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मनीषा भानवाला की कहानी: पिता को खोने का गम, आंखों में चैंपियन बनने का सपना; बेटी ने गोल्ड जीतकर रचा इतिहास

Sat, 31 Oct 2026 04:27 AM IST
मयंक त्रिपाठी स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, अस्ताना
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, अस्ताना Published by: मयंक त्रिपाठी Updated Sat, 31 Oct 2026 04:27 AM IST
सार

  • हरियाणा की 29 वर्षीय पहलवान मनीषा भानवाला ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में 59 किलोग्राम भारवर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। फाइनल में अमेरिका की अबीगैल नेट को 8-6 से हराकर वह विश्व चैंपियन बनने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बनीं।
  • इस जीत के पीछे उनके दिवंगत पिता सुरेश का सपना था, जिनका 2022 में निधन हो गया था। गोल्ड जीतने के बाद माता-पिता की तस्वीर वाली टी-शर्ट दिखाकर मनीषा ने अपनी ऐतिहासिक जीत पिता को समर्पित की।

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Manisha Bhanwalas Emotional Journey: Fathers Dream, Daughter's Golden Triumph
मनीषा भानवाला - फोटो : WFI

विस्तार

भारतीय महिला पहलवान मनीषा भांबरी ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर दिया। लेकिन उनकी यह जीत सिर्फ एक बड़ी खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने दिवंगत पिता के सपने को पूरा करने की भावुक कहानी भी है। गोल्ड मेडल जीतने के बाद मनीषा ने दर्शकों के सामने एक सफेद टी-शर्ट लहराई, जिस पर उनके माता-पिता की तस्वीरें छपी थीं। यह उनके पिता सुरेश को समर्पित एक बेटी की भावुक श्रद्धांजलि थी, जो अपनी बेटी को विश्व चैंपियन बनते देखना चाहते थे।
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मनीषा ने रचा इतिहास
29 वर्षीय मनीषा ने 59 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल में अमेरिका की अबीगैल एलिजाबेथ नेट को 8-6 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत के साथ वह विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गईं। इससे पहले भारत की ओर से सुशील कुमार ने 2010 में विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीता था।
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Manisha Bhanwalas Emotional Journey: Fathers Dream, Daughter's Golden Triumph
मनीषा भानवाला - फोटो : IIS
पिता के निधन ने तोड़ दिया था हौसला
  • हरियाणा के जींद की रहने वाली मनीषा का सफर आसान नहीं रहा। साल 2022 में उनके पिता सुरेश का निधन उस दिन हो गया था, जिस दिन उन्हें एशियाई चैंपियनशिप के लिए मंगोलिया रवाना होना था। पिता ने पिछली रात जागरण में हिस्सा लिया था और अगली सुबह दिल का दौरा पड़ने से नींद में ही उनका निधन हो गया।
  • पिता के बेहद करीब रहीं मनीषा इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। परिवार को खोने के दर्द में उन्होंने कुश्ती छोड़ने तक का मन बना लिया था। वह घर छोड़कर प्रतियोगिता में जाने के लिए तैयार नहीं थीं। मनीषा के भाई रिंकू ने पीटीआई को बताया कि परिवार ने उन्हें समझाया कि पिता ने उन्हें पहलवान बनाने के लिए जो मेहनत और त्याग किया है, उसे इस तरह अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता।
  • रिंकू के मुताबिक, परिवार ने किसी तरह मनीषा को मंगोलिया जाने के लिए राजी किया। मनीषा वहां पहुंचीं और एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर लौटीं। यही उनके लिए वापसी की शुरुआत साबित हुई।
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भाई को कबड्डी खेलते देखकर शुरू हुआ था खेल का सफर
मनीषा एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जहां खेल का माहौल पहले से मौजूद था। उनके भाई रिंकू कबड्डी खिलाड़ी हैं, जबकि उनकी भाभी ममता सिहाग भी पहलवान हैं। रिंकू के मुताबिक, मनीषा बचपन में उन्हें गांव में कबड्डी खेलते हुए देखती थीं। यहीं से उनके मन में खेल के प्रति रुचि पैदा हुई। बाद में परिवार ने तय किया कि मनीषा को टीम गेम के बजाय किसी व्यक्तिगत खेल में आगे बढ़ाया जाए। उनकी शारीरिक मजबूती और मानसिक दृढ़ता को देखते हुए कुश्ती चुनी गई।

Manisha Bhanwalas Emotional Journey: Fathers Dream, Daughter's Golden Triumph
मनीषा भानवाला (फाइल फोटो) - फोटो : United World Wrestling
माता-पिता की तस्वीर वाली टी-शर्ट लेकर गई थीं अस्ताना
विश्व चैंपियनशिप में उतरने से पहले मनीषा ने अपने माता-पिता की तस्वीरों वाली एक सफेद टी-शर्ट बनवाई थी। उनका इरादा साफ था कि गोल्ड जीतने के बाद वह इस टी-शर्ट को दुनिया के सामने दिखाएंगी। रिंकू ने बताया कि मनीषा ने अस्ताना रवाना होने से पहले ही यह टी-शर्ट तैयार करवा ली थी। उन्हें पूरा विश्वास था कि वह स्वर्ण पदक जीतेंगी और अपने माता-पिता की तस्वीर सबको दिखाएंगी। फाइनल में अमेरिका की पहलवान को हराने के बाद उन्होंने बिल्कुल ऐसा ही किया। रिंकू ने कहा, 'यह हमारे पूरे परिवार का सपना था कि मनीषा विश्व चैंपियन बने। आज उसने हमारा सपना पूरा कर दिया है। यह हमारे पिता के लिए और भी खास है। उनका सपना और पूरे परिवार का सपना आज सच हो गया।'

कई बार बदला भारवर्ग
मनीषा ने अपने कुश्ती करियर में कई चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने 62 किलोग्राम, 65 किलोग्राम और 57 किलोग्राम भारवर्ग में भी मुकाबले किए, लेकिन उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 59 किलोग्राम भारवर्ग में आई। यह गैर-ओलंपिक भारवर्ग है। एशियाई चैंपियनशिप में तीन और पदक जीतने के बाद, जिसमें पिछले साल का स्वर्ण भी शामिल है, मनीषा ने अब विश्व चैंपियन बनकर अपने करियर को नई ऊंचाई दी है। कभी गांव में भाई को कबड्डी खेलते देखकर खेल की दुनिया में कदम रखने वाली मनीषा ने आज इतिहास रच दिया है। उनके इस स्वर्ण पदक में वर्षों की मेहनत, परिवार का त्याग, पिता की सीख और एक बेटी का अधूरा वादा छिपा है। पिता भले ही आज उनके बीच नहीं हैं, लेकिन विश्व चैंपियन बनने के बाद माता-पिता की तस्वीर वाली टी-शर्ट लहराकर मनीषा ने उन्हें अपनी सबसे बड़ी जीत का हिस्सा बना लिया।
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