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'अमर उजाला' से अशोक ने कहा- दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास ही भारत को जिताएगा हॉकी विश्व कप

Sun, 18 Nov 2018 09:29 AM IST
सत्येन्द्र पाल सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
सत्येन्द्र पाल सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 18 Nov 2018 09:29 AM IST
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ashok kumar singh said self confidence will win hockey world cup for india
indian hockey team

हॉकी के जादूगर दद्दा ध्यानचंद की विरासत को सही मायनों में अपने जमाने में हॉकी की अपनी कलाकारी के कारण साथियों में 'कलाकार' के रूप में ख्यात उनके सही वारिस उनके मंझले बेटे

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अशोक कुमार सिंह ने ही बढ़ाया। भारत के लिए शुरू के लगातार चार हॉकी विश्व कप खेलने वालों मे अशोक कुमार सिंह के साथ उन्हीं के खेल से प्रभावित रहे अपने जमाने के बेहतरीन स्ट्राइकर धनराज पिल्लै सरीखे खिलाड़ी इने गिने ही हैं। 
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अशोक कुमार के विजयदायी गोल से भारत ने 1975 में क्वालालंपुर में अब तक का अपना इकलौता हॉकी विश्व कप जीता है। अशोक कुमार के जादुई खेल से भारत ने 1971 में बार्सिलोना विश्व कप में कांसा, 1973 में ए सटर्डम में रजत और 1975 में क्वालालंपुर में सुनहरी कामयाबी हासिल की। 1978 में ब्यूनर्स आयर्स में अशोक भारत को कोई मेडल नहीं दिखा सके अैर टीम छठे स्थान पर रही। 
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धनराज पिल्लै जिन चार विश्व कप में खेले उनमें भारत केवल सिडनी में पांचवां स्थान ही हासिल कर सका। भुवनेश्वर में ओडिशा हॉकी विश्व कप को शुरू होने में अब महज 11 दिन बाकी हैं।  अशोक कुमार सिंह ने 'अमर उजाला' के साथ 1975 की विश्व कप की खिताबी जीत की यादों और इस बार घर में भारत की संभावनाओं पर खास बात की। अशोक कुमार कहते हैं, 'खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मैं भारत के लिए 1975 में क्वालालंपुर में पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल में विजयदाई गोल कर टीम को अब तक की एकमात्र सुनहरी कामयाबी दिलाने में योगदान कर पाया।' 

'1975 के बाद भारतीय हॉकी टीम विश्व कप खिताब तो छोड़ ही दें उसके बाद इसमें 43 बरस से कोई मेडल नहीं जीत पाई। इसका एक प्रमुख कारण हॉकी का घास की बजाय कृत्रिम टर्फ पर खेला जाना रहा। गोरे अपनी सुविधा के लिए कृत्रिम टर्फ क्या लाए हम भारतीय हॉकी में बहुत पिछड़ गए। बीते जमाने में भारत को हॉकी खिलाड़ी गांवों से ही मिलते थे। तब ही नहीं आज भी भारत में हॉकी ज्यदातर गांवों में ही खेली जाती है।'

'भारत को आज भी हॉकी में ज्यादातर खिलाड़ी गांवों से मिल रहे हैं।  भारत का बीते चार दशक से भी ज्यादा में  भी हॉकी में विश्व कप में महज दो बार पांचवें स्थान पर रहना और पदक न जीत पाना खासा अखरता है। मुझे सबसे ज्यादा दुख 1986 में लंदन विश्व कप में भारत के 12वें अंतिम स्थान पर रहने पर हुआ। मैं तब वहां वेटरंस हॉकी टूर्नामेंट में खेल रहा था।'

वह बताते हैं, 'मेरा मानना है दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास ही भारत को अपने घर में हॉकी विश्व कप खताब जिताएगा। भारत को ओडिशा हॉकी विश्व कप के लिए अनुभवी खिलाड़ियों को चुनना चाहिए था खासकर सरदार सिंह और रूपिंदर पाल सिंह सरीखे पिछल तीन-चार बड़े टूर्नामेंट खेल रहे अनुभवी खिलाड़ी को। भारत की टीम में अनुभव की कमी जरूर है। हम अपने जमाने में विश्व कप जैसे किसी भी टूर्नामेंट में खिताब जीतने को लक्ष्य बनाकर उतरते थे।'  

