। वहीं, 18वें एशियाई खेलों में हिमा के नामदो स्वर्ण और एक रजत पदक हैं। इसके अलावा 20 दिन में छह गोल्ड मेडल जीतने का रिकॉर्ड भी हिमा के नाम है।असम की इस एथलीट ने जकार्ता एशियन गेम्स में 400 मीटर में दो बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने में सफल रही। उन्होंने हीट में 51.00 सेकंड का समय निकालकर मनजीत कौर (51.05) का 14 साल पुराना रिकार्ड तोड़ा। फिर मुख्य दौड़ में 50.79 सेकंड के साथ अपने रिकॉर्ड में सुधार किया।
अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित
हिमा दास को 25 सतंबर 2018 को राष्ट्रपति द्वारा अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार हासिल करने के बाद हिमा ने कहा था, 'मेरा लक्ष्य अपने समय में लगातार सुधार करना है। मैं टाइमिंग के लिए दौड़ती हूं, पदक के लिए नहीं। अगर मेरी टाइमिंग बेहतर होगी तो पदक मुझे खुद ही मिल जाएगा। मैं खुद पर पदक का दबाव नहीं बनाती। इसलिए मेरा लक्ष्य पदक नहीं पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करना होता है।
हिमा का सपना हुआ साकार, बनीं डीएसपी
कहते हैं न सबसे ज्यादा खुशी इंसान को तब होती हैं, जब उसके सपने सच होते हैं। हिमा दास को 26 फरवरी 2021 को असम पुलिस में उप अधीक्षक (डीएसपी) बनाया गया। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने एक समारोह के दौरान हिमा को नियुक्ति पत्र सौंपा। इस मौके पर पुलिस महानिदेशक समेत शीर्ष पुलिस अधिकारी और प्रदेश सरकार के अधिकारी मौजूद थे। हिमा ने इसे बचपन का सपना सच होने जैसा बताया। इस दौरान उन्होंने कहा कि एथलेटिक्स करियर जारी रहेगा।
मुझे सब कुछ खेलों की वजह से मिला है- हिमा
हिमा ने कहा कि वह बचपन से पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखती आई हैं। उसने कहा, 'यहां लोगों को पता है। मैं कुछ अलग नहीं कहने जा रही। स्कूली दिनों से ही मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी और यह मेरी मां का भी सपना था।' उन्होंने कहा 'वह (हिमा की मां) दुर्गापूजा के दौरान मुझे खिलौने में बंदूक दिलाती थी। मां कहती थी कि मैं असम पुलिस की सेवा करूं और अच्छी इंसान बनूं।' एशियाई खेलों की रजत पदक विजेता और जूनियर विश्व चैम्पियन हिमा ने कहा कि वह पुलिस की नौकरी के साथ खेलों में अपना करियर भी जारी रखेगी। हिमा ने कहा, 'मुझे सब कुछ खेलों की वजह से मिला है। मैं प्रदेश में खेल की बेहतरी के लिए काम करूंगी और असम को हरियाणा की तरह सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य बनाने की कोशिश करूंगी। असम पुलिस के लिए काम करते हुए अपना कैरियर भी जारी रखूंगी।'

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