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तैराकी के पहले एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट सचिन नाग के सम्मान की लड़ाई लड़ रहा बेटा
Mon, 06 May 2019 09:23 PM IST
Sumit kumar
हेमंत रस्तोगी, स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
हेमंत रस्तोगी, स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
Published by: Sumit kumar
Updated Mon, 06 May 2019 09:23 PM IST
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arjun award
1951 के पहले एशियाई खेलों में सचिन नाग ने जब तैराकी में 100 मीटर फ्रीस्टाइल का स्वर्ण पदक जीता तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके गले में स्वर्ण हार डाला। एशियाई खेलों में किसी भारतीय तैराक को इसके बाद आज तक स्वर्ण पदक हासिल करने का गौरव हासिल नहीं हुआ।
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68 सालों बाद नाग के इस स्वर्ण पदक की चमक अतीत के गर्त में खो गई है। इस सोने की चमक से सरकार भले ही बेखबर हो गई हो, लेकिन उनके बेटे अशोक नाग ने अपने पिता के खोए सम्मान की लड़ाई को बदस्तूर जारी रखा है। नाग जब तक जीवित रहे उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। पिता की मृत्यु के बाद बेटा यह लड़ाई लड़ रहा है पर उन्हें सफलता नहीं मिली है। इस बार बेटे के साथ इस लड़ाई में अर्जुन अवार्डी पैरा स्वीमर प्रशांत कर्माकर भी शामिल हो गए हैं। उन्होंने खुद ध्यानचंद अवॉर्ड के लिए सचिन नाग का नाम खेल मंत्रालय को प्रस्तावित किया है।
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जब तक जीवित हूं पिता के सम्मान को संघर्ष करूंगा
सचिन नाग ने पहले दिल्ली एशियाई खेलों में 100 मीटर फ्रीस्टाइल का गोल्ड जीतने के अलावा दो कांस्य पदक भी जीते। इसके अलावा 1948, 1952 के ओलंपिक में वाटरपोलो टीम के सदस्य रहे। 48 के लंदन ओलंपिक में चिली के खिलाफ मिली एकमात्र 7-4 से जीत में नाग के चार गोल थे। सचिन नाग की 1987 में मृत्यु हो गई। अशोक नाग का कहना है कि अगले वर्ष उनके पिता की जन्म शती है। उन्हें सम्मानित करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता है।
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नाग का कहना है कि उन्हें किसी तरह का कोई पैसा नहीं चाहिए, लेकिन पिता ने जो देश के लिए किया उसका हक तो उन्हें मिलना ही चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने अब ध्यानचंद अवॉर्ड के लिए आवेदन किया है। इससे पहले वह पिता के लिए 2012 में अर्जुन अवॉर्ड के लिए आवेदन कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अवॉर्ड नहीं दिया गया।
2014 में डाइविंग में एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाले केपी ठाकर को ध्यानचंद अवार्ड दिया गया, लेकिन उनके पिता को भुलाकर रखा गया। अशोक नाग यह भी साफ कर देते हैं कि जब तक वह जीवित हैं तब तक पिता के सम्मान के लिए संघर्ष करते रहेंगे। एक न एक दिन तो उनके पिता के लिए सरकार की आंखें जरूर खुलेंगी।