झूठा है संसार से प्रेमः दाती जी महाराज

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Mon, 24 Dec 2012 10:59 AM IST
worldly love is false daati ji maharaj pravachan
प्रेम की चर्चा तो दुनिया में खूब होती है किंतु कुछ लोग इसे अच्छा मानते हैं तो कुछ लोग इसे बुरा। वास्तव में प्रेम तो साक्षात परमात्मा का प्रतिरूप होता है। उसके बारे में कोई चर्चा करना संभव ही नहीं क्योंकि वह वाणी से व्यक्त किया ही नहीं जा सकता है। वह तो स्वयं अनुभव करके ही समझा जा सकता है। यह बात आध्यात्मिक प्रेम और सांसारिक प्रेम दोनों पर लागू होता है। लेकिन एक बात बहुत गौर करने की है कि सच्चा व शाश्वत प्रेम अविनाशी परमात्मा से ही हो सकता है। नाशवान संसार से प्रेम झूठा होता है, क्योंकि वह शाश्वत नहीं, क्षणिक होता है। इसीलिए हमारे प्राचीन मनीषियों ने कई प्रसंगों में लिखा है कि सांसारिक प्रेम मिथ्या है।

सांसारिक रिश्तों के बंधन में कैद मनुष्य प्रभु को भूल जाता है। वह समझता है कि संसार में जो प्यार मिल रहा है वह सच्चा है। मेरी पत्नी, मेरे पुत्र, मेरे भाई-बन्धु मुझे वास्तव में प्रेम करते हैं, बल्कि यदि मैं न रहूं तो वे मेरे बिना बहुत दुखी हो जाएंगे। लेकिन तथ्य यह है कि संसार के सारे रिश्ते-नाते क्षण भर के हैं। अभी हमारा कोई परम मित्र है तो वक्त व परिस्थितियां बदलने के साथ वह हमारा परम शत्रु भी बन सकता है। जो पत्नी  प्राणनाथ कह कर पुकारती है, वही पत्नी मृत्यु के बाद मेरी सूरत देखकर भी डरने लगेगी।

प्यारा बेटा मेरे इस पंचभौतिक शरीर को विधि पूर्वक श्मशान में जला देगा। इस संसार में फैली प्रीति के धागे एक झटके में टूट जाते हैं। क्षणभंगुर संसार से जुड़ी हर चीजें क्षणभंगुर हैं। अविनाशी तो एक मात्र परमपिता परमात्मा हैं। इसलिए उसी से की गयी प्रीति अविनाशी होती है। इसी भाव को हमारे सभी मनीषी व महापुरुष सनातन काल से लोगों को समझाते आ रहे हैं।

सभी संत-महात्मा सांसारिक रिश्तों को मिथ्या व क्षणभंगुर बताते हुए प्रभु से बार-बार प्रार्थना करते हैं कि आप अपने अविनाशी प्रेम से मुझे कृतार्थ करें। प्रभु, आपसे हमारा मिलन कैसे होगा? हम तो आप की माया से भ्रमित होकर दिखाई देने वाले नाते-रिश्तों से और संसारी पदार्थों से स्नेह कर बैठे हैं और आपकी अविनाशी प्रीति को हमने भुला दिया है।

वास्तव में एक न एक दिन इस संसार को छोड़ना है। फिर भी पता नहीं क्यों यह जानते हुए भी मनुष्य क्षणभंगुर सांसारिक ऐश्वर्य की वस्तुओं को एकत्र करता रहता है। संसार की कोई भी वस्तु परलोक में काम नहीं आती, फिर भी उसका जंजाल मनुष्य ने अपने गले में बांध लिया है। सांसारिक धंधों को बहुत फैला रखा है। मृत्यु के बाद ये धंधे किसी काम के नहीं हैं। ये तो इस संसार में ही छूट जाते हैं। इसलिए ऐ मनुष्य, तू केवल प्रभु से प्रीति कर क्योंकि सांसारिक धंधों में उलझे रहने से कोई लाभ नहीं।

साभारः परमहंस दाती जी महाराज

दाती जी महाराज
दाती जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे। बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया। इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।

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