'वहीं, आज भारत के कप्तान मनप्रीत सिंह ओडिशा हॉकी विश्व कप से पहले यह कह रहे हैं कि हमारा पहला लक्ष्य क्वॉर्टर फाइनल है। यह हमारे और आज के दौर के खिलाड़ियों की सोच को बताता है। कप्तान के बयान में आत्मविश्वास की कुछ कमी झलकती है। हरेन्द्र सिंह ने भारत की टीम को विश्व कप के लिए तैयार करने में बहुत मदद की है। मैं उ मीद करता हूं कि बतौर चीफ कोच जिस तरह हरेन्द्र ने भारत को लखनउ में जूनियर हॉकी विश्व कप जिताया था उसी तरह तरह वह भुवनेश्वर में सीनियर हॉकी विश्व कप खिताब जिताने में कामयाब रहेंगे।' 

'हमारी अग्रिम पंक्ति खासी युवा है। भारत के आक्रमण का दारोमदार यंग दिलप्रीत सिंह और मनदीप सिंह जैसे स्ट्राइकर के साथ आकाशदीप सिंह अनुभवी फॉरवर्ड पर रहेगा। भारत के पास कप्तान मनप्रीत सिंह और उपकप्तान चिंगलेनसाना सिंह के रूप में मध्यपंक्ति के बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ खासतौर पर कोथाजीत सिंह, बीरेन्द्र लाकड़ा और फ्रीमैन अमित रोहिदास जैसे
बेहतरीन फुलबैक हैं।'

अशोक कहते हैं, 'ओडिशा हॉकी विश्व कप से देश का मान-सम्मान जुड़ा है। हॉकी विश्व कप के दौरान ओडिशा सरकार का हमारी 1975 की विश्व कप जीतने वाली टीम को सम्मानित करने का मकसद मौजूदा भारतीय हॉकी टीम को यही संदेश देना है तब की टीम बिना सुविधाओं के चैंपियन बनी। अब की टीम के लिए बहुत सुविधाएं हैं। विश्व कप में खेलने जा रही मौजूदा भारतीय टीम को हमारी 1975 की टीम से प्रेरणा लेकर बेहतरीन प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि इससे देश का स मान जुड़ा है।'

वह कहते हैं, 'भारत हॉकी टीम की दिक्कत मेरी नजर में यही है कि कोर ग्रुप के 34 खिलाड़ियों के बाहर चयन के लिए नजर कम ही डाली जाती है। भारत की पिछले कई टूर्नामेंट में
नुमाइंदगी करने वाली टीमों में इन्हीं कोर ग्रुप के खिलाड़ियों को रोटेट किया जाता है। सवाल यह कि कोर ग्रुप के बाहर 35वां खिलाड़ी कब भारतीय टीम में जगह पाएगा? उसकी बाबत तो सोचा
ही नहीं जा रहा है।'

'सुनहरा तमगा दिखाने पर दद्दा का पीठ पर हाथ रखना याद रहेगा'

ashok kumar singh said self confidence will win hockey world cup for india
ध्यानचंद - फोटो : hindustan times

अशोक कुमार सिंह कहते हैं, 'मैंने भारत के लिए हॉकी विश्व कप , एशियाई खेलों और ओलंपिक के जीते पदकों में दद्दा (अपने पिता ध्यानचंद) को सिर्फ 1975 में क्वालालंपुर में  हॉकी विश्व कप
जीतने पर मिला सुनहरा तमगा ही दिखाया। जब मैंने दद्दा को विश्व कप वह तमगा दिखाया तो उनका अपनी पीठ पर हाथ रखने का स्पर्श ताउम्र याद रहेगा। मैं तब अभिभूत हो गया था।' 

'दद्दा को इस बात से बेहद खुश हुए कि मैंने पाकिस्तान के खिलाफ विजयदाई गोल कर भारत को फाइनल जिताया। मैंने ओलंपिक में कांसा और एशियाई खेलों में दो रजत और विश्व कप में क्वालालंपुर से पहले कांस्य और रजत पदक भी जीते थे। मैं इन पदकों को दद्दा को दिखाने की हिम्मत ही नहीं कर पाया।'

रघुनंदन देंगे 1975 के विजयदाई गोल के लिए इनाम

वह बताते हैं, 'मुझे खुशी है कि 1975 में हमारे हॉकी विश्व जीतने वाली टीम के मुरीदों की आज भी कमी नहीं है। जयपुर के भारतीय स्टेट बैंक में काम करने वाले रघुनंदन सिंह ने 1975 में
क्वालालंपुर में पाकिस्तान के खिलाफ विजयदाई गोल करने के लिए मुझे और सुरजीत सिंह की पत्नी को ओडिशा विश्व कप के दौरान एक-एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की है।'

